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वीरांगना विश्पला का शौर्य और सौर-वैदिक साम्राज्य

 

वीरांगना विश्पला का शौर्य और सौर-वैदिक साम्राज्य

सत्येन्द्र कुमार पाठक।

मानव सभ्यता, संस्कृति और दार्शनिक चेतना के उद्गम स्थल के रूप में सप्त सिंधु (सप्त सैंधव) प्रदेश की ऐतिहासिकता अक्षुण्ण है। ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर आधुनिक पुरातात्विक उत्खननों तक, यह भू-भाग न केवल आदि-आर्यों की कर्मभूमि रहा है, बल्कि यह विश्व इतिहास का वह पहला रंगमंच है जहाँ विज्ञान, आध्यात्म, युद्ध-कौशल और प्रकृति-पूजा का अद्भुत समन्वय देखा गया। यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिम भारत और वर्तमान भारत और पाकिस्तान की सात पवित्र नदियों—सिंधु, सरस्वती, शतद्रु (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुष्णी (रावी), असिकनी (चिनाब) और वितस्ता (झेलम)—के प्रवाह से निर्मित एक अत्यंत उपजाऊ और समृद्ध गलियारा था।

वैदिक वास्तुकला, शल्य-चिकित्सा और शासन-प्रणाली के जो बीज यहाँ अंकुरित हुए, उन्होंने आगामी हज़ारों वर्षों के भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक इतिहास को दिशा दी। इस आलेख में हम सप्त सिंधु प्रदेश के आदि-साम्राज्य, वीरांगना विश्पला के ऐतिहासिक पराक्रम, सौर संप्रदाय के मूल और इस घाटी की बहु-सांस्कृतिक व सर्वसमावेशी उपासना पद्धति का विस्तृत और प्रामाणिक है । 

सप्त सिंधु प्रदेश का नामकरण एवं भौगोलिक विस्तार - सप्त सिंधु का नामकरण किसी एक राजा की घोषणा या राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम नहीं था, बल्कि यह इस क्षेत्र की अनूठी प्राकृतिक और भौगोलिक संरचना के प्रति यहाँ के ऋषियों की कृतज्ञता अभिव्यक्ति थी।।ऋग्वेद का नदी-सूक्त के अनुसार : ऋग्वेद के दसवें मंडल के ७५वें सूक्त (नदी-सूक्त) में इस क्षेत्र की जीवनदायिनी नदियों का अत्यंत काव्यात्मक और भौगोलिक वर्णन मिलता है। ऋषियों ने जब इस भू-भाग को सात विशाल जलधाराओं से घिरा पाया, तो इसे 'सप्त सिन्धवः' नाम दिया।।पारसी ग्रंथ 'जेंद अवेस्ता': सप्त सिंधु की भौगोलिक प्रसिद्धि इतनी व्यापक थी कि प्राचीन ईरानी (पारसी) धर्मग्रंथ 'जेंद अवेस्ता' में भी इस क्षेत्र का उल्लेख 'हफ़्त हेंदु' के रूप में मिलता है, जो भाषाई रूप से 'सप्त सिंधु' का ही रूपांतरण है।

नदियों की वैदिक एवं आधुनिक स्थिति - सप्त सिंधु प्रदेश की भौगोलिक सीमाएं इन सात नदियों के जलग्रहण क्षेत्र से तय होती थीं:।सिंधु: इस पूरे तंत्र की मुख्य नदी, जो अपनी विशालता के लिए जानी जाती थी।।सरस्वती: वैदिक संस्कृति की सबसे पवित्र और केंद्रीय नदी, जिसे 'नदीतमे' (नदियों में सर्वश्रेष्ठ) कहा गया। शतद्रु (आधुनिक सतलुज): राजा खेल और विश्पला के आख्यान से जुड़ी मुख्य नदी।विपाशा (आधुनिक व्यास): जल की प्रचुरता और औषधीय तत्वों से युक्त।परुष्णी (आधुनिक रावी): ऐतिहासिक 'दाशराज्ञ युद्ध' की गवाह।असिकनी (आधुनिक चिनाब): कृषि और परिवहन के लिए महत्वपूर्ण।वितस्ता (आधुनिक झेलम): उत्तर-पश्चिमी सीमा की रक्षक नदी है। सप्त सिंधु घाटी में सुसंगठित राज्य व्यवस्था और साम्राज्य की अवधारणा का विकास वैश्विक इतिहास में प्रथम माना जाता है। यहाँ का इतिहास लोक-कथाओं, पौराणिक आख्यानों और ऋग्वैदिक साक्ष्यों के अंतर्संबंधों से बुना गया है। जल प्रलय के बाद आदि राजा वैवस्वत मनु के इक्ष्वाकु वी चन्द्रवशी कुल का साम्राज्य विस्तार सम्राट भरत ने अखंड भारत की नींव डालने के बाद ऋग्वैदिक चक्रवर्ती सम्राट  राजा एवं दाशराज्ञ युद्ध के प्रणेता सुदास थे । 

वैवस्वत मनु और सभ्यता का पुनरुत्थान - सनातन इतिहास परंपरा के अनुसार, जब वैश्विक जलप्रलय  हुआ, तब संपूर्ण सृष्टि जलमग्न हो गई थी। भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की सहायता से आदि-पुरुष वैवस्वत मनु (जिन्हें लोकभाषा में 'मनवा' भी कहा जाता है) की नौका सुरक्षित बची।।जल शांत होने पर मनु की नौका हिमालय के शिखरों से उतरकर सर्वप्रथम इसी सप्त सिंधु प्रदेश में सरस्वती नदी के तट पर रुकी। यह कालखंड मानव इतिहास की गणना से परे और पौराणिक कालक्रम के अनुसार युगों प्राचीन है।। मनु ने प्रलय के पश्चात इस उजाड़ भूमि पर पुनः जीवन, कृषि, सामाजिक नियमों, न्याय व्यवस्था और यज्ञ परंपरा की नींव रखी। मनु की संतान होने के कारण ही इस धरा के जीव 'मानव' या 'मनुष्य' कहलाए। इस प्रकार, सप्त सिंधु का आदि-राज्य मनु की ही छत्रछाया में स्थापित हुआ। मनु के पश्चात इस भूमि पर पुरु, यदु, अनु, द्रुह्यु और तुर्वसु नामक पांच प्रमुख आर्य कुलों (पंचजन) का विस्तार हुआ। सम्राट भरत का अवदान: राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत ने इसी सप्त सिंधु क्षेत्र को केंद्र बनाकर एक विशाल, अखंड साम्राज्य की स्थापना की। उन्हीं के नाम पर इस पूरे भू-भाग का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा।।दाशराज्ञ युद्ध (१५००-२००० ईसा पूर्व): ऋग्वेद के सातवें मंडल में परुष्णी (रावी) नदी के तट पर लड़े गए ऐतिहासिक 'दस राजाओं के युद्ध' का वर्णन है। इसमें भरत वंश के प्रतापी राजा सुदास ने अपने मुख्य पुरोहित ऋषि वसिष्ठ के मार्गदर्शन में विरोधी दस राजाओं (आर्य और गैर-आर्य कबीलों के संघ) को परास्त किया। यह युद्ध इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि इस काल में सप्त सिंधु में एक सुदृढ़, केंद्रीय और चक्रवर्ती साम्राज्य का अस्तित्व स्थापित हो चुका था।

सप्तसिंधु  राजा खेल और वीरांगना विश्पला: शौर्य, वंश और ऐतिहासिक युद्ध - ऋग्वेद के प्रथम मंडल (सूक्त ११२, ११६, ११७, ११८) में वर्णित विश्पला का आख्यान विश्व इतिहास की एक अत्यंत विस्मयकारी और गौरवशाली घटना है। यह आख्यान न केवल तत्कालीन नारी के अद्भुत शौर्य को दर्शाता है, बल्कि यह सिद्ध करता है कि वैदिक काल में शल्य-चिकित्सा  और धातु-विज्ञान कितने उन्नत स्तर पर थे।

वैदिक संहिताओं और सायणाचार्य के भाष्यों के अनुसार, राजा खेल और विश्पला का परिचय निम्नलिखित है:

राजा खेल और उनकी पत्नी (या कुछ संदर्भों में संबंधी) विश्पला सप्त सिंधु के प्रसिद्ध चंद्रवंशी क्षत्रिय कुल की शाखा से संबद्ध थे। यह क्षेत्र पुरु और अनु राजाओं के प्रभाव में था, अतः इन्हें इन्हीं कुलों का वंशज माना जाता है। उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शक और कुलगुरु ऋषि अगस्त्य थे। राजा खेल का राज्य वर्तमान पंजाब के शतद्रु (सतलुज) नदी के तट पर स्थित था, जिसका विस्तार उत्तर-पश्चिम में गांधार की सीमाओं तक फैला हुआ था। विश्पला का ऐतिहासिक युद्ध ऋग्वैदिक काल के मध्य भाग में (लगभग १५०० ईसा पूर्व या उससे पूर्व) लड़ा गया था। यह भीषण संग्राम सप्त सिंधु प्रदेश के अंतर्गत शतद्रु नदी के मैदानी भागों में हुआ था। सप्त सिंधु राजा खेल के समृद्ध राज्य पर उनके चिर-प्रतिद्वंद्वी कबीलों, दस्युओं और सीमावर्ती लुटेरों ने अचानक आक्रमण कर दिया था। राजा खेल की सेना का नेतृत्व स्वयं वीरांगना विश्पला कर रही थीं।: यह एक रात्रि युद्ध (Night Warfare) था। शत्रु सेना ने कपटपूर्वक विश्पला को चारों ओर से घेर लिया और उन पर तीक्ष्ण अस्त्रों से प्रहार किया। इस भीषण संघर्ष में विश्पला का एक पैर पूरी तरह कटकर अलग हो गया। अश्विनी कुमारों का चमत्कार और 'आयसी जङ्घा' का प्रत्यारोपण है। पैर कट जाने के बाद भी विश्पला ने आत्मसमर्पण नहीं किया। कुलगुरु अगस्त्य और राजा खेल ने देव-चिकित्सक अश्विनी कुमारों (नासत्य और दस्त्र) का आह्वान किया। ऋग्वेद के मंत्र स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हैं कि अश्विनी कुमारों ने उसी रात युद्ध शिविर में ही एक अत्यंत जटिल शल्य-चिकित्सा को अंजाम दिया। उन्होंने कटे हुए पैर के स्थान पर लोहे या तांबे से निर्मित एक कृत्रिम पैर जोड़ दिया, जिसे ऋग्वेद में 'आयसी जङ्घा' ( aˉ yas ı -  ja n gh aˉ ) कहा गया है। “चरित्रं हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्। सद्यो जङ्घामायसीं विश्पलायै धने हिते सर्तवे प्रत्यधत्तम्॥” — (ऋग्वेद १.११६.१५) (अर्थात्: खेल राजा की खेल में शत्रु द्वारा काटे गए पैर के स्थान पर, अश्विनी कुमारों ने रात में ही विश्पला के लिए लोहे की जंघा फिट कर दी, ताकि वह पुनः युद्ध कर सके।)।अगली सुबह, विश्पला इस कृत्रिम अंग के सहारे न केवल खड़ी हुईं, बल्कि पुनः रणभूमि में उतरकर शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दिया और अपने राज्य का लूटा हुआ वैभव व धन वापस छीन लिया। यह घटना विश्व इतिहास में कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण (Prosthetics) का पहला लिखित दस्तावेज़ है।

सप्त सिंधु में सौर संप्रदाय: मूल संस्थापक और आदित्यों का साम्राज्य -  वैदिक चेतना में सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देवता और संपूर्ण ब्रह्मांड की जीवन-शक्ति हैं। सप्त सिंधु की भूमि पर ही सौर संप्रदाय के दार्शनिक और व्यावहारिक रूप का विकास हुआ। सौर संप्रदाय के आदि संस्थापक।-वैदिक सौर परंपरा के मूल प्रवर्तक स्वयं महर्षि कश्यप और उनके तेजस्वी पुत्र विवस्वान (सूर्य) माने जाते हैं।।कश्यप ऋषि ने सौर-विज्ञान, समय-चक्र और किरणों के औषधीय गुणों को संहिताबद्ध किया। ऐतिहासिक काल में, मगध और उत्तर-पश्चिम भारत में सूर्य पूजा को एक विशिष्ट संप्रदाय के रूप में स्थापित करने का श्रेय शाकद्वीपीय ब्राह्मणों (मगज) को जाता है, जिन्होंने प्राचीन सूर्य मंदिरों (जैसे मुल्तान का आदित्य मंदिर और कोणार्क) की स्थापना की और सौर संस्कृति को जीवित रखा।।देवमाता अदिति के 'विवस्वान' (आदित्य) का साम्राज्य - महर्षि कश्यप और देवमाता अदिति के गर्भ से बारह पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें 'द्वादश आदित्य' कहा जाता है। ये बारह आदित्य वर्ष के बारह महीनों के सूर्य के विभिन्न रूपों और ऊर्जाओं के प्रतीक हैं:।द्वादश आदित्य={धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा, विष्णु} इनमें से सप्त सिंधु प्रदेश और संपूर्ण पृथ्वी पर जिस आदित्य का प्रत्यक्ष साम्राज्य और शासन रहा, वे थे— विवस्वान।

विवस्वान और सूर्यवंश की नींव: विवस्वान के पुत्र ही वैवस्वत मनु (मनवा) थे। मनु ने ही सप्त सिंधु में सनातन संस्कृति के प्रथम साम्राज्य का संचालन किया। अतः इस क्षेत्र के जितने भी क्षत्रिय शासक हुए, वे सभी विवस्वान (सूर्य) के वंशज होने के कारण 'सूर्यवंशी' कहलाए। इस प्रकार, वैचारिक और वंशानुगत दोनों रूपों में सप्त सिंधु पर आदित्य विवस्वान का ही साम्राज्य था।

भगवान सूर्य का सप्त सिंधु पर अवदान और प्रभाव -  सप्त सिंधु प्रदेश की भौगोलिक समृद्धि, कृषि-क्रांति और आध्यात्मिक चेतना पर भगवान सूर्य का प्रभाव अत्यंत गहरा और बहुआयामी था।।भौगोलिक एवं पर्यावरणीय अनादि काल से निरंतर सूर्य की ऊष्मा से हिमालय के हिमनद (Glaciers) पिघले, जिसके परिणामस्वरूप सिंधु और सरस्वती जैसी विशाल नदियां बारहमासी जल से परिपूर्ण रहीं। इसने मरुस्थलीय क्षेत्रों को भी हरा-भरा बना दिया। आध्यात्मिक एवं मंत्र चेतना ऋग्वैदिक काल सप्त सिंधु के तपोवन में ही ऋषि विश्वामित्र ने सूर्य (सविता) की ऊर्जा को आत्मसात करते हुए महामंत्र 'गायत्री' का साक्षात्कार किया, जो आज भी भारतीय चेतना का मूल मंत्र है।।आरोग्य और चिकित्सा विज्ञान वैदिक युग ऋग्वेद के अनुसार सूर्य 'रोगनाशक' हैं। सूर्य की किरणें (सूर्योपासना) कुष्ठ और नेत्र रोगों को दूर करती हैं। सूर्यपुत्र अश्विनी कुमारों का चिकित्सा कौशल इसी सौर-ऊर्जा का व्यावहारिक रूप था।

समय एवं ऋतु चक्र (ऋत) दैनिक व्यवस्था सूर्य की गति के आधार पर ही वैदिक ऋषियों ने अयन (उत्तरायण-दक्षिणायन), मास, ऋतुओं (षडऋतु) और संवत्सर का निर्धारण किया, जिससे कृषि और यज्ञों के समय का सटीक आकलन संभव हुआ।। सप्त सिंधु घाटी की बहु-सांस्कृतिक उपासना पद्धतियां - सप्त सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सर्वसमावेशी धार्मिक चेतना थी। यहाँ किसी एक संकीर्ण मत या देवता का एकाधिकार नहीं था, बल्कि जड़ से लेकर चेतन तक, सूक्ष्म से लेकर स्थूल तक, प्रकृति के हर रूप को ईश्वरीय मानकर उसकी उपासना की जाती थी। सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्विक अवशेष और ऋग्वेद के सूक्त मिलकर इस बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने को स्पष्ट करते हैं: सौर: सूर्य को जगत का नेत्र और आत्मा मानकर 'सविता' रूप में पूजा गया। चंद्र (सोम): चंद्रमा को वनस्पतियों का स्वामी माना गया। ऋग्वेद का संपूर्ण नौवां मंडल (सोम मंडल) सोम की महिमा से भरा है, जो आनंद, शीतलता और मन की शुद्धि का प्रतीक है।।ब्रह्म: ऋषियों ने यह स्थापित किया कि समस्त देवताओं के पीछे एक ही परम सत्ता है, जिसे 'हिरण्यगर्भ' या 'ब्रह्म' कहा गया। शैव (रुद्र): सिंधु घाटी से प्राप्त 'पशुपति शिव' की मोहर, जिसमें एक त्रिमुखी पुरुष पशुओं से घिरा ध्यान मुद्रा में बैठा है, और ऋग्वेद में वर्णित 'रुद्र' की स्तुति, शैव धर्म के प्राचीनतम रूप को दर्शाती है।वैष्णव: ऋग्वेद में विष्णु को सूर्य के एक रूप में ब्रह्मांड को तीन कदमों में नापने वाले व्यापक देवता (उरुक्रम) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, जो आगे चलकर वैष्णव संप्रदाय का आधार बने। शाक्त (मातृदेवी): सिंधु घाटी के उत्खनन में मिली प्रचुर मातृ-मूर्तियाँ (Mother Goddess) और ऋग्वेद का प्रसिद्ध 'देवी सूक्त' (वाग्अम्भृणी सूक्त) इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि यहाँ प्रकृति को परम आद्या-शक्ति के रूप में पूजा जाता था। वायु को साक्षात् प्राण और वरुण देव के माध्यम से जल (आपः) को 'मातृतमा' (सर्वोच्च माता) माना गया। सिंधु घाटी का विशाल स्नानागार (Great Bath) जल की इसी धार्मिक पवित्रता का परिचायक है।: पीपल (अश्वत्थ), बरगद और नीम के वृक्षों को पूजनीय माना जाता था। मोहरों पर पीपल की पत्तियों के बीच देवता का अंकन प्रकृति और मनुष्य के अटूट संबंध को दिखाता है।।सप्त सिंधु में केवल एकरूप समाज नहीं था, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक विविधता थी:  ऋग्वेद के प्राचीनतम सूक्तों में 'असुर' शब्द नकारात्मक नहीं था; यह वरुण, मित्र और इंद्र के लिए 'तेजस्वी' या 'प्राणवान' के अर्थ में प्रयुक्त होता था। बाद में, सांस्कृतिक संघर्षों (जैसे भारत के आर्य बनाम ईरान के पारसी, जो अहुरमज्दा को मानते थे) के कारण यह शब्द देव-विरोधी खेमे के लिए रूढ़ हो गया। दैत्य और असुर संस्कृतियाँ भौतिक शक्ति, खगोल-विज्ञान और मायावी (तकनीकी) विद्याओं की उपासक थीं।

 दनु के वंशज दानव ( प्रकृति के जल को रोकने वाला वृत्रासुर) और यज्ञीय संस्कृति का विरोध करने वाले राक्षस कहलाए। ये मुख्यतः उन जनजातियों या प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक थे जो ऋत (वैश्विक नियम) को स्वीकार नहीं करते थे। नाग और खग: पृथ्वी की आंतरिक ऊर्जा के रूप में नागों की पूजा और आकाश के विस्तार के रूप में सुपर्ण (गरुड़) और हंस (विवेक के प्रतीक) जैसे पक्षियों (खग) को पूजनीय स्थान प्राप्त था।

जलप्रलय के समय मनु की नैया पार लगाने वाली 'मत्स्य चेतना' और पृथ्वी को संकट के दलदल से निकालने वाली 'वाराह' शक्ति को ईश्वरीय अवतार मानकर आदर दिया गया। यह इस बात का प्रतीक था कि ईश्वर केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि प्राणिमात्र के कल्याण के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकता है।

सप्त सिंधु प्रदेश की सभ्यता मानव इतिहास की वह स्वर्णिम चेतना है, जहाँ विज्ञान और आध्यात्म के बीच कोई टकराव नहीं था। यदि एक ओर महर्षि कश्यप और आदित्य विवस्वान के विचारों से पोषित सौर संप्रदाय ने संसार को समय, नियम और मर्यादा (मनु के माध्यम से) का पाठ पढ़ाया, तो दूसरी ओर शतद्रु के तट पर राजा खेल के राज्य में वीरांगना विश्पला ने कृत्रिम पैर (आयसी जंघा) के सहारे युद्ध जीतकर नारी शक्ति और शल्य-विज्ञान की विजय पताका फहराई। यह घाटी शैव, वैष्णव, शाक्त, नाग, वृक्ष और यहाँ तक कि असुर-दानव जैसी विविध युगीन संस्कृतियों की सह-अस्तित्व भूमि थी। इस सभ्यता का मूल मंत्र "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" और "ऋत"  की रक्षा था, जिसने इसे इतिहास की सबसे सहिष्णु, वैज्ञानिक और दीर्घजीवी संस्कृति बनाया।

संदर्भ ग्रंथ सूची - ऋग्वेद संहिता – (प्रथम मंडल: विश्पला आख्यान, सूक्त ११२, ११६; दशम मंडल: नदी-सूक्त ७५, देवी-सूक्त १२५)। सायणाचार्य भाष्य – ऋग्वेद संहिता पर सायणाचार्य का प्राचीन भाष्य (कृत्रिम जंघा प्रत्यारोपण के तकनीकी संदर्भ)। श्रीमद्भागवत पुराण एवं विष्णु पुराण – वैवस्वत मनु (मनवा), जलप्रलय, मत्स्य अवतार और सूर्यवंश/चंद्रवंश का कालक्रम। जेंद अवेस्ता – प्राचीन पारसी धर्मग्रंथ (सप्त सिंधु के 'हफ़्त हेंदु' नामकरण और असुर/अहुर चेतना के संदर्भ)।।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रिपोर्ट – सिंधु-सरस्वती घाटी उत्खनन (पशुपति मोहर, मातृदेवी की मूर्तियां, विशाल स्नानागार और वृक्ष पूजा के पुरातात्विक साक्ष्य)।

वैदिक संस्कृति का इतिहास – लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एवं भगवद्दत्त रिसर्च स्कॉलर (वैदिक कालक्रम और दाशराज्ञ युद्ध का ऐतिहासिक विश्लेषण)।

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