काल्पनिक नाम के पात्रों और घटनाओं के आधार पर ये "संदेश-परक लघुकथा" प्रस्तुत:
"आधा पेंशन, पूरा अपमान"
गाँव मीरपुर में "कलावती" रहती थी।
पति "रामदीन" सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे। स्वभाव के सीधे-सादे, पर घर में बहुत कम बोलते।
कलावती भी कभी सीधे मुंह बात न कर पाती। 50 साल साथ रहे, पर मन की दूरी बनी रही।
4 साल पहले रामदीन इस दुनिया से चले गए।
जाते-जाते सरकारी नौकरी की "आधी पेंशन" कलावती के नाम छोड़ गए। सोचा था बुढ़ापा कट जाएगा।
कलावती के तीन बच्चे थे।
बड़ा बेटा "अजय" बैंगलोर में नौकरी करता, छोटा बेटा "सूरज" दिल्ली में।
बेटी "सुमन" की शादी मध्य प्रदेश में हुई थी।
माँ अकेली पड़ी तो सुमन ने कहा "माँ मेरे पास आ जाओ"।
पर कलावती ने मना कर दिया। "बेटों को पहले से ही भ्रम है कि लड़की सब ले जाएगी"।
फिर अजय और सूरज दोनों बारी-बारी से फोन करते - "माँ, खेत का गेहूं बेच दो, पैसा भेज दो। इस सीजन आमदनी कम है"।
कलावती चुपचाप खेत बेचती, पेंशन से पैसे निकालती और भेज देती।
पेंशन आती 8000, बच्चों के हाथ में 7500 चली जाती। घर का बर्तन तक बेचवा दिया "जरूरत है माँ" कहकर।
एक दिन रामदीन का छोटा भाई "दिनेश" मिलने आया। देवर था, पर दिल का साफ।
दिनेश ने देखा भाभी का मुंह लटका है, आँखें सूजी हैं।
पूछा - "भाभी, आपका चेहरा क्यों गिरा रहता है? मायूसी क्यों छाई है?"
कलावती पहले चुप रही, फिर फफक कर रो पड़ी।
बोली - "देवर जी, ये कलयुग का प्रभाव है।
जीते जी पति से बात न कर सकी, अब मरने के बाद बच्चे भी बात नहीं करते, सिर्फ मांगते हैं।
पेंशन मेरी है, पर हक उनका। घर मेरा है, पर सहारा किसी का नहीं।
बेटी बुलाती है तो बेटे बुरा मान जाते हैं। बेटे बुलाते हैं तो सिर्फ जरूरत के लिए"।
दिनेश ने भाभी का हाथ पकड़ा और कहा - "भाभी, पेंशन आपके बुढ़ापे की लाठी है।
इसे लाठी मत बनने दो, बैसाखी मत बनाओ।
आपने रामदीन भैया के साथ 40 साल काटे, अब अपने लिए 10 साल जियो"।
उसी दिन कलावती ने फैसला लिया।
अगले महीने जब अजय का फोन आया "माँ 20 हजार भेजो", तो कलावती ने पहली बार कहा - "बेटा, मेरे पास अब सिर्फ दुआ है, पैसा नहीं"।
पेंशन का खाता अपने नाम कराया, घर के कागज संभाले।
और सुमन को फोन करके कहा - "बेटी, 2 महीने तेरे पास रहूंगी, फिर 2 महीने अपने घर। बारी-बारी से सबके पास जाऊंगी, पर बोझ बनकर नहीं"।
6 महीने बाद गाँव की औरतें देखतीं - कलावती के चेहरे पर रौनक है।
वो अब मंदिर जाती, समूह में बचत करती, और बच्चों को कहती - "मुझे मत देना, तुम कमा कर दिखाओ"।
संदेश:-
बुढ़ापे में बेटा-बेटी का सहारा ठीक है, पर स्वाभिमान बेचकर नहीं।
" पेंशन लाठी है, खिलौना नहीं"।
और कलयुग वही है जहाँ जीते जी कदर न हो, मरने के बाद दिखावा हो।
गाँव में अब कहते हैं - "कलावती ने अपने 'आधा पेंशन' से 'पूरा जीवन' खरीद लिया"।
- सुख मंगल सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत!
ये कथा उन माँओं के लिए है जो बच्चों के लिए सब सहती हैं।
Sukhmangal Singh
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