"अब भी महकती हैं चिट्ठियां"
जब आती थीं चिट्ठियां, तो घर आंगन महकता था,
डाकिए की साइकिल की घंटी पर, पूरा मोहल्ला चहकता था।
सरहद से चिट्ठी मिली, तो बूढ़ी आँखें बरस पड़ीं,
काँपते हाथों ने जैसे, जवान बेटे को छू लिया।
दर्द झलकता था चिट्ठी में, स्याही से ज्यादा आँसू थे,
"यहाँ सब ठीक है" के पीछे, कितने अनकहे किस्से थे।
दिखती थी तस्वीर चिट्ठी में, उस एक लिफाफे के अंदर,
बापू की पगड़ी, माँ की रोटी, और गाँव का वो पीपल का मंदर।
आज मोबाइल की स्क्रीन पर सब है, पर कुछ भी नहीं है,
उस नीले कागज की चिट्ठी जैसा, दिल के करीब कुछ भी नहीं है।
पटरी पर बैठा वो बुजुर्ग आज भी इंतजार में है,
डाकिया नहीं, पर अपने बेटे के एक शब्द के इंतजार में है।
खत तो अब इतिहास हो गए, व्हाट्सएप का जमाना है,
पर जो सुकून एक चिट्ठी में था, वो कहाँ इस जमाने में है।।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार
वाराणसी
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY