*अजब व्यवस्था*
न्याय व्यवस्था बंद हो जाए,
पुलिस पर सभी संतोष करें,
घूसखोरी चरम चढ़ जाए,
तब भी ना अफसोस करें।
सत्य की आवाज दब जाए,
अन्याय का बोलबाला हो,
निर्बल का शोषण हो,
तब भी ना अफसोस करें।
न्यायालय में जज सोएं,
वकील अपनी फीस लें,
मुकदमें की सुनवाई न हो,
तब भी ना अफसोस करें।
पुलिस वाले मनमानी करें,
रिश्वत लेकर छोड़ें दोषी,
निर्दोष जेल में सड़ें,
तब भी ना अफसोस करें।
क्या यही है हमारी व्यवस्था?
क्या यही है न्याय का अर्थ?
नहीं, नहीं, यह नहीं हो सकता,
हमें बदलाव लाना होगा।
*अजब व्यवस्था: एक व्यंग्यात्मक आलेख*
हमारे समाज में न्याय व्यवस्था की हालत ऐसी हो गई है कि लगता है जैसे यह व्यवस्था ही नहीं, बल्कि एक मजाक बनकर रह गई है। न्यायालयों में मुकदमों की सुनवाई के लिए सालों तक इंतजार करना पड़ता है, और जब फैसला आता है तो अक्सर लगता है कि न्याय नहीं, अन्याय हुआ है।
पुलिस व्यवस्था भी इससे अछूती नहीं है। पुलिस वाले अपनी मनमानी करते हैं, रिश्वत लेते हैं और निर्दोष लोगों को परेशान करते हैं। लगता है जैसे पुलिस का काम ही लोगों को परेशान करना है, न कि उनकी रक्षा करना।
घूसखोरी तो हमारे समाज में एक आम बात हो गई है। हर कोई घूस लेता है और देता है। लगता है जैसे बिना घूस दिए कोई काम ही नहीं हो सकता। यह एक ऐसा चक्र है जिससे निकलना मुश्किल लगता है।
लेकिन सवाल यह है कि हम इस व्यवस्था को बदलने के लिए क्या कर रहे हैं? क्या हम सिर्फ शिकायतें करते रहेंगे या कुछ करने की कोशिश भी करेंगे? यह सवाल हम सभी को अपने आप से पूछना होगा।
हमें एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो न्यायपूर्ण हो, पारदर्शी हो और जिसमें भ्रष्टाचार न हो। हमें इसके लिए संघर्ष करना होगा और एक बेहतर भविष्य की दिशा में काम करना होगा।
*आगे क्या करें?*
हमें अपने आसपास के समाज में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम करना चाहिए। हमें अपने अधिकारों के बारे में जागरूक रहना चाहिए और उनका उपयोग करना चाहिए।
आइए, हम एक बेहतर भविष्य की दिशा में काम करें और एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करें जो न्यायपूर्ण, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त हो।
इस आलेख और कविता से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:
*आलेख से:*
1. *न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता*: आलेख हमें न्याय व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है और सुधार की आवश्यकता पर बल देता है।
2. *भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई*: आलेख में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने और एक पारदर्शी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
3. *सामाजिक जिम्मेदारी*: आलेख हमें अपने समाज के प्रति जिम्मेदार बनने और बदलाव लाने के लिए काम करने के लिए प्रेरित करता है।
*कविता से:*
1. *व्यवस्था की विडंबना*: कविता व्यवस्था की विडंबना को उजागर करती है और हमें इसके बारे में सोचने पर मजबूर करती है।
2. *न्याय की मांग*: कविता में न्याय की मांग की गई है और व्यवस्था से सवाल पूछे गए हैं।
3. *परिवर्तन की आवश्यकता*: कविता में परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया गया है और हमें इसके लिए काम करने के लिए प्रेरित किया गया है।
*सामान्य सबक:*
1. *जागरूकता*: हमें अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूक रहना चाहिए।
2. *परिवर्तन की आवश्यकता*: हमें व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए काम करना चाहिए।
3. *सामाजिक जिम्मेदारी*: हमें अपने समाज के प्रति जिम्मेदार बनना चाहिए और बदलाव लाने के लिए काम करना चाहिए।
इन सबकों को अपने जीवन में अपनाकर, हम एक बेहतर भविष्य की दिशा में काम कर सकते हैं।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी वासी
अवध निवासी
Sukhmangal Singh
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