Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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शिव के त्रिशूल पर बसी प्राचीन काशी

 
शिव के त्रिशूल पर बसी प्राचीन काशी

काशी की स्थापना 5000 वर्ष पूर्व शिव ने की,
आजादी के बाद 1983 में उत्तर प्रदेश का हिस्सा बनी।
काशी में संगीत कला और शिक्षा का संगम है,
भारत में सांस्कृतिक राजधानी रूप में उद्गम है।

शिव की नगरी काशी, संगीत की धुन सुनाती है,
कला और शिक्षा का संगम, काशी को बनाती है महान।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

सांस्कृतिक राजधानी काशी, भारत की शान है,
काशी की गलियों में, घूमता है इतिहास का पन्ना।
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं,
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी।।
जैन धर्म के 23 में तीर्थंकर का जन्म काशी के ही तीर्थंकर का निवास था,
भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश काशी के सारनाथ पुण्य भूमि पर दिया।
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी,
शिव की नगरी में बसते हैं, प्रेम और भक्ति की कहानी।

तीर्थंकरों की जन्मभूमि, काशी की महिमा गाई,
भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश की, सारनाथ पुण्य भूमि है।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा अपरंपार,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

सारनाथ की धरा पावन है, बुद्ध की वाणी से,
काशी की गलियों में, घूमता है इतिहास का पन्ना।
जैन धर्म के तीर्थंकरों की, काशी है जन्मभूमि,
भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश की, सारनाथ पुण्य भूमि।
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी,
शिव की नगरी में बसते हैं, प्रेम और भक्ति की कहानी।
वाराणसी की गलियों में, घूमता है इतिहास का पन्ना,
काशी के कण-कण में, बसता है ज्ञान और विज्ञान का अन्ना।

भोलेनाथ का मंदिर, अन्नपूर्णा की रसोई भी,
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं।
गंगा की लावण्य, दर्शन की शान,
काशी की सजावट, जीवन को बनाती है महान।

काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ,
राम, कृष्ण, बुद्ध, और महावीर की, यहाँ की धरा पर आनी।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी,
शिव की नगरी में बसते हैं, प्रेम और भक्ति की कहानी।।

काशी का नाम चंद्रवंशी राजा काश के नाम पर पड़ा,
वरुण अस्सी नदी से जुड़ी गंगा वाराणसी में धर्म ध्वजा ले खड़ी।
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी,
शिव की नगरी में बसते हैं, प्रेम और भक्ति की कहानी।

चंद्रवंशी राजा काश ने, काशी को बसाया था,
वरुण और अस्सी नदी के संगम पर, एक शहर बनाया था।
गंगा की धारा में, स्नान करने से पाप दूर होते हैं,
काशी में मृत्यु से, मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वाराणसी की गलियों में, घूमता है इतिहास का पन्ना,
काशी के कण-कण में, बसता है ज्ञान और विज्ञान का अन्ना।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

गंगा की लावण्य, दर्शन की शान,
काशी की सजावट, जीवन को बनाती है महान।
काशी का नाम चंद्रवंशी राजा काश के नाम पर पड़ा,
वरुण अस्सी नदी से जुड़ी गंगा वाराणसी में धर्म ध्वजा ले खड़ी।।

काशी को शिव ने विष्णु से मांगा था,
अपने निवास के लिए पहचाना था।
मोक्षदायिनी और अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं,
शिव के त्रिशूल पर बसी प्राचीन काशी है।

शिव की नगरी में बसते हैं, प्रेम और भक्ति की कहानी,
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी।
त्रिशूल के तीनों शूल पर, काशी बसाई गई,
आती, जाती, स्थित रहती, सृष्टि की रचना हुई।

मोक्षदायिनी काशी में, मृत्यु से मोक्ष मिलता है,
अविमुक्त क्षेत्र में, शिव की कृपा से पाप दूर होते हैं।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

शिव के त्रिशूल पर बसी, प्राचीन काशी है,
मोक्षदायिनी और अविमुक्त क्षेत्र, काशी की पहचान है।
काशी को शिव ने विष्णु से मांगा था,
अपने निवास के लिए पहचाना था।।

ऋग्वेद रामायण महाभारत और स्कंद पुराण,
जैसे ग्रंथों में काशी का वर्णन लिखा मिलता है।
भरत वंश के राजा कास, दिवो दास का जिक्र,
मगध राजा बिंबिसार भी काशी राज्य करते थे।

काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं,
वेदों और पुराणों में, काशी की कहानी लिखी है।
भरत वंश के राजाओं ने, काशी को बसाया था,
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी।

दिवो दास का जिक्र, काशी के इतिहास में है,
मगध राजा बिंबिसार ने, काशी को अपना राज्य बनाया था।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

ऋग्वेद रामायण महाभारत और स्कंद पुराण,
जैसे ग्रंथों में काशी का वर्णन लिखा मिलता है।
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं,
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी।।
जैन धर्म के 23 में तीर्थंकर का जन्म काशी के ही तीर्थंकर का निवास था,
भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश काशी के सारनाथ पुण्य भूमि पर दिया।
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी,
शिव की नगरी में बसते हैं, प्रेम और भक्ति की कहानी।

तीर्थंकरों की जन्मभूमि, काशी की महिमा गाई,
भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश की, सारनाथ पुण्य भूमि है।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा अपरंपार,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

सारनाथ की धरा पावन है, बुद्ध की वाणी से,
काशी की गलियों में, घूमता है इतिहास का पन्ना।
जैन धर्म के तीर्थंकरों की, काशी है जन्मभूमि,
भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश की, सारनाथ पुण्य भूमि।।

आदि गुरु शंकराचार्य जी ने काशी में ही शैव परंपरा,

आठवीं सदी में स्थापना की, काशी की महिमा अपरंपार।
कालिदास कबीर और रविदास जैसे संतों का,
साहित्यिक जुड़ाव काशी से रहा है, काशी की धरा पावन है।

शंकराचार्य जी की स्थापना, काशी को बनाई महान,
कालिदास की रचनाएँ, काशी की गलियों में घूमती हैं।
कबीर और रविदास के दोहे, काशी की धरा पर लिखे,
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं।

काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।
आदि गुरु शंकराचार्य जी ने, काशी में शैव परंपरा,
आठवीं सदी में स्थापना की, काशी की धरा पावन है।।

काशी के राजा बलवंत सिंह ने 18वीं सदी में,
बनारस रियासत की स्थापना काशी में की।
बनारस की वे संरक्षक स्थापित हुए थे,
राजा बनारस में भू के लिए जमीन दी है।

राजा बलवंत सिंह की काशी में, बनारस रियासत की स्थापना,
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं।
बनारस की संरक्षक, राजा बलवंत सिंह की जय,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के राजा बलवंत सिंह ने, बनारस रियासत की स्थापना की।
बनारस की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी,
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं।।

काशी की स्थापना 5000 वर्ष पूर्व शिव ने की,
आजादी के बाद 1983 में उत्तर प्रदेश का हिस्सा बनी।
काशी में संगीत कला और शिक्षा का संगम है,
भारत में सांस्कृतिक राजधानी रूप में उद्गम है।

शिव की नगरी काशी, संगीत की धुन सुनाती है,
कला और शिक्षा का संगम, काशी को बनाती है महान।
काशी विश्वनाथ की जय, काशी की महिमा गाई,
काशी के इतिहास पर, लिखी है कई कहानियाँ।

सांस्कृतिक राजधानी काशी, भारत की शान है,
काशी की गलियों में, घूमता है इतिहास का पन्ना।
काशी की महिमा अपरंपार है, इसका कोई अंत नहीं,
काशी की धरा पावन है, गंगा की धारा भी प्यारी।।

- सुख मंगल सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी ,
अवध निवासी 
Sukhmangal Singh

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