दक्षिण बिहार: सांस्कृतिक विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
गंगा नदी के दक्षिण में विस्तृत दक्षिण बिहार का भूभाग न केवल आधुनिक बिहार का प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक हृदयस्थल है, बल्कि यह प्राचीनकाल से ही भारत की सभ्यता, धर्म, दर्शन, अध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान और सामरिक शक्ति का मुख्य केंद्र रहा है। मुख्य रूप से मगही और हिंदी भाषी यह पूरा क्षेत्र अपनी विविध भौगोलिक विशेषताओं, पवित्र नदियों, प्राचीन पर्वतमालाओं तथा बहु-सांस्कृतिक विरासत के लिए संपूर्ण विश्व में जाना जाता है।।ज्ञान की वैश्विक पीठ नालंदा महाविहार इसी ऐतिहासिक पावन भूमि का सबसे प्रदीप्त रत्न है। इस संपूर्ण क्षेत्र का इतिहास पौराणिक मन्वंतर काल के ऋषियों से आरंभ होकर हर्यक, मौर्य, गुप्त और पाल वंश के स्वर्ण युगों से गुजरता हुआ आधुनिक काल तक निरंतरता के साथ प्रवाहित होता है। दक्षिण बिहार का भूभाग मुख्यतः गंगा नदी के दक्षिण स्थित जिलों से निर्मित है। यह क्षेत्र उत्तर में गंगा नदी, दक्षिण में छोटानागपुर के पठार, पश्चिम में कर्मनाशा नदी तथा विंध्य श्रृंखलाओं और पूर्व में पश्चिम बंगाल की सीमाओं से घिरा है। प्रशासनिक दृष्टि से दक्षिण बिहार को चार प्रमुख संभागों (प्रमंडलों) में विभाजित किया जाता है:
प्रशासनिक प्रमंडल और जिले में पटना प्रमंडल : पटना, नालंदा, भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर। , मगध प्रमंडल : गया, औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद, अरवल। , मुंगेर प्रमंडल : मुंगेर, जमुई, लखीसराय, शेखपुरा, बेगूसराय (आंशिक टाल क्षेत्र)।भागलपुर प्रमंडल : भागलपुर, बांका है।
दक्षिण बिहार का अपवाह तंत्र उत्तर बिहार से भिन्न है। यहाँ की अधिकांश नदियाँ दक्षिण में स्थित छोटानागपुर पठार और विंध्य पहाड़ियों से निकलकर उत्तर तथा उत्तर-पूर्व की ओर बहती हुई गंगा नदी में विलीन हो जाती हैं। ग्रीष्मकाल में ये नदियाँ प्रायः शुष्क हो जाती हैं, किंतु वर्षा ऋतु में इनमें प्रचंड जलप्रवाह देखने को मिलता है।
प्रमुख नदियाँ और उनकी विशेषताओ में सोन नदी अमरकंटक (मध्य प्रदेश); बालू खनन एवं विशाल पाठ के लिए प्रसिद्ध। पटना के समीप (मनेर / हल्दीछपरा)। पुनपुन नदी पलामू का पठार (झारखंड); पौराणिक रूप से पवित्र नदी। फतुहा (पटना)। फल्गु (निरंजना) निरंजना और मोहना नदियों का संगम (बोधगया); पितृपक्ष तर्पण हेतु प्रसिद्ध। टाल क्षेत्र में गंगा में विलीन। कर्मनाशा नदी कैमूर की पहाड़ियाँ; उत्तर प्रदेश व बिहार की सीमा रेखा। चौसा (बक्सर)। कीऊल नदी गिरिडीह (झारखंड); ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व। लखीसराय के समीप। सकरी एवं चानन छोटानागपुर पठार; सिंचाई की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण। नवादा, मुंगेर व भागलपुर का मैदानी/टाल क्षेत्र है।
पर्वत, पहाड़ियों में दक्षिण बिहार का भूभाग विंध्याचल और छोटानागपुर पठारी श्रृंखलाओं के अग्रभाग से आच्छादित है। यहाँ की पहाड़ियाँ न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक हैं, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अद्वितीय हैं:राजगीर/गिरिव्रज की पहाड़ियाँ (नालंदा): यह क्षेत्र पाँच प्रमुख पहाड़ियों से घिरा हुआ है—विपुलगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, स्वर्णगिरि और गृधकूट। यह महाभारत कालीन जरासंध की राजधानी और भगवान बुद्ध एवं महावीर की कर्मभूमि रही है। बराबर एवं नागार्जुनी पहाड़ियाँ (जहानाबाद/गया): ये पहाड़ियाँ मौर्यकालीन आजीविका गुफाओं (जैसे लोमश ऋषि गुफा, कर्ण चौपार) के लिए विश्वविख्यात हैं। कैमूर की पहाड़ियाँ (कैमूर व रोहतास): यह विंध्य पर्वतमाला का पूर्वी विस्तार है, जो घने वनों, जलप्रपातों और प्राचीन गुफा चित्रों से समृद्ध है। प्रेतशिला, ब्रह्मयोनि व गृध्रकूट (गया): ये पहाड़ियाँ पितृपक्ष तर्पण, श्राद्ध कर्म और धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख केंद्र हैं। मंदार पर्वत (बांका): पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय इसी पर्वत को मथानी (मंदर) बनाया गया था। खड़गपुर की पहाड़ियाँ (मुंगेर/जमुई): यह क्षेत्र गर्म जल के कुंडों (जैसे सीताकुंड, ऋषिकुंड), जलप्रपातों और खनिज संपदा के लिए जाना जाता है।
दक्षिण बिहार का प्रत्येक नगर इतिहास के किसी न किसी महत्वपूर्ण पन्ने का प्रतिनिधित्व करता है:। पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना): हर्यक वंशीय अजातशत्रु द्वारा सैन्य दुर्ग के रूप में नींव रखी गई और उदयन द्वारा इसे मगध की राजधानी बनाया गया। यह मौर्य और गुप्त साम्राज्यों की वैश्विक राजधानी रहा। राजगृह (राजगीर): प्राचीन मगध की प्रथम राजधानी। यहाँ जरासंध का अखाड़ा, बिंबिसार का कारागार और चक्राकार पत्थर की विशाल प्राचीर आज भी सुरक्षित है। गया और बोधगया: गया पितृ-तर्पण का सनातन केंद्र है, जबकि बोधगया में भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यहाँ का महाबोधि मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। वैशाली और चंपा (भागलपुर): अंग महाजनपद की समृद्ध राजधानी चंपा व्यापारिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत उन्नत नगर थी। सासाराम: रोहतास जिले में स्थित सासाराम में सूरी साम्राज्य के संस्थापक शेरशाह सूरी का अष्टकोणीय मकबरा है, जो मध्यकालीन भारत की इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है
दक्षिण बिहार का इतिहास भारतीय महाद्वीप के राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास का कालानुक्रमिक दर्पण है:
पौराणिक / मन्वंतर काल में (कीकट, मनु, वसु , बृहद्रथ व जरासंध वंश ,था । पौराणिक एवं मन्वंतर काल: स्वायंभुव एवं वैवस्वत मन्वंतर की परंपरा में इस भूभाग को 'कीकट' और 'मगध' कहा गया। बृहद्रथ और जरासंध का शासन इसी युग से संबंधित है। हर्यक, शिशुनाग व नंद वंश (6ठी-4थी सदी ई.पू.): बिंबिसार और अजातशत्रु के शासनकाल में मगध का साम्राज्यवादी विस्तार आरंभ हुआ। मौर्य साम्राज्य (322-185 ई.पू.): चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के शासन में मगध भारत के प्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य की राजधानी बना।शुंग, कण्व एवं गुप्त साम्राज्य (185 ई.पू. - 6ठी सदी ई.): गुप्त काल के दौरान दक्षिण बिहार कला, विज्ञान, साहित्य और संस्कृति का वैश्विक केंद्र बना, जिसे भारत का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है।।पाल वंश एवं मध्यकाल (8वीं-16वीं सदी): पाल राजाओं के संरक्षण में नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालयों ने शिक्षा के क्षेत्र में विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त की। मध्यकाल में शेरशाह सूरी ने सासाराम से शासन कर प्रशासनिक सुधारों की नई नींव रखी।।आधुनिक काल: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह का योगदान तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवाद की चेतना का विस्तार इसी माटी से हुआ। था।
दक्षिण बिहार केवल राजनीतिक शक्तियों का केंद्र नहीं रहा, बल्कि यह वैदिक काल से ही महर्षियों और ऋषियों की तपोभूमि रहा है। विभिन्न मन्वंतरों में यहाँ अनेक ऋषियों ने साधना की और मानव जाति को कालजयी ज्ञान प्रदान किया: है।
च्यवन ऋषि वैवस्वत मन्वंतर (सत्ययुग / त्रेतायुग)। अरवल , औरंगाबाद , पटना ,जिले क्षेत्र भृगुवंशी महर्षि च्यवन ने अपनी वृद्धावस्था में स्वास्थ्य एवं यौवन पुनः प्राप्त करने हेतु जड़ी-बूटियों के योग से 'च्यवनप्राश' का आविष्कार किया। राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से उनका विवाह हुआ और उन्होंने अश्विनी कुमारों की सहायता से आयुर्वेद विज्ञान को समृद्ध किया।. विश्वामित्रऋषि ल: त्रेतायुग (वैवस्वत मन्वंतर) में सिद्धाश्रम (वर्तमान बक्सर) , रोहतास , कैमुर , भोजपुर बक्सर जिले का क्षेत्र में : क्षत्रिय राजा से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र ने बक्सर के सिद्धाश्रम में अपना तपोवन बनाया। उन्होंने गायत्री मंत्र के रहस्यों का उद्घाटन किया तथा श्रीराम और लक्ष्मण को 'बला' और 'अतिबला' जैसी दिव्य विद्याओं तथा अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्रदान किया।
. ऋष्यश्रृंगी (श्रृंगी ऋषि) त्रेतायुग। में : श्रृंगी ऋषि पहाड़ी (लखीसराय / मुंगेर , नवधा क्षेत्र)।। विभांडक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने अयोध्या के राजा दशरथ हेतु प्रसिद्ध 'पुत्रेष्टि यज्ञ' का संपादन कराया था, जिसके परिणामस्वरूप श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। लखीसराय स्थित श्रृंगी धाम इनकी पवित्र तपोभूमि मानी जाती है। कश्यप ऋषि मन्वंतर काल का आरंभ (सत्ययुग)। गया एवं नालंदा , जहानाबाद राजगीर क्षेत्र।: प्रजापति कश्यप समस्त सुर, असुर, नाग और मानव प्रजातियों के मूल पितामह माने जाते हैं। दक्षिण बिहार के गया और मगध क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए महान अनुष्ठानों का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है।
. मार्कण्डेय ऋषि मन्वंतर-व्यापी (चिरंजीवी ऋषि)।। कैमूर पर्वतमाला एवं सोनभद्र का तटीय क्षेत्र। अल्पायु का योग होने के बावजूद इन्होंने उग्र तपस्या और महामृत्युंजय मंत्र के निरंतर जप से काल (यमराज) पर विजय प्राप्त की। 'मार्कण्डेय पुराण' की रचना और देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) का ज्ञान इन्हीं की देन है। लोमष ऋषि: कल्प और मन्वंतर-व्यापी (चिरंजीवी)। बराबर पहाड़ियाँ (जहानाबाद)। अत्यंत दीर्घायु लोमष ऋषि ने महाभारत काल में पांडवों को भारत के विभिन्न तीर्थों का ज्ञान और महत्व समझाया था। जहानाबाद की बराबर पहाड़ियों में स्थित 'लोमश ऋषि गुफा' प्राचीन काल से इनकी ध्यानस्थली मानी जाती है। और्व ऋषिभार्गव / वैवस्वत मन्वंतर।
सोनभद्र (सोन नदी तट) व मगध क्षेत्र।: महर्षि भृगु के पौत्र और्व ऋषि ने अपनी तपस्या के तेज से उत्पन्न महाअग्नि (और्वाग्नि) को समुद्र में स्थापित किया था। इन्होंने सम्राट सगर के पूर्वजों को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान किया। मधुश्रवा वैदिक काल (वैवस्वत मन्वंतर)। स्थान: मगध क्षेत्र (पटना-नालंदा सीमावर्ती क्षेत्र)। महर्षि विश्वामित्र की शिष्य/पुत्र परंपरा से जुड़े ऋषि मधुश्रवा ऋग्वेद के अनेक सूक्तों के मंत्रद्रष्टा थे। इन्होंने मगध के मैदानी भागों में यज्ञीय परंपराओं और वैदिक ऋचाओं के गायन को प्रसारित किया। उरुवेल (उर्वेला) पूर्व-बौद्ध एवं पौराणिक काल। उरुवेला (वर्तमान बोधगया)। बौद्ध धर्म के अभ्युदय से पूर्व उरुवेला क्षेत्र कठिन तपस्या करने वाले जटिल ऋषियों (जैसे कश्यप बंधु) का प्रमुख केंद्र था। निरंजना नदी के तट पर स्थित इस घने वन क्षेत्र को ध्यान और आत्म-निग्रह का सर्वोच्च स्थान माना जाता था।।ध्रुव (राजर्षि/भक्त) स्वायंभुव मन्वंतर (सत्ययुग)। गया की ध्रुव पहाड़ी / रोहतास क्षेत्र। राजा उत्तानपाद के पुत्र बालक ध्रुव ने भगवान विष्णु की कठिन आराधना कर अचल पद प्राप्त किया। गया क्षेत्र की ध्रुव पहाड़ी को उनकी बाल-तपस्या का ऐतिहासिक स्थल माना जाता है।काकभुसुंडि कल्प-व्यापी (त्रेता व द्वापर)। राजगीर व मंदार पर्वत क्षेत्र। परम रामभक्त काकभुसुंडि जी ने कल्पों तक निवास कर ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का उपदेश दिया। पक्षीराज गरुड़ के संशयों का निवारण कर उन्होंने रामचरित की अमर कथा सुनाई थी ।
च्यवन वैवस्वत मन्वंतर कैमूर/भोजपुर (चैनपुर) 'च्यवनप्राश' का आविष्कार, आयुर्वेद संवर्धन। विश्वामित्र त्रेतायुग सिद्धाश्रम (बक्सर) गायत्री मंत्र दर्शन, श्रीराम को दिव्यास्त्र शिक्षा, यज्ञ रक्षा।।ऋष्यश्रृंगी त्रेतायुग श्रृंगी धाम (लखीसराय) राजा दशरथ हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ का सफल संपादन। कश्यप सत्ययुग/प्रजापति काल गया एवं राजगीर सृष्टि के विस्तार हेतु यज्ञ अनुष्ठान एवं संस्कृति की नींव। मार्कण्डेय मन्वंतर-व्यापी कैमूर व सोन तट महामृत्युंजय साधना, काल पर विजय, मार्कण्डेय पुराण। लोमष कल्प-व्यापी बराबर पहाड़ियाँ (जहानाबाद) तीर्थयात्रा मार्गदर्शन, लोमश ऋषि गुफा साधना स्थल। और्व भार्गव मन्वंतर सोनभद्र तटीय क्षेत्र और्वाग्नि पर नियंत्रण, आग्नेयास्त्रों का ज्ञान।।मधुश्रवा वैदिक काल मगध (पटना/नालंदा) ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाओं का संपादन व गायन। उरुवेल पूर्व-बौद्ध काल उरुवेला (बोधगया) निरंजना तट पर कठोर तपोनिष्ठ आश्रम परंपरा।
ध्रुव स्वायंभुव मन्वंतर गया (ध्रुव पहाड़ी) बाल्यकाल में अनन्य विष्णु भक्ति से ध्रुव पद की प्राप्ति। काकभुसुंडि कल्प-व्यापी राजगीर/मंदार क्षेत्र गरुड़-संशय निवारण, अमर रामकथा के वक्ता। , बक्सर (सिद्धाश्रम): श्रीराम, विश्वामित्र, यज्ञ रक्षा और ताड़का वध है। दक्षिण बिहार के पौराणिक इतिहास में बक्सर का 'सिद्धाश्रम' प्रसंग स्वर्णिम पृष्ठ के समान है। यह वही स्थान है जहाँ भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी थी और कालांतर में महर्षि विश्वामित्र ने इसे अपनी साधना स्थली बनाया।
त्रेतायुग में जब महर्षि विश्वामित्र सिद्धाश्रम में लोक-कल्याणकारी महायज्ञ कर रहे थे, तब रावण कप्रेरित राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञवेदी में रक्त और अपवित्र वस्तुएं डालकर विघ्न डालते थे। यज्ञ की रक्षा हेतु विश्वामित्र अयोध्यापति राजा दशरथ के दरबार में पहुँचे और उनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा लक्ष्मण को माँगा। राजा दशरथ के हिचकिचाने पर महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया, जिसके बाद दोनों राजकुमारों को विश्वामित्र के साथ भेजा गया।
अयोध्या से चलते हुए गंगा-सरयू संगम पार करने पर एक भयानक वन आया, जो 'ताड़का वन' कहलाता था। यक्ष सुकेतु की पुत्री ताड़का सहस्र हाथियों का बल रखती थी और उसने संपूर्ण क्षेत्र में तबाही मचा रखी थी। जब ताड़का ने प्रहार किया, तब श्रीराम ने स्त्री होने के कारण उस पर शस्त्र चलाने में संकोच किया।
तब महर्षि विश्वामित्र ने धर्म का शाश्वत सिद्धांत स्पष्ट किया: "प्रजा को कष्ट देने वाले, धर्म का नाश करने वाले और आततायी का वध करना राजा और धर्मरक्षक का परम कर्तव्य है, चाहे वह स्त्री ही क्यों न हो।" गुरु की आज्ञा मिलते ही श्रीराम ने अपने बाण से ताड़का के वक्षस्थल का वेधन कर उसका वध कर दिया और संपूर्ण क्षेत्र को भयमुक्त किया। इसके पश्चात विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को सिद्धाश्रम ले आए। यहाँ ६ दिनों तक चलने वाले अखंड यज्ञ की सुरक्षा में दोनों भाई दिन-रात धनुष-बाण लेकर तत्पर रहे। छठे दिन जब मारीच और सुबाहु ने आकाश मार्ग से रक्त की वर्षा की, तब: श्रीराम ने बिना फल वाला 'मानवास्त्र' चलाया, जिससे मारीच सौ योजन दूर समुद्र पार जाकर गिरा। इसके बाद श्रीराम ने 'आग्नेयास्त्र' से सुबाहु का संहार कर दिया। लक्ष्मण जी ने 'वायव्यास्त्र' का प्रयोग कर शेष असुर सेना का अंत कर दिया ।
यज्ञ के निर्विघ्न संपन्न होने पर अत्यंत प्रसन्न होकर महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को अत्यंत दुर्लभ दिव्यास्त्र (जैसे जृंभणास्त्र, वारुणास्त्र) और उनके प्रयोग की गोपनीय विद्या प्रदान की।बक्सर में इस पौराणिक घटना से जुड़े अनेक ऐतिहासिक स्थल आज भी प्रासंगिक हैं:रामरेखा घाट: यज्ञ समाप्ति के बाद श्रीराम द्वारा गंगा स्नान करने और रेखा खींचकर पड़ाव बनाने का स्थल। अहिरौली (अहिल्या स्थान): सिद्धाश्रम से मिथिला जाते समय श्रीराम के चरण स्पर्श से माता अहिल्या के उद्धार का पावन स्थल है।
बौद्ध धर्म के अग्रश्रावक: सारिपुत्र और महामोद्गल्यायन (मुदगायन) - भगवान बुद्ध की कर्मभूमि रहे दक्षिण बिहार में बौद्ध संघ को सुदृढ़ करने का श्रेय उनके दो मुख्य और अग्रश्रावकों को जाता है—सारिपुत्र और महामोद्गल्यायन (मुदगायन)। इन्हें बौद्ध साहित्य में बुद्ध के "दाहिने और बाएँ हाथ" के रूप में वर्णित किया गया है। सारिपुत्र 6ठी सदी ईसा पूर्व (भगवान बुद्ध के समकालीन, लगभग 568 - 484 ई.पू.)।: जन्म एवं परिनिर्वाण स्थल नालंदा (प्राचीन नालक ग्राम)।: सारिपुत्र को बौद्ध संघ में 'धम्मसेनापति' (धर्म का सेनापति) की उपाधि दी गई थी। वे बुद्धि और प्रज्ञा में भगवान बुद्ध के पश्चात सर्वाधिक श्रेष्ठ माने जाते थ: बौद्ध दर्शन के सबसे गूढ़ और विश्लेषणात्मक भाग 'अभिधम्म पिटक' को लिपिबद्ध करने और उसकी व्यवस्था करने में सारिपुत्र का योगदान निर्णायक था। इनका जन्म नालंदा के समीप नालक ग्राम में हुआ था और इन्होंने अपना देहत्याग (परिनिर्वाण) भी यहीं किया था। कालांतर में सम्राट अशोक ने सारिपुत्र की अस्थियों पर एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया, जो आज नालंदा महाविहार के भग्नावशेषों में 'सारिपुत्र स्तूप' (स्तूप संख्या 3) के रूप में प्रसिद्ध है महामोद्गल्यायन / मुदगायन 6ठी सदी ईसा पूर्व (भगवान बुद्ध के समकालीन) जन्म एवं कार्यक्षेत्र कोलित ग्राम (राजगीर व नालंदा है। ऋद्धि-शक्तियों में सर्वश्रेष्ठ: बौद्ध संघ में महामोद्गल्यायन को 'ऋद्धिमंतों में सर्वोपरि' माना जाता था। उनके पास अलौकिक आध्यात्मिक शक्तियाँ और ध्यान की उच्च अवस्थाएँ थीं। जब भी बौद्ध संघ पर कोई आंतरिक या बाह्य संकट आता था (जैसे देवदत्त द्वारा संघ में फूट डालने का प्रयास), तब मोद्गल्यायन ने अपनी दृढता और विवेक से संघ की एकता को बनाए रखा।।सारिपुत्र के साथ जोड़ी: सारिपुत्र और मोद्गल्यायन दोनों बाल्यावस्था से ही घनिष्ठ मित्र थे। दोनों ने एक साथ संजय वेलट्ठिपुत्त के आश्रम को छोड़कर भगवान बुद्ध की शरण ली और बौद्ध धम्म के मुख्य आधार स्थल है।
दक्षिण बिहार की धरती केवल किसी एक संप्रदाय की नहीं, बल्कि विश्व की अनेक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक धाराओं की सह-अस्तित्व स्थली रही है:।सौर (सूर्य उपासना)।दक्षिण बिहार सूर्य पूजा का सबसे प्राचीन केंद्र रहा है। यहाँ के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर छठ पर्व और भानु सप्तमी के समय अगाध आस्था के केंद्र बनते हैं:
देव सूर्य मंदिर (औरंगाबाद): त्रेतायुगीन निर्मित माना जाने वाला पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर। ऑगारी व उलार सूर्य मंदिर (पटना/नालंदा): महर्षि सांब द्वारा स्थापित माने जाने वाले ऐतिहासिक द्वादश सूर्य पीठों में शामिल।।बेलाउर, हंडिया, बेगूसराय व पंडारक के सूर्य मंदिर है। वैष्णव एवं शैव परंपरा।वैष्णव: गया का विष्णुपद मंदिर, जहाँ भगवान विष्णु के पदचिह्न स्थित हैं।।शैव: गया का पितामहेश्वर, बराबर पहाड़ियों पर स्थित सिद्धनाथ मंदिर, अरवल का देवकुंड स्थित दूधेश्वर नाथ, तथा मदसर्वा का च्यवनेश्वर शिवलिंग। शाक्त (देवी उपासना) दक्षिण बिहार में शक्ति पूजा की अति प्राचीन परंपरा रही है: मुंडेश्वरी देवी (कैमूर): भारत के प्राचीनतम जीवंत मंदिरों में से एक (पंचमुखी शिवलिंग व देवी मुंडेश्वरी)।।मंगला गौरी (गया): प्रसिद्ध ५१ शक्तिपीठों में से एक (भस्म पहाड़ी पर स्थित)। पटनदेवी (पटना), सिद्धेश्वरी व बागेश्वरी (बराबर पर्वत), केसपा की तारा देवी, अरवल करपी की जगदंबा माता, नवादा का चामुंडा स्थान, और मुंगेर का चंडी स्थान है।।जैन संस्कृति: भगवान महावीर का जन्म वैशाली के समीप, ज्ञान एवं उपदेश राजगीर की पहाड़ियों पर, तथा निर्वाण पावापुरी के जलमंदिर में हुआ। सूफी परंपरा: मनेर शरीफ (हज़रत मख़दूम याह्या मनेरी), जहानाबाद के काको में बीबी कमलों की मज़ार, अरवल में सम्मान साहेब की मज़ार, तथा बिहार शरीफ के सूफी संत केंद्र। ईसाई संस्कृति: पटना स्थित 'पादरी की हवेली' (1713 ई.), जो बिहार का सबसे पुराना चर्च है। प्रेत संस्कृति: गया का प्रेतयोनि पर्वत, जहाँ यमराज और धर्मराज का मंदिर है और पितरों की मुक्ति हेतु प्रेत-श्राद्ध किया जाता है।
दक्षिण बिहार की यह ऐतिहासिक और पावन भूमि केवल भूगोल का एक टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता, दर्शन, विज्ञान और धर्म के निरंतर विकास की एक जीवंत गाथा है। मन्वंतर काल के ऋषियों—च्यवन, विश्वामित्र, ऋष्यश्रृंगी और मार्कण्डेय की तपस्या से पवित्र हुई यह माटी श्रीराम के दिव्यास्त्र अर्जन की साक्षी बनी। यहीं पर भगवान बुद्ध और महावीर को ज्ञान प्राप्त हुआ, तथा सारिपुत्र और मोद्गल्यायन जैसे महापुरुषों ने विश्व को प्रज्ञा और ऋद्धि का मार्ग दिखाया। नालंदा महाविहार की ज्ञान परंपरा से लेकर बक्सर के सिद्धाश्रम और गया के मोक्ष धाम तक, दक्षिण बिहार आज भी भारत के सांस्कृतिक गौरव का देदीप्यमान सूर्य बना हुआ है।
संदर्भ - श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकांड (सिद्धाश्रम प्रसंग, ताड़का वध तथा विश्वामित्र-श्रीराम संवाद)। महाभारत – वनपर्व (तीर्थयात्रा पर्व, लोमष ऋषि प्रसंग तथा मगध/राजगृह वर्णन)। श्रीमद्भागवत पुराण एवं मार्कण्डेय पुराण – मन्वंतर विवरण, कश्यप, च्यवन तथा मार्कण्डेय ऋषि चरित्र। त्रिपिटक (स्रुत, विनय एवं अभिधम्म पिटक) – पाली ग्रंथावली (सारिपुत्र व महामोद्गल्यायन का जीवन चरित तथा नालक ग्राम वर्णन)। बिहार का पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक वैभव – डॉ. उपेंद्र ठाकुर, बिहार ग्रंथ अकादमी। मगध का इतिहास – डॉ. राजबली पांडेय, विश्वविद्यालय प्रकाशन।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY