वैशाली का "बटेश्वरनाथ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार के वैशाली से भागलपुर तक फैला एक पौराणिक चमत्कार बाबा बटेश्वरनाथ है। आस्था की भूमि बिहार और बटेश्वर नाथ शैव संस्कृति स्थल और बिहार धरती को "ऋषि-मुनियों और देवताओं की कर्मभूमि" कहा जाता है। यहां हर गांव, हर नदी, हर वृक्ष के साथ कोई न कोई कथा जुड़ी है।।बटेश्वरनाथ नाम सुनते ही दो तस्वीरें सामने आती हैं - एक वैशाली के जंदाहा प्रखंड का धंधुआ गांव, जहां वट वृक्ष से शिवलिंग प्रकट हुए और जहां कच्चा बैंगन चढ़ता है। दूसरी भागलपुर के कहलगांव में गंगा के किनारे बसा बटेश्वर धाम, जिसे "गुप्त काशी" कहा जाता है।।"बटेश्वर" दो शब्दों से बना है - *"बट" = वट वृक्ष, बरगद* + *"ईश्वर" = शिव*। अर्थात "वट वृक्ष से प्रकट हुए ईश्वर"।।पुराणों में वट वृक्ष को अक्षय और अमर माना गया है। त्रेता युग में भगवान राम ने वनवास के समय वट वृक्ष के नीचे विश्राम किया। द्वापर में कृष्ण ने वट वृक्ष के नीचे गीता का उपदेश दिया। ऐसे में वट से शिव का प्रकट होना बिहार की लोक आस्था को और गहरा करता है। बटेश्वरनाथ का सबसे पुराना उल्लेख *ऋषि वशिष्ठ* से जुड़ा है। मान्यता है कि रघुकुल के गुरु वशिष्ठ ने यहीं घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें रघुकुल का कुलगुरु बनाया। इसी कुल में भगवान राम का जन्म हुआ।
वैशाली का बाबा बटेश्वरनाथ धाम - धंधुआ, जंदाहा: जिला वैशाली, प्रखंड जंदाहा, गांव धंधुआ उर्फ अंडवाड़ा। हाजीपुर से लगभग 40 किमी दूर है। लोक संस्कृति के अनुसार हजारों साल पहले यहां घना जंगल था। एक विशाल वट वृक्ष था। लगभग 150 वर्ष पहले यहां के पुजारी परिवार के पूर्वज राम इकबाल गिरी को स्वप्न आया कि "वट वृक्ष से शिवलिंग रूपी भगवान प्रकट हुए हैं, जाकर सेवा करो"।।जब लोