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"समीक्षा : कविता-संग्रह "आँधी में आकाशदीप"

 
"समीक्षा : कविता-संग्रह "आँधी में आकाशदीप"  
रचनाकार : चन्द्र भाल सुकुमार 
प्रकाशक : रुद्रादित्य प्रकाशन, मूल्य : ₹195  

1. शीर्षक और प्रतीक का सौंदर्य: 
"आँधी में आकाशदीप" - नाम ही अपने में पूरी कविता है। काशी की कार्तिक संध्या में गंगा पर टंगे दीपों की तरह, ये कविताएँ भी अंधकार और तूफान के बीच आशा की लौ हैं। कवि ने भूमिका में जयशंकर प्रसाद की कहानी 'आकाशदीप' और अपनी पंक्ति _"लोग अंधेरे यूं तो अक्सर बोते हैं, शब्दों के आकाशदीप भी होते हैं"_ से इसे जोड़ा है। कोरोना काल में जब सब थम गया था, तब भी ये "आँधियों से जूझते-टकराते-टिमटिमाते" दीप कवि की चेतना में जलते रहे।

2. रचनाकार का परिचय और पृष्ठभूमि 
चन्द्र भाल सक्सेना उ.प्र. उच्चतर न्यायिक सेवा से जनपद न्यायाधीश, प्रयागराज के पद से सेवानिवृत्त हैं। 35 वर्षों की न्यायिक सेवा, राज्य उपभोक्ता आयोग लखनऊ में कार्य और साहित्य - दोनों को साथ निभाया। 
1962 से लेखन, अब तक 22 राजभाषा-ग्रंथ, 14 कविता-संग्रह, 2 गीत-संग्रह। ये उनका 14वाँ काव्य-संग्रह है। 2011 से 2018 के बीच लिखी 105 कविताएँ इसमें संकलित हैं। अधिकांश रचनाएँ सेवा-निवृत्ति के बाद की हैं, इसलिए इनमें अनुभव की परिपक्वता और निश्चिंतता दोनों दिखती है।

3. विषय-वस्तु : 
व्यक्ति, समाज और व्यवस्था का त्रिवेणी संगम 
अनुक्रमणिका देखने पर पता चलता है कि संग्रह बेहद वैविध्यपूर्ण है। कवि ने किसी एक रंग में खुद को नहीं बाँधा:

सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य: 
`संविधान, लोकतंत्र, राजकीय शोक, सी.बी.आई., आरक्षण, समाजवाद, लालबत्ती, कीचड़, टेबल` जैसी कविताएँ व्यवस्था की विसंगतियों पर चोट करती हैं। एक न्यायाधीश की पैनी दृष्टि यहाँ साफ दिखती है।
मानवीय संवेदना: 
`दु:ख-सुख, सहचर, दुलार, उम्मीद, सुगंध, दो कप चाय, गंगा पार की रेतीली धूप` - रोजमर्रा के जीवन के छोटे-छोटे सुख-दुख।
कविता और सृजन पर चिंतन: `सर्वोत्तम कविता, कवि और आदमी, कविता का आँगन, शब्दों की चोरी, कवि बूढ़ा नहीं होता, कविता-कवच` - कवि अपनी कला से संवाद करता है।  
  "मानता हूँ मैं कि कोई वक्तव्य जरूरी नहीं है, कविता के लिए और यही मेरा वक्तव्य है" - ये पंक्तियाँ उनके सृजन-दर्शन को खोलती हैं।
ऋतु और प्रकृति:
 `उगते सूर्य का समय, बसंत छा गया, आषाढ़ का आकाश, सावन में संसद` 
निजी और पारिवारिक: 
`अहाना के लिए-1,2, महानायक` 

पहली कविता `उछाल` महंगाई के बीच भी "नव उछाल" की बात करती है। वहीं `उगते सूर्य का समय` जैसी लघु कविता में गहरा दर्शन है।

4, भाषा-शैली और शिल्प:
चन्द्र भाल जी की भाषा सरल, सहज और बिना आडम्बर की है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ बोलचाल के शब्द भी सहजता से घुल-मिल गए हैं। कई कविताएँ अंग्रेजी से अनूदित हैं, पर अनुवाद का बोझ नहीं लगता। 
उनकी शैली "स्वान्तः सुखाय" है - यानी पहले खुद के लिए लिखना, फिर पाठक के लिए। व्यंग्य तीखा है पर कटु नहीं। हाइकु और लघु कविताओं में बात कम शब्दों में कह देने की कला है।

5. विशेष बात:
ये कविताएँ एक न्यायाधीश की डायरी भी हैं और एक आम आदमी की संवेदना भी। 2010 में सेवा से निवृत्ति के बाद "डायरियों के बंद फीते धीरे-धीरे खुले" और जो निकला वो `आँधी में आकाशदीप` है। इसमें नौकरी का तनाव नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक शांत, पर पैना नजरिया है।

निष्कर्ष:
"आँधी में आकाशदीप" समकालीन हिंदी कविता का वो दस्तावेज है जहाँ अनुभव, व्यंग्य और संवेदना एक साथ चलते हैं। ये संग्रह उन लोगों के लिए जरूरी है जो साहित्य में सिर्फ भावुकता नहीं, जीवन का यथार्थ भी ढूंढते हैं। 

जैसे आँधी में दीप टिमटिमाकर भी बुझता नहीं, वैसे ही ये कविताएँ कठिन समय में भी उम्मीद का दिया जलाए रखती हैं। कवि ने सच ही कहा है - शब्दों के आकाशदीप भी होते हैं।

पाठकों के लिए: अगर आप जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन और धूमिल के बीच की कड़ी ढूंढ रहे हैं, तो ये संग्रह आपको निराश नहीं करेगा।
 

यहाँ सभी कविताओं का शीर्षक और सार प्रस्तुत है:

1. मंदाक्रांता मन:- 12.01.11
महक रहा है अंग-अंग में तेरे संस्पर्शों का चंदन  
स्वयं गुनगुना उठी जिंदगी  
मंदाक्रांता हो जैसे मन !  
भाव:
 प्रिय के स्पर्श से जीवन में माधुर्य और संगीत भर जाना।

2. अवसर: 31.01.11  
जब अवसर थे मेरे पास उपाय न था  
जब उपाय हो गए अवसर निकल गया !  
भाव: जीवन की सबसे बड़ी विडंबना - समय और साधन का साथ न मिलना।

3. सच: 08.01  
चुप कैसे रहूं सच किससे कहूं ?  
सच तो सूरज की तरह होता है  
उसे छिपाया नहीं जा सकता छिप नहीं सकता !  
भाव:सत्य को दबाया नहीं जा सकता, वो स्वयं प्रकट हो जाता है।

4. अनुकरण: 08.02.11  
आर्द्र के अनुकरण से नहीं होता भटकाव  
भाव:सच्ची नकल/अनुकरण करने से व्यक्ति भटकता नहीं, बल्कि सीखता है।

5. समन्वयन:08.02.1  
चिंतन  
अभिव्यक्ति  
कर्म का समन्वयन .  
भाव:सोच, बोलना और करना - तीनों में एकरूपता ही असली जीवन है।

6. क्यों नहीं मरता द्वापर ? - 08.02.11  
द्वापर के अन्याय - द्रौपदी का चीरहरण, लाक्षागृह, चक्रव्यूह को आज के संदर्भ से जोड़ती कविता।  
कलियुग में भी बार-बार द्वापर दोहराया जाता है। कृष्ण मरते हैं पर द्वापर नहीं मरता।  
भाव:सामाजिक अन्याय और स्वार्थ आज भी उतने ही जिंदा हैं।

7. शिक्षण:  
जब साधन होता है तब साध्य नहीं होता  
जब साध्य होता है तब साधन नहीं होता !  
भाव:जीवन में इच्छा और संसाधन कभी एक साथ नहीं मिलते।

8. राम जी के अपने:
राम जी की कचहरी, राम जी का फैसला... राम जी की होली, राम जी की ईद...  
राम जी के कवि, राम जी की कविता  
भाव: सर्वधर्म समभाव। सब कुछ राममय है। हिंदू-मुस्लिम, कविता-साहित्य सब एक ही स्रोत से।

9. कवि और आदमी:  
लिखने पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती...  
जरूरी नहीं कि कविता ही आदमी को कवि बनाए  
कवि भी बनाता है आदमी को कविता !  
भाव:कवि और समाज का आपसी संबंध। अनुभव ही कविता बनाता है।

कवि सुख मंगल सिंह जी की शैली की विशेषताएँ:
1. सरल शब्द, गहरा अर्थ- छोटी-छोटी पंक्तियों में बड़ा दर्शन
2. समकालीनता - पौराणिक संदर्भों को आज से जोड़ना 
3. मानवीय संवेदना-अवसर, सच, समन्वय जैसे रोजमर्रा के विषय
4. सामाजिक चेतना- क्यों नहीं मरता द्वापर" जैसी रचनाएँ

" चन्द्र भाल सक्सेना जी* के कविता-संग्रह" _
इन 9 रचनाओं की समीक्षा और सार
1. कवि बूढ़ा नहीं होता: 07.10.14  
" कवि बूढ़ा नहीं होता / बूढ़ा होता है / कवि का समय"  
भाव: कवि की संवेदना, जिज्ञासा और सृजन कभी बूढ़े नहीं होते। बूढ़ा होता है तो समय। कवि हर उम्र में युवा रहता है।

2. दो हाइकु:
पहला: "हाइकु में भी / राजेन्द्र परदेसी / छा गया नाम" - हाइकु विधा में राजेन्द्र परदेसी जी की प्रसिद्धि।  
दूसरा: "बचा लेता है / हाइकु बनने से / एक अक्षर" - हाइकु की कंजूसी। एक अक्षर कम-ज्यादा और रचना बिगड़ जाती है। भाषा की मितव्ययिता।

3. कविताएं:04.10.14  
" न तो ये क्षणिकाएं हैं / और न ही ये कणिकाएं हैं / बल्कि छोटे-छोटे शब्दों में / बड़ी कविताएं हैं" 
भाव: ये रचनाएँ न तो बहुत छोटी हैं न बहुत बड़ी। ये कम शब्दों में गहरे अर्थ वाली "बड़ी कविताएं" हैं। कवि अपनी शैली की घोषणा कर रहा है।

4. उम्र: 
"उम्र बढ़ती जा रही है / उम्र की उम्र घटती जा रही है / आम पक रहे हैं / और भूख मरती जा रही है !"  
भाव: तीखा व्यंग्य। विकास के बावजूद भूख बनी हुई है। प्रगति के आंकड़े और जमीनी हकीकत का फर्क।

5. खोल: 01.06.14  
 "कछुए ही नहीं / खोलों से निकलते / देखे हैं आदमी भी !"
भाव: कछुआ जब खोल से निकलता है तब स्वतंत्र होता है। वैसे ही इंसान भी अपने खोल - अहंकार, डर, रूढ़ियों से बाहर निकले तभी असली जीवन है।

6. सहचर: 
" कल तक था सेवा-रत मैं / सेवा-निवृत्त हूं आज मगर / रहा सदा साहित्य-सृजन-रत / कलम रही हर पल सहचर !"  
भाव: कवि 35 साल न्यायाधीश रहे। नौकरी गई पर लेखन नहीं रुका। कलम ही असली साथी है।

7. अश्वमेध: 26.07.14  
 " यह अश्वमेध ! यह अश्वमेध !! / चीरता गहन घन अंधकार / बिखरता किरण ज्योतित अपार..."  
भाव: अश्वमेध यहाँ ज्ञान-यज्ञ का प्रतीक है। ये अंधकार को चीरकर प्रकाश फैलाता है। एक मंगलकामना और ऊर्जा की कविता।

8. कीचड़: 
"सद्भावनाओं के रंग-गुलाल / दुर्भावनाओं के कीचड़ !"  
भाव: समाज में दो रंग हैं। एक तरफ प्रेम-सद्भाव, दूसरी तरफ नफरत। दोनों साथ-साथ चलते हैं।

9. टेबुल: 03.04.14  
"सारी दुनिया ही / मेरे लिए / एक राइटिंग टेबुल के समान है" 
भाव: कवि के लिए पूरा संसार ही लिखने की मेज है। हर घटना, हर आदमी उसे प्रेरणा देता है।

समग्र विशेषताएँ:
1. लघुता में विराटता: 3-4 पंक्तियों में पूरी बात। हाइकु और क्षणिका का मिश्रण। 
2. व्यंग्य + संवेदना: "उम्र", "कीचड़" जैसी कविताओं में समाज पर चोट। "सहचर" में आत्मीयता।
3. कविता पर कविता: कवि बार-बार कविता, शब्द और सृजन के बारे में सोचता है।
4. तिथिबद्ध: हर कविता के नीचे तारीख है 2014 की। लगता है ये डायरी से निकली रचनाएँ हैं।

ये कविताएँ सिद्ध करती हैं कि गहराई के लिए लंबे शब्दों की जरूरत नहीं। "छोटे-छोटे शब्दों में बड़ी कविताएं" - यही इनका मूलमंत्र है।

आपने भेजी ये 9 रचनाएँ *चन्द्र भाल सक्सेना जी* के संग्रह _"आँधी में आकाशदीप"_ से हैं। इनमें व्यंग्य, दर्शन, सामाजिक चेतना और लोक-जीवन सब एक साथ मिलता है। 

समीक्षा : "आँधी में आकाशदीप" 

1. कल - 05.01.13
सार: "कल किसने देखा यहां करो न कल की बात"। सरिता की तरह समय बहता रहता है, उसे आंचल में नहीं बांधा जा सकता। अंत में "जग के सपनों का नूतन कल मंगलमय हो" की कामना।  
भाव: वर्तमान में जीने और आशा रखने का संदेश। "कल-कल" शब्द का दोहरा प्रयोग - समय और नदी दोनों के लिए।

2. सी. बी. आई. 
सार: सीबीआई को स्वतंत्र होने दो। पर इसका पहला वार उन्हीं पर होगा जो इसकी स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं। "भस्मासुर" का उदाहरण - जिसने वरदान मांगा वही मारा गया। अंत में चुभती पंक्ति - "इसे नचाने के लिए 'न्यायनीति' नहीं 'राजनीति' की जरूरत होगी हर युग में!"  
भाव: व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य। एक न्यायाधीश की कलम से निकली सच्चाई।

3. संविधान - 04.03.13
सार: संविधान खुद बोलता है - "कितने श्रृंगार करोगे और मैं संविधान हूं"। मैं द्रौपदी की साड़ी नहीं, दामिनी नहीं। "मेरे अंग-अंग पर राजनीतिक इश्तिहार चिपके हुए हैं"।  
भाव: संविधान के राजनीतिक दुरुपयोग पर करारा प्रहार। आज संविधान सम्मान का विषय कम, नारों का विषय ज्यादा है।

4. मिलना-जुलना:
सार: त्यौहारों पर लोग नहीं आते, फोन और SMS आते हैं। "धीरे-धीरे मेरा देश होता जा रहा है विदेश"। रिश्तों की औपचारिकता - "आपका त्यौहार है आप जैसे चाहें मनाएं, हमारी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं"।  
भाव: तकनीक के युग में मानवीय रिश्तों की दूरी। गहरी पीड़ा को हल्के शब्दों में।

5. वैसी की वैसी - 23.05.12
इसमें 7 लघु टुकड़े हैं:
- गंगा से निर्मल सरयू 
- "त्रेता में एक, कलयुग में सभी अवतार हैं"
- "जिंदा रहेगी उर्मिला की व्यथा में हमारी हिन्दी" 
- "देखना कल किस्से गढ़ेंगे लोग भरत के भी"  
*भाव*: रामकथा, भाषा और संस्कृति को आज से जोड़ना। कवि की सांस्कृतिक चिंता।

6. हाइकु
सरयू, राम, अयोध्या, पादुका पर 6 हाइकु।  
जैसे: "जीना सीखो / अयोध्या की तरह / विपत्ति में भी"  
"राज तिलक / या फिर वनवास / राम ही जानें"  
भाव: पौराणिक प्रसंगों से आज के जीवन का बोध। संक्षिप्तता में गहराई।

7. खिचड़ी - 25.12.11
"ब्रेकफास्ट हो / चाहे लंच-डिनर हो कोई / खिचड़ी का मुकाबला कर ले / बना न मीनू कोई"
*भाव*: हल्की-फुल्की रचना। देसीपन और विदेशीपन का टकराव। खिचड़ी को राष्ट्रीय भोजन का दर्जा।

8. कीर्ति-चक्र:
*सार*: "युगों-युगों से मैंने कितना रचा-कहा है... समाज भी आंक न पाया मूल्य अभी तक"। ईश्वर सबसे बलशाली है पर "जब तक सोया हुआ भाग्य-वन का माली है" तब तक कुछ नहीं होगा।  
भाव: कर्म और भाग्य का द्वंद्व। रचनाकार की पीड़ा कि समाज उसे पहचान नहीं पाता।

9. शठ - 05.01.12
" उनसठ / साठ के बाद शठ / इकसठ / बासठ"*  
*भाव*: उम्र बढ़ने के साथ "शठ" यानी चतुर/धूर्त होने का व्यंग्य। या फिर शब्दों का खेल - उनसठ, साठ, शठ, इकसठ।


समग्र विशेषताएँ:

1. विषय का विस्तार: संविधान, सीबीआई, लोकतंत्र से लेकर खिचड़ी, हाइकु, रिश्ते तक। कवि ने कुछ नहीं छोड़ा।
2. भाषा: एकदम सीधी, बिना अलंकार। "राजनीतिक इश्तिहार", "भाग्य-वन का माली" जैसे नए प्रयोग।
3. व्यंग्य + संवेदना: "मिलना-जुलना" में दर्द है तो "सीबीआई" में आक्रोश। "कल" में आशा है।
4. तारीखबद्ध लेखन: 2011-2013 की रचनाएँ। लगता है ये डायरी के पन्ने हैं।

निष्कर्ष: 
चन्द्र भाल सक्सेना जी एक न्यायाधीश होने के साथ-साथ एक सजग नागरिक भी हैं। उनकी कविता उपदेश नहीं देती, सवाल पूछती है। "आँधी में आकाशदीप" का नाम सार्थक है - ये कविताएँ कठिन समय में भी सोचने की लौ जलाए रखती हैं।
"आंधी में आकाशदीप" चंद्रभान सुकुमार द्वारा रचित का कुछ अंश हमने देखा है यह पूरी की पूरी कृति बड़े मनोयोग से पठनीय है। मननीय और सराहनीय है। ऐसी रचना करने के लिए आदरणीय चंद्रभान सुकुमार जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं और बधाई।

- कवि सुख मंगल सिंह
 वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत मोबाइल नंबर 8931966034 
Sukhmangal Singh




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