
| Sun, Jul 5, 2:42 PM (16 hours ago) | |||
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वाराणसी से लखनऊ और लखनऊ से वाराणसी
"यात्रा वृतांत : "खिचड़ी, मेट्रो और नैमिष की आस"
_पात्र : पति - रामेश्वर, पत्नी - कमला, बेटी - गुड़िया
शुक्रवार की सुबह थी। 4:30 बजे ही उठकर सबसे पहले खुद दाढ़ी बना ली। आइने में देखा तो लगा, "चलो आज शक्ल थोड़ी साफ-सुथरी लग रही है।" बैग में वही दवाइयाँ, एक प्लास्टिक की पाइप और 3 दिन पुरानी खिचड़ी की याद साथ रख ली। दस्त की वजह से पेट पहले से ही कमजोर था। वो सैयद राजा चंदौली की यात्रा का तोहफा था।
*5:40 की गाड़ी*
समय से 20 मिनट पहले स्टेशन पहुँच गया। ट्रेन नंबर *204001 SBS वाराणसी-लखनऊ एक्सप्रेस*, डब्बा *S-2, नॉन एसी*। पसीने से तर-बतर सीट मिली। खिड़की वाली सीट के लिए पहले ही रामेश्वर ने 10 रुपये वाले को "भैया" बना लिया था। ट्रेन चली तो हवा के साथ-साथ चारबाग का सपना भी दौड़ा।
चारबाग उतरते ही गर्मी ने स्वागत किया। तपती दोपहर में ऑटो के झंझट से बचने के लिए सीधा मेट्रो स्टेशन की तरफ भागा। *चारबाग मेट्रो से लखनऊ विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन* तक की ठंडी सफर ने जान में जान डाली। एसी की हवा लगी तो लगा जैसे बाबा खुद पंखा झल रहे हों।
*टेंपो और चाय*
मेट्रो से उतरकर एक रिजर्व टेंपो पकड़ा। ड्राइवर से कहा, "भैया बैद्यनाथपुरम चलो।" रास्ते भर टेंपो वाला भजन सुन रहा था और रामेश्वर दस्त और खिचड़ी के बारे में सोच रहा था।
कमरे पर पहुँचते ही कमला की आवाज आई, "आ गए? चाय बनाऊँ?"
रामेश्वर ने कहा, "पहले पानी, फिर चाय। पेट में आग लगी है।"
चाय-पानी के बाद रात का खाना फिर वही खिचड़ी। 3 दिन से वही खा रहा था। कमला बोली, "डॉक्टर को दिखा लो।" रामेश्वर हँसकर बोला, "डॉक्टर की फीस से अच्छा है खिचड़ी ही सही।"
*4 तारीख और नैमिष की बस*
अगले दिन 4 तारीख थी। नैमिषारण्य जाना था। सुबह से बस स्टैंड के चक्कर। बस नहीं मिली। फोन आया, कमला का।
कमला: "बस मिली?"
रामेश्वर: "नहीं मिली।"
कमला: "तो कैसे जाओगे?"
रामेश्वर: "पैदल। और क्या।"
फोन पर 2 मिनट की खामोशी। फिर कमला बोली, "देखो जी, घाघरा पहन कर रहने वाली औरत की बात मान लिया करो। बस के लिए 2 घंटे और रुक जाओ।"
रामेश्वर चिढ़ गया, "तुम्हें क्या, तुम्हें तो घाघरा पहन कर घर में बैठना है। मुझे धूप में भटकना है।"
कमला हँस पड़ी, "अच्छा बाबा, गुस्सा मत करो। गुड़िया कह रही है पापा के लिए लड्डू रख दूँ?"
पीछे से 8 साल की गुड़िया चिल्लाई, "पापा जल्दी आना, आपके लिए कहानी सुनाऊँगी।"
रामेश्वर का गुस्सा पिघल गया। बोला, "ठीक है, एक बस और देख लेता हूँ। नहीं मिली तो पैदल ही सही। नैमिष के बाबा बुला रहे हैं।"
*मर्म*
ये यात्रा ट्रेन, मेट्रो, टेंपो की नहीं थी। ये यात्रा थी — दाढ़ी बनाने से लेकर खिचड़ी खाने तक, दस्त से लेकर दर्शन तक, और पत्नी की "घाघरा वाली" टोका-टोकी से लेकर बेटी के लड्डू तक।
रामेश्वर जानता था, मंजिल नैमिष है, पर असली रास्ता घर से शुरू होता है।
"यात्रा वृतांत : भाग - 2 "ओवर ब्रिज के नीचे का गाना"
पात्र : पति - रामेश्वर, पत्नी - कमला, बेटी - गुड़िया
बस नहीं मिली तो रामेश्वर ने तय किया — पैदल ही सही।
चारबाग से निकलकर पैदल ही *मड़िहान थाना* तक पहुँचा। धूप सिर पर थी, पाँव में छाले और पेट में 3 दिन की खिचड़ी। थाना क्रॉस करते ही थोड़ा आगे एक ठेला दिखा।
*₹40 की ताकत*
ठेले वाले से बोला, "भैया मक्खन ब्रेड और चाय।"
गरम चाय की चुस्की और मक्खन लगी ब्रेड के 2 कौर खाते ही लगा जान वापस आई। ₹40 दिए और फिर चल पड़ा। पैर लड़खड़ा रहे थे, पर हिम्मत थी कि नैमिष पहुँचना है।
*ओवर ब्रिज और वो गाना*
रेलवे लाइन पार करने के लिए ओवर ब्रिज के नीचे से जा रहा था। दो खंभों के बीच सीमेंट का एक चौथरा बना था। वहाँ 5 लोग बैठे थे। बहुत सांवले, काले, आँखें लाल। पास में बोतलें और गिलास रखे थे। मदिरा पीकर गला फाड़-फाड़ कर गा रहे थे।
उनकी आवाज गर्म हवा में ऐसे घुल रही थी जैसे व्यंग्य हो:
*गाने के बोल थे:*
"अरे बाबू जी का चंदा गया कहाँ,
हुंडी भरी और पेट खाली रहा।
राम का नाम बेच के महल बना लिया,
और हमको मिला सिर्फ जयकारा॥
घंटा बजे पर पैसा बोले,
रसीद कटे पर हिसाब ना डोले।
जय हो मालिक की, जय हो दलाल की,
भक्त भूखा मरे, वाह रे कमाल की॥"
रामेश्वर 2 पल रुका। उन 5 लोगों की आँखें नशे में थीं, पर बोल में सच की चुभन थी। एक ने उसे देखकर गिलास उठाकर कहा, "आओ बाबा, चाय नहीं चढ़ेगी यहाँ, दारू पियो।"
रामेश्वर ने हाथ जोड़ दिए, "भाई, मुझे नैमिष जाना है। पेट में खिचड़ी है, दारू नहीं पचेगी।"
वो लोग हँसे और फिर से गाना शुरू कर दिया।
रामेश्वर ने लाइन क्रॉस की और आगे बढ़ गया। पीछे से गाने की आखिरी लाइन कानों में पड़ी —
"मंदिर पत्थर का नहीं, भरोसे का होता है..."
*मर्म*
मक्खन ब्रेड ने शरीर को ताकत दी, और उस चौथरे के गाने ने दिमाग को। रामेश्वर सोच रहा था — ये 5 लोग शराबी सही, पर सवाल तो वही पूछ रहे थे जो वो खुद 3 दिन से खिचड़ी खाकर सोच रहा था।
कमला का फोन फिर आया। "कहाँ हो?"
रामेश्वर बोला, "ओवर ब्रिज के नीचे। यहाँ 5 कवि मिले हैं। गाना बहुत अच्छा गाते हैं।"
गुड़िया पीछे से बोली, "पापा, उनके लिए भी लड्डू ले जाना।"
रामेश्वर हँस पड़ा। लड़खड़ाते पैरों से फिर चल दिया। नैमिष अभी दूर ---!
*यात्रा वृतांत : भाग - 3 "आम, टेंपो और ₹189 की बस"*
_पात्र : पति - रामेश्वर, पत्नी - कमला, बेटी - गुड़िया_
ओवर ब्रिज के नीचे वाला गाना अभी कानों में गूँज ही रहा था कि रामेश्वर ने रेलवे लाइन पार की और थोड़ा आगे बढ़ा।
*आम और लकड़ी का सहारा*
दाहिने हाथ से एक बाईपास वाली सड़क जा रही थी। आगे *इंजीनियरिंग कॉलेज* का गेट दिखा। गेट के पास एक बुड्ढा आदमी बैठा एक कच्चा आम नमक-मिर्च लगाकर खा रहा था। रस ठोड़ी से टपक रहा था।
रामेश्वर भी भूखा था। 3 दिन की खिचड़ी और ₹40 वाली मक्खन-ब्रेड के बाद आम देखकर मुँह में पानी आ गया। पर जेब और हिम्मत दोनों खाली थीं।
उधर गली-कुत्तों का जमावड़ा था। छोटी-छोटी गुमटियों के पास 4-5 कुत्ते लेटे थे। रामेश्वर को डर लगा। वहीं जमीन पर पड़ी एक *तीन फीट लंबी पतली लकड़ी* उठा ली। लाठी के सहारे लंगड़ाते हुए चलने लगा। चला नहीं जा रहा था, पर रुकना भी नहीं था।
बुजुर्ग से चार-पाँच फीट की दूरी बनाकर एक पत्थर पर बैठ गया। बुड्ढे ने एक बार देखा, फिर आम का दूसरा टुकड़ा तोड़ लिया। कुछ बोला नहीं। रामेश्वर भी चुप रहा। लगभग *15 मिनट* ऐसे ही बैठा रहा। धूप, थकान और भूख तीनों एक साथ थे।
*छाँव और टेंपो*
15 मिनट बाद हिम्मत करके उठा और *इंजीनियरिंग चौराहे* तक पहुँचा। चौराहे के उस पार सड़क किनारे छायादार पीपल के पेड़ थे। वहीं आधा घंटा बैठकर साँस ली। पसीना सुखाया। जेब टटोली — ₹20 का एक नोट बचा था।
तभी एक खाली टेंपो आया। ड्राइवर बोला, "कहाँ जाना है बाबा?"
