अक्सर इन्सान गिरगिट बन जाते हैं
मतलब के लिए रंग अपना दिखाते हैं
मौज़ों को साहिल से जोड़कर फिर
भंवर में फ़सने का इल्ज़ाम लगाते हैं।
गमज़दाओं को गमहीन बनाने के लिए
कुरेद कर ज़ख्म उनके हरे कर जाते हैं ।
कुर्सी के लिए चूसकर रक्त का कतरा-कतरा
मरणोपरान्त मूर्तियां चैराहों पर लगाते हैं।
रखते हैं गिद्ध दृष्टि दूसरों की बहू-बेटियों पर
अपनी बेटी को देखने वालों के चश्में लगाते हैं।
मुद्धतों से खतों-किताबत करने वाले
गुनाह करके कैसे अंजान बन जाते हैं ।
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