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युगद्रष्टा कृति 'रम्यवटी'

 

युगद्रष्टा कृति 'रम्यवटी': वेश्यावृत्ति के बहुआयामी यथार्थ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
साहित्य जब केवल संभ्रांत वर्ग के सुख-दुख, वैभव और काल्पनिक रूमानी दुनिया का माध्यम न रहकर समाज के सबसे उपेक्षित, कलंकित और अंधेरे कोनों में जीने वाले वर्ग को अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र बनाता है, तो वह केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं रह जाता। वह व्यवस्था के खिलाफ एक ज्वलंत वैचारिक दस्तावेज बन जाता है। प्रख्यात साहित्यकार डॉ. तारा सिंह की कृति 'रम्यवटी' हिंदी कथा-साहित्य में एक ऐसा ही क्रांतिकारी और साहसिक कदम है। यह उपन्यास वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी स्त्रियों के जीवन की विद्रूपताओं, उनकी रोज़मर्रा की कार्यशीलता और तथाकथित मुख्यधारा के समाज में उनकी 'अनचाही लेकिन अपरिहार्य' भूमिका को बेहद निर्भीकता और तटस्थता के साथ समाज के सामने रखता है। यह कृति इस शोषित वर्ग के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पहलुओं का ऐसा गहरा विश्लेषण करती है, जो पाठक को भीतर तक झकझोर कर रख देता है।
आमतौर पर परंपरावादी और रूढ़िवादी समाज वेश्यावृत्ति को केवल एक नैतिक पतन, धार्मिक पाप या सामाजिक कलंक के चश्मे से देखता आया है। समाज इस वर्ग को हेय दृष्टि से देखता है और इन्हें बस्तियों के सुदूर कोनों में निर्वासित कर देता है। लेकिन डॉ. तारा सिंह ने 'रम्यवटी' में इस स्थापित ढर्रे और संकीर्ण सोच से हटकर एक अत्यंत गंभीर, कड़वा और अकाट्य सच दुनिया के सामने रखा है।
उपन्यास की मूल स्थापना इस ओर इशारा करती है कि यह वर्ग भौगोलिक और सामाजिक रूप से समाज की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ होने के बावजूद, अनजाने में पूरे सामाजिक ताने-बाने को एक अदृश्य सुरक्षा प्रदान करता है:
पुरुष प्रधान समाज की जो अनियंत्रित, विकृत, हिंसक और भटकती हुई वासनाएँ हैं, यह शोषित वर्ग उन्हें विषपायी की तरह अपने भीतर सोख लेता है। यदि यह व्यवस्था (वेश्यावृत्ति का यह बाज़ार) न हो, तो समाज की ये हिंसक प्रवृत्तियाँ न जाने कितनी ही घरेलू, मासूम और असुरक्षित जिंदगियों को अपनी हवस का शिकार बना लें। इस प्रकार, लेखिका ने यह प्रतिपादित किया है कि यह वर्ग समाज की मर्यादा, पारिवारिक ढांचे और कुल-वधुओं की अस्मत को बिखरने से बचाने में एक 'अदृश्य ढाल' या 'सेफ्टी वाल्व' की तरह कार्य करता है। यह एक ऐसा कड़वा सच है जिसे स्वीकार करने में तथाकथित सभ्य समाज को हमेशा डर लगता है।
विवशता की कार्यशीलता बनाम देह का रोज़ाना हनन का उपन्यास इस रूढ़िवादी धारणा को पूरी तरह ध्वस्त करता है कि इस दलदल में फंसी स्त्रियां अपनी स्वेच्छा, विलासिता या आनंद के लिए यहाँ आती हैं। लेखिका ने अत्यंत संजीदगी से दिखाया है कि इन नारियों की कार्यशीलता और इस दलदल में उनका प्रवेश:।अत्यधिक सामाजिक क्रूरता,भयंकर आर्थिक लाचारी, पितृसत्तात्मक उत्पीड़न, और अपनों (प्रेमी, पति या रिश्तेदारों) द्वारा दिए गए धोखे व छल का सीधा परिणाम होती है।
जिसे व्यवस्था और सभ्य समाज बड़ी सहजता से 'धंधा' या 'पैसा कमाने का जरिया' कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है, वह वास्तव में एक जीवित स्त्री की आत्मा और उसकी देह का रोज़ होने वाला क्रूर और व्यवस्थित हनन है। यह एक ऐसा श्रम है जिसमें श्रमिक अपनी आत्मा को रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते हुए देखता है।
मानवीय संवेदनाओं का जीवित द्वीप।डॉ. तारा सिंह की सूक्ष्म दृष्टि इस बाज़ार के भीतर के उस मानवीय पक्ष को भी उजागर करती है जो बाहर की तथाकथित 'सभ्य' दुनिया में लुप्त हो चुका है। इस नारकीय परिवेश के भीतर रहने के बावजूद, ये स्त्रियां आपस में: गहरा सहयोग, एक-दूसरे के सुख-दुख के प्रति गहरी संवेदना, और उच्च स्तरीय 'मानवोचित गुण' (जैसे करुणा, ममत्व, बंधुत्व और त्याग) जीवित रखती हैं।
वे लड़कियाँ जो समाज द्वारा दुत्कारी गई हैं, वे आपस में एक ऐसा परिवार निर्मित करती हैं जहाँ बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे के आंसू पोंछे जाते हैं। ये वो मानवीय मूल्य हैं, जो आज के तथाकथित 'सभ्य, सुशिक्षित और संभ्रांत' मुख्यधारा के समाज में भी अत्यंत दुर्लभ हो चुके हैं, जहाँ हर रिश्ता पैसे और स्वार्थ की तराजू पर तोला जाता है।
'रम्यवटी' केवल शोषित स्त्रियों के जीवन की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाला कोई निराशावादी विलाप-काव्य नहीं है; यह उस दोगले और पाखंडी समाज के चेहरे से शालीनता का मुखौटा उतारने वाला एक तीखा वैचारिक प्रहार है।
समाज अपनी विकृतियों, कमियों और वासनाओं को छुपाने के लिए बड़ी सुगमता से इन स्त्रियों के मानवीय गुणों पर पर्दा डाल देता है। उन्हें 'अपवित्र', 'कुलटा' और 'अछूत' घोषित कर दिया जाता है, ताकि समाज के ठेकेदारों, धर्मगुरुओं और नैतिकता के प्रवक्ताओं की अपनी स्वघोषित 'पवित्रता' का भ्रम समाज में बना रहे।
लेखिका यहाँ एक अत्यंत ज्वलंत, तार्किक और अनुत्तरित प्रश्न उठाती हैं: "समाज अपनी दमित वासनाओं को तृप्त करने के लिए जिस बाज़ार को खुद निर्मित करता है, रात के अंधेरे में जिसका पोषण करता है, दिन के उजाले में उसी बाज़ार में रहने वालों को अपराधी और अछूत ठहराने का उसे क्या नैतिक अधिकार है?"
यह उपन्यास दिन के उजाले में नैतिकता, शील और मर्यादा का ढोंग करने वाले और रात के अंधेरे में उन्हीं बदनाम गलियों का रुख करने वाले 'सभ्य' पुरुषों के पाखंड को पूरी तरह नग्न कर देता है। यह दिखाता है कि बाज़ार के असली गुनाहगार वे नहीं हैं जो वहाँ बिकने को मजबूर हैं, बल्कि वे हैं जो खरीदार बनकर उस बाज़ार को ज़िंदा रखे हुए हैं।
डॉ. तारा सिंह की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता और सामर्थ्य यह है कि उन्होंने इस प्रकार के संवेदनशील, वर्जित और जटिल विषय को उठाते समय कहीं भी अश्लीलता, सतही सनसनीखेजता या सिसकते हुए 'मेलोड्रामा' का सहारा नहीं लिया है । भाषा-शैली अत्यंत सधी हुई, गंभीर, तत्समनिष्ठ, संयत और सीधे मर्म को छूने वाली है। पात्र केवल दया के पात्र या पीड़ित नहीं हैं, बल्कि वे व्यवस्था के खिलाफ सुलगते हुए सवाल हैं। पाठक पर प्रभाव पाठक इन पात्रों के प्रति केवल सतही सहानुभूति या तरस महसूस नहीं करता, बल्कि वह इस सड़ चुकी सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश और आत्मग्लानि से भर जाता है।
यह उपन्यास किसी सस्ते मनोरंजन या जिज्ञासा शांत करने के लिए नहीं पढ़ा जा सकता; यह पाठक को एक गहरे आत्ममंथन की ओर ले जाता है कि आखिर एक इंसान और एक ज़िम्मेदार समाज के तौर पर हम कब तक अपनी इस सामूहिक जिम्मेदारी और पाप से मुंह मोड़ते रहेंगे?
डॉ. तारा सिंह की कृति 'रम्यवटी' सामाजिक विद्रूपताओं, अंधेरों और पाखंड के बीच फंसी ज़िंदगियों का एक जीवंत, ईमानदार और विचलित कर देने वाला आईना है। वेश्याओं की कार्यशीलता, उनकी सामाजिक प्रासंगिकता और उनकी विवशताओं पर लेखिका का यह प्रगतिशील दृष्टिकोण हिंदी साहित्य में एक नए और क्रांतिकारी निर्णय की शुरुआत करता है।
यह पुस्तक और इस पर किया गया यह आलेख यह साबित करता है कि जब तक हमारा समाज अपने भीतर छिपे इस भयानक पाखंड को स्वीकार नहीं करेगा, जब तक वह पुरुषों की भटकती और हिंसक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए आंतरिक और नैतिक सुधार नहीं करेगा, तब तक 'रम्यवटी' जैसी कृतियाँ समाज की सोई हुई चेतना को झकझोरती रहेंगी। यह उपन्यास केवल पुस्तकालय की अलमारी में सजाने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को जगाने, रूढ़ियों को तोड़ने और एक अधिक मानवीय व संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए पढ़ा जाना अनिवार्य है।

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