*दीपावली की व्यंग रचना*
दीपावली आई है, और हम हैं कि पटाखे फोड़ रहे हैं,
पर प्रदूषण की मार, हमारे फेफड़ों को तोड़ रही है।
मिठाइयों की दुकानें, सजी हुई हैं,
पर चीनी की मात्रा, हमारे स्वास्थ्य को बिगाड़ रही है।
दीपक की रोशनी में, हमारा मन है जगमगा रहा,
पर बिजली की खपत, हमारे बिल को बढ़ा रही है।
लोगों की भीड़ है, और गाड़ियों की लंबी कतार,
पर ट्रैफिक की समस्या, हमारे दिमाग को खा रही है।
दीपावली की रात में, हम सब हैं एक साथ,
पर सोशल मीडिया पर, हमारी तस्वीरें हैं वायरल हो रही हैं।
दीपावली की व्यंग रचना में, मैंने कहा है,
कि हम अपनी खुशियों में, कितनी गलतियाँ कर रहे हैं।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी वासी
अवध निवासी
Sukhmangal Singh
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