शुभ संध्या जी।
कहानी सुनी सुनाई।
जो देता है वही देवता है। कोई मनुष्य जब समाज को देता है तो देवता के रूप में स्व प्रतिष्ठित भी हो जाता है। प्रभु कृपा करते हैं तो किसी-किसी जीव के मन में सेवा का भाव जगाकर समाज सेवा का निमित्त बनाते हैं।
जिस मनुष्य के जीवन में सेवा और त्याग है, वही मनुष्य समाज में मूल्यवान भी है। सेवा और त्याग का गुण ही समाज में किसी मनुष्य के मूल्य अथवा उपयोगिता का निर्धारण करता है।
मानव हों अथवा देवराज इंद्र, कर्तापन का अभिमान जिसके भी भीतर आता है प्रभु द्वारा उसके अभिमान भाव को एक दिन चूर-चूर अवश्य कर दिया जाता है। सेवा और त्याग के साथ-साथ विनम्रता का भाव ही जीवन की सबसे बड़ी निरोगता है।
सुरपति दास
इस्कॉन
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