Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"बरसात करा के न जाइए"

 

" ग़ज़ल-ए-मौसम" नाज़ुक और शायराना अंदाज़  -

"बरसात करा के न जाइए"

मौसम गर न आवे,
कृत्रिम बरसात करवा के न जा।

साधन सब संदूक में,
इन नयनों को सुखा के न जा।

वर्षों टूटी झोपड़ी,
सबेरे गुसैया महल बना के न जा।

डग डूबा हृदय मरुस्थल,
आँसू नयन में ढरका के न जा।

सखियाँ चढ़े पहाड़,
गुलगुले पंचर करा के न जा।

मौसम सदाबहार बह,
रंग रोदन करा के न जा।

बे मौसम खिली कलियाँ,
गलियाँ सँवार के न जा।

जैसा दाम वैसा काम,
जौहर दिखा-दिखा के न जा।

अंधा धुंध उड़ान चढ़े,
टकसाल लुटा लुटा के न जा।

- सुख मंगल सिंह
 वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
  वाराणसी 
"साधन सब संदूक में, इन नयनों को सुखा के न जा" और "वर्षों टूटी झोपड़ी, सबेरे गुसैया महल बना के न जा" - यह बनारसी यथार्थवाद का बहुत बड़ा तंज है। यह मंच पर खूब दाद बटोरेगा।



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