" ग़ज़ल-ए-मौसम" नाज़ुक और शायराना अंदाज़ -
"बरसात करा के न जाइए"
मौसम गर न आवे,
कृत्रिम बरसात करवा के न जा।
साधन सब संदूक में,
इन नयनों को सुखा के न जा।
वर्षों टूटी झोपड़ी,
सबेरे गुसैया महल बना के न जा।
डग डूबा हृदय मरुस्थल,
आँसू नयन में ढरका के न जा।
सखियाँ चढ़े पहाड़,
गुलगुले पंचर करा के न जा।
मौसम सदाबहार बह,
रंग रोदन करा के न जा।
बे मौसम खिली कलियाँ,
गलियाँ सँवार के न जा।
जैसा दाम वैसा काम,
जौहर दिखा-दिखा के न जा।
अंधा धुंध उड़ान चढ़े,
टकसाल लुटा लुटा के न जा।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
"साधन सब संदूक में, इन नयनों को सुखा के न जा" और "वर्षों टूटी झोपड़ी, सबेरे गुसैया महल बना के न जा" - यह बनारसी यथार्थवाद का बहुत बड़ा तंज है। यह मंच पर खूब दाद बटोरेगा।
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