जीने नहीं देते ये अलम हमको दयार के
जाते ही उसके रूठे हसे दिन बहार के
बेपर्दा हो गए वो निहा दर्द जिगर के
केसे छुपायं अफसुर्दा दहन बीमार के
काबा गए हम न कभी गए दिएर में
रोजे अज़ल करेंगे केसे रुख परवरदिगार के
हम गए जो अपनी जान से उनकी बला से ये
संग लिए रकीब फिरते वो मेरी मज़ार के
उनको मयस्सर ज़ीस्त के लुत्फो हयात सब
जेरे ज़मीं इश्क में 'सुधीर' दो जहाँ हार के
मेरे काव्य संग्रह 'लम्स' से
Sudheer Maurya 'sudheer'
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