बिना समझे मुहब्बत की बड़ाई हो तो कैसे हो
गले जो मिल नहीं सकते वो भाई हो तो कैसे हो।
अमीरौं ने बनाई तीन के तेरह सुना हमने
पसीने की कमाई से दहाई हो तो कैसे हो।
उधर लाखों करोड़ों की सगाई में सजी दुल्हन
इधर लाचार बेटी की बिदाई हो तो कैसे हो।
लजा जाए जहाँ फानूस भी, फूहड़ तरानों से
भला उस घर की छाया में, पढ़ाई हो तो कैसे हो।
विवादित हो जहाँ कुरआन, गीता और रामायाण
विवादों की ये खाई की, भराई हो तो कैसे हो।
सियासत ने तो गंगा बाँट दी है और शतलज को
किसानो की फसल सूखे, तराई हो तो कैसे हो।
गरीबों के घरों को सिर्फ वादे ही मयस्सर हैं
गरीबी को मिटाने की लड़ाई हो तो कैसे हो।
सुधीर कुमार ‘प्रोग्रामर’
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