हो पाये जो कभी अगर हम ख़ुद'कफ़ील भी
लौटेँगे काट कर बची उम्रे तवील भी
तन्हाई मेँ तो प्यार भी करता है वो मुझे
मुझको करे है ग़ैर के आगे ज़लील भी
मरहम जो मल रहे हैँ मेरे ज़ख़्म पर यहाँ
सीने मेँ रोज़ ठोकते हैँ एक कील भी
रखता हूँ बाँध कर मेरे ख़ाबोँ को शाम तक
देता हूँ रात को इन्हेँ थोडी सी ढील भी
उठ कर तो चल दिये हैँ मेरी इक पुकार पर
शायद वो साथ चल सकेँ दो चार मील भी
'शायर' जरा ये क़ाफ़िये ताज़ा लिया करो
पहले ही ले चुका था इन्हेँ तो क़तील भी
*** शायर¤देहलवी ***
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