सुप्रभात जी।
कहानी सुनी सुनाई।
जीवन जीने की दो शैलियाँ हैं। एक जीवन को उपयोगी बनाकर जिया जाए और दूसरा इसे उपभोगी बनाकर जिया जाए। जीवन को उपयोगी बनाकर जीने का अर्थ है उस उस वृक्ष की तरह जीवन जीना जिसका अंकुरित होना, पल्लवित होना, पुष्पित होना और फलित होना केवल परमार्थ के लिए होता है।
कर्म तो करना मगर परहित की भावना से करना ही जीवन को उपयोगी बनाकर जीना है। साथ ही अपने व्यवहार को इस प्रकार बनाना कि हमारी अनुपस्थिति दूसरों को रिक्तता का एहसास कराए। जो उपयोगी है, वही मूल्यवान भी है।
जीवन को उपभोगी बनाने का मतलब है उन पशुओं की तरह जीवन जीना केवल और केवल उदर पूर्ति ही जिनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है। हमारा यह जीवन उपयोगी भी बने केवल उपभोगी ही नहीं यही मानव जीवन की परम सार्थकता है।
सुरपति दास
इस्कॉन
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