Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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प्रकृति प्रणय

 


हरे पत्तों की सरसराहट में सुनूँ मैं दिल की धड़कन,
धूप की किरणें जब बूँदों से खेलें, बनती है प्रेम की रचन,

पर्वत की ऊँची चोटी पर लिखूँ मैं तेरे नाम को,
नदिया के संग बहते हैं मेरे ख्वाब, अनजाने काम को,

फूलों की महक में तेरा इँतज़ार, बसी है हर श्वास में,
चाँद की चाँदनी में तेरी मुस्कान, झलके हर आकाश में,

बरसात की बूँदें जब धरती को चूमे, तो दिल करे प्रण,
पंछियों की चहचहाहट में सुनूँ मैं तेरा मधुर स्वर,

जंगल की घनी छाया में तेरा छाया, रहस्य का पहर,
सूरज के विदा होते ही, तारे लिखें हमारी कहानी,

रात की सन्नाटा में, तेरा नाम गूँजता अनजानी,
पहाड़ों की ठंडी हवा में, तेरा स्पर्श महसूस हो,

नदियों के संग बहते, मेरे जज़्बात अनकुश हो,
हर पत्ता, हर फूल, तेरे प्रेम का गवाह है,

इस धरा पर, हर सांस में तेरा नाम लिखा है,
प्रकृति के रंगों में, मैं तेरा ही प्रतिबिंब हूँ,

तुझसे मिलकर, बागों में खिले हैं अनंत कल्पनाएँ,
तेरे बिना, वन में भी सूना सूना लगता है,

पर साथ रहे तो, हर मौसम बन जाए बगीचा,
यही है मेरा प्रकृति प्रणय, तेरा और मेरा संग.।

- सुख मंगल सिंह
 वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
 वाराणसी वासी 
 अवध निवासी 
Sukhmangal Singh

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