जब तक जिये हवाओँ के ख़ँजर तले रहे
ये हौँसले भी कम नहीँ दीये जले रहे
कुछ तो शिफ़ाओँ से तेरी तिस्क़ीन हो हमेँ
ज़ख़्मे जिगर को कब तलक कोई मले रहे
मौसम का ये मिजाज़ तो पहले कभी न था
आँधी गुज़र गई न अब वो जलज़ले रहे
अब तो नज़र मिला कि तेरे इन्तिजार मेँ
कितने हसीन ख़ाब आँखोँ मेँ पले रहे
ये दिलकुशी तेरी अदा की ख़ासियत है फिर
तेरी अदाओँ से ख़फ़ा क्यूँ मनचले रहे
मैने तो ख़ुद वुजूद भी अपना मिटा दिया
हैरान हूँ कि दरमियां क्यूँ फ़ाँसले रहे
'शायर' तुम्हारे शहर मेँ जिस दिन तलक रहा
तूफ़ान कुछ रहे यहाँ कुछ बलवले रहे
**** शायर¤देहलवी ****
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