तू भी मुझसे दूर है, वो भी मुझसे दूर है,
दिल लगाएँ कैसे जहाँ, दिल तो मज़बूर है.
कहने को तू खुदा है, और वो आत्मा है,
मैं समझ नहीं पा रहा की, मेरा क्या वजूद है.
क्या यूँ ही तड़पते रहेंगे, तुम्हारे लिए,
या तुझको भी तड़प है, हमारे लिए.
अगर ऐसा है, तो फिर क्यूँ तू मुझसे दूर है,
चली आओ, तू क्यूँ इतनी मज़बूर है.
बतला दो मुझको, की मेरा भी क्या कसूर है,
अगर लगता है की मैं, बेकसूर हूँ,
तो क्यूँ तू मुझसे दूर है.
तू भी मुझसे दूर है, वो भी मुझसे दूर है,
दिल लगाएँ कैसे जहाँ, दिल तो मज़बूर है.
लेखक :- श्री निरंजन कुमार बंसल
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY