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"शीतला माता की महिमा"
शीतला माता हिंदू धर्म में शक्ति का शीतल, शांत और आरोग्य-दायिनी स्वरूप हैं। स्कंद पुराण के अनुसार इनका प्राकट्य समस्त जीवों को शीतलता प्रदान करने के लिए हुआ।
स्वरूप:
माता गर्दभ पर सवार हैं, एक हाथ में कलश, दूसरे में झाड़ू, तीसरे में सूप और चौथे में नीम के पत्ते धारण करती हैं। झाड़ू और सूप प्रतीक हैं - माँ हमारे कष्टों को बुहार कर बाहर करती हैं, कलश शीतल जल का प्रतीक है जो रोगों को शांत करता है।
महिमा:-
1. आरोग्य की देवी: इन्हें चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी और ताप-ज्वर की अधिष्ठात्री माना जाता है। मान्यता है कि जो इनकी सच्चे मन से पूजा करता है, वह इन व्याधियों से मुक्त रहता है।
2. बसौड़ा पर्व: चैत्र कृष्ण अष्टमी को शीतला अष्टमी / बसौड़ा मनाया जाता है। इस दिन माता को एक दिन पहले बना हुआ बासी ठंडा भोजन (बसौड़ा) का भोग लगाया जाता है। यह विज्ञान भी है - गर्मी शुरू होने से पहले बासी भोजन खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता का परीक्षण और शरीर को ऋतु परिवर्तन के लिए तैयार करना।
3. पर्यावरण संदेश: माता के पूजन में नीम, ठंडा जल और स्वच्छता का विशेष महत्व है, जो हमें स्वच्छता और शीतलता का संदेश देता है।
शीतला माता क्रोध की नहीं, करुणा की देवी हैं। वे दंड नहीं देतीं, बल्कि हमारे भीतर के ताप, अहंकार और रोगों को शीतल करती हैं।
मंत्र:
`वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।`
`मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्॥`
जय शीतला माता।
- डॉ सुखमंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत।
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