इस तरह सकपकाती रही द्रौपदी
लोर छुपके बहाती रही द्रौपदी।
रीत से मीत की सारिणी, देखकर
सेज खुद से सजाती रही द्रौपदी।
रूप सँवरा रहे, मस्त भँवरा रहे
नूर-ए-गंगा नहाती रही द्रौपदी।
हर करम को धरम मानकर आदतन
भेद सब से छुपाती रही द्रौपदी।
पूछ डाला किसी ने सजन का पता
आमरण लरखराती रही द्रौपदी।
सुधीर कुमार ‘प्रोग्रामर’
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