रामेश्वर: "अवध बस अड्डा।"
"₹20 लगेगा।"
रामेश्वर तुरंत बैठ गया। यही ₹20 आखिरी पूँजी थी।
*बसों का मेला और आजमगढ़ वाली*
*अवध बस अड्डा, लखनऊ* पहुँचते ही शोर। सारी बसें *गोंडा, फैजाबाद, अकबरपुर, बस्ती* की लाइन में लगी थीं। नैमिष की बस नहीं थी। मायूस होकर इधर-उधर भटक ही रहा था कि एक कंडक्टर चिल्लाया — "आजमगढ़! आजमगढ़!"
रामेश्वर दौड़कर गया। *₹416* का टिकट कटा। *UP सरकार की नॉन-एसी सरकारी बस* थी। सीट मिल गई। खिड़की से हवा आई तो लगा जैसे बाबा ने खुद पंखा कर दिया।
घंटों बाद *आजमगढ़* उतरा। पेट में चूहे दौड़ रहे थे। स्टेशन के पास एक होटल में *₹100 की थाली* — दाल, चावल, रोटी, सब्जी। 3 दिन बाद पेट भर खाना मिला। खाते-खाते आँख भर आई।
*आखिरी बस : ₹179 में बनारस*
खाना खाकर सीधा काउंटर। पूछा, "बनारस की बस?"
कंडक्टर बोला, "अंबेडकर नगर डिपो की बस है। ₹179 लगेंगे।"
रामेश्वर ने बिना सोचे टिकट ले लिया। *₹179 देकर आज़मगढ़ - बनारस वाली बस* में बैठ गया। सीट के पास गुड़िया की फोटो रख ली और कमला को मैसेज किया — "बस मिल गई। बनारस आ रहा हूँ।"
बस चली। बाहर अंधेरा था। लाठी पैरों के पास रखी थी। पेट भरा था। मन में था — मड़िहान का आम, ओवर ब्रिज का गाना, और ₹40 की चाय बंद मक्खन।
मर्म:
ये यात्रा दूरी की नहीं थी। ये ₹20 के टेंपो से ₹416 की बस तक, और ₹100 की थाली से ₹179 की आखिरी बस तक की यात्रा थी।
रामेश्वर जान गया — मंजिल तक पहुँचने के लिए कभी आम देखकर रुकना पड़ता है, कभी लाठी लेकर चलना पड़ता है, और कभी बस न मिलने पर भी "पैदल जाऊँगा" कह देना पड़ता है।
कमला का जवाब आया — "घर आकर आराम करना। घाघरा उतार कर तुम्हारे लिए खिचड़ी नहीं, पूरी सब्जी बनाऊँगी।"
पीछे से गुड़िया बोली — "पापा, आम मेरे लिए भी लाना।"
रामेश्वर खिड़की से बाहर देखने लगा। बनारस अब पास था।
"यात्रा वृतांत : भाग - 4 "₹40 के समोसे और ORS का घूँट"
पात्र : पति - रामेश्वर, पत्नी - कमला, बेटी - गुड़िया
अंबेडकर नगर डिपो की बस *पूर्वांचल एक्सप्रेसवे* पर दौड़ रही थी। खिड़की से हवा आ रही थी पर "रामेश्वर के पेट में चूहे कूद रहे थे"। भूख तगड़ी लग आई थी।
बैग टटोला। खाने को कुछ नहीं। सिर्फ एक *ORS का पैकेट और सादा पानी की आधी बोतल। ORS का घूँट पीकर पानी से निगल लिया। पेट को लगा "चलो कुछ तो मिला"।
ढाबे पर रुकी बस:
करीब 1 घंटे बाद बस एक ढाबे पर रुकी। 15 मिनट का ब्रेक। सब लोग चाय-नाश्ता करने उतरे। रामेश्वर भी उतरा। ढाबे पर गरम-गरम *समोसे* तले जा रहे थे। रेट का बोर्ड लगा था — *₹10 वाला समोसा ₹20 में*।
रामेश्वर ने कंडक्टर से कहा, "भैया ये तो डबल रेट है।"
ढाबे वाला बोला, "एक्सप्रेसवे है बाबा, यहाँ यही रेट चलता है। नुकसान कर रहा हूँ क्या?"
रामेश्वर की जेब में हिसाब चल रहा था। भूख जवाब दे रही थी। आखिर *2 समोसे ₹40 में* लिए। कुरकुरे समोसे में आलू का मसाला था। 3 दिन की खिचड़ी के बाद स्वाद लगा जैसे प्रसाद मिल गया हो।
साथ में *₹20 की पानी की बोतल* भी ली। ठंडा पानी गले से उतरा तो जान में जान आई। ORS + समोसा + पानी = पेट शांत।
भोग और प्रस्थान:
खाते-खाते रामेश्वर ने बैग से घर से लाई *भोग की मिठाई* का एक टुकड़ा भी निकाल कर खा लिया। कमला ने सुबह ही दिया था, "बाबा को चढ़ाना और थोड़ा खुद भी खा लेना।"
15 मिनट पूरे हुए। कंडक्टर ने सीटी बजाई। सब बस में चढ़े। रामेश्वर भी अपनी लाठी और खाली पानी की बोतल लेकर सीट पर बैठ गया।
बस फिर *आजमगढ़* के लिए रवाना हो गई।
*मर्म*
₹40 के समोसे महंगे थे, पर उस समय वो 400 के लग रहे थे। एक्सप्रेसवे का ढाबा लूट रहा था, पर भूख उससे भी बड़ी लुटेरी थी।
रामेश्वर ने फोन निकाला। कमला को मैसेज किया :-
"2 समोसे ₹40 में खाए। पानी ₹20 का। ORS पी लिया। अब ठीक हूँ। आजमगढ़ पहुँचकर ₹100 वाली थाली खाऊँगा।"
पीछे से गुड़िया की आवाज आई — "पापा समोसा मेरे लिए भी रखना।"
रामेश्वर हँस पड़ा, "बेटा यहाँ ₹20 का एक है। घर चलकर 10 के 4 खिलाऊँगा।"
बस की रफ्तार के साथ-साथ रामेश्वर की भूख भी अब आजमगढ़ की तरफ दौड़ रही थी।
गीत : "घर ही नैमिष है"
राग : भैरव-मिश्र, लय : दादरा 6 मात्रा, भाव : थका-हारा पर सुकून वाला
*मुखड़ा :*
चार दिन की खिचड़ी खाई, पेट में चूहे दौड़े रे
ट्रेन मेट्रो टेंपो छानी, जेब में बस सिक्के थोड़े रे
नैमिष का सपना टूटा, पर पांडेपुर में चैन मिला
घर ही नैमिष है बाबा, घर ही नैमिष है ॥
अंतरा 1 :
5:40 की गाड़ी पकड़ी, S-2 में बैठा अकेला
चारबाग से मेट्रो ली, पसीने से तर-बतर मेला
₹40 के समोसे खाए, एक्सप्रेसवे पे लूट मची
ORS का घूँट पिया, और साँस फिर से लौट चली ॥
घर ही नैमिष है बाबा, घर ही नैमिष है ॥
अंतरा 2 :
आजमगढ़ में थाली ली, ₹100 में फीका निवाला
प्याज खीरा सलाद में, होटल वाला मारे ताला
बाईपास पे टेंपो मिला, ₹10 में घर तक लाया
लमही होते-होते दो सवारी, तब ड्राइवर मुस्काया ॥
घर ही नैमिष है बाबा, घर ही नैमिष है ॥
अंतरा 3 :
राय साहब के बगीचे उतरा, लाठी-बैग कंधे लादा
गलियों से चलता-चलता, पांडेपुर वाला रूम पाया
तखत पे देह ढहाई, पंखा चला और बारिश आई
फोन पे कमला बोली, "दवा खा लो आराम से जाई"
गुड़िया बोली "समोसा लाए?" मैंने कहा "घर पे बना दूँ 4" ॥
घर ही नैमिष है बाबा, घर ही नैमिष है ॥
अंतिम बंद :
₹416 की बस चली, ₹179 की भी दौड़ी
₹20 का पानी पिया, ₹10 का टेंपो जोड़ी
दस्त अभी ना थमा है, पर मन का बोझ उतरा
रामेश्वर कहे सुन लो, घर से बड़ा तीर्थ ना दूजा ॥
घर ही नैमिष है बाबा, घर ही नैमिष है ॥
गाने का मूड: -
धीमी तानपुरा + तबले पर दादरा। "घर ही नैमिष है" वाली लाइन को हर बार थोड़ा ऊँचा और ठहर कर गाओ, जैसे थकान के बाद मिली राहत हो।
- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
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