*जलवायु परिवर्तन: मौसम का सच*
आसमान ने रंग बदले, धूप में चुभन नई है,
सावन अब बरसे कम, और जेठ में बाढ़ वही है।
ग्लेशियर पिघलकर रोते हैं, नदियाँ बाँध तोड़ती,
धरती की साँसें तेज हुईं, हर मौसम आँखें मोड़ती।
दिसंबर में गर्मी लगती, मई में सर्द हवा चली,
फसलें पूछें खेतों से, ऋतुचक्र को क्या हुआ भली?
कहीं सूखा, कहीं जल प्रलय, प्रकृति का संतुलन डोला,
हमने पेड़ काटे जितने, उतना ही मौसम बोला।
कारखानों का धुआँ चढ़ा, ओज़ोन का कवच छिद गया,
एसी की ठंडी हवा में, पूरा गाँव पिघल गया।
समुद्र बढ़कर द्वार खड़ा, तट के घर निगलने आया,
मछली पूछे सागर से, तू इतना गरम क्यों हो आया?
मौसम अब मौसम न रहा, यह हमारा ही अक्स है,
जो बोया जहर हवा में, वही लौटकर बरस रहा।
प्लास्टिक की नदियाँ बहतीं, साँसों में कार्बन घुला,
बच्चों के हिस्से आया, बस एक अनिश्चित कल का पुल।
पर अभी भी वक्त है साथी, धरती माँ को गोद में लें,
एक पेड़ लगाएँ हर घर में, हर साँस को फिर शोधित करें।
सौर ऊर्जा, सादा जीवन, यही बचाएगा आने वाला कल,
वरना मौसम का सच यही — हम ही होंगे इसके हल।।
डॉ सुखमंगल सिंह/वाराणसी
Sukhmangal Singh
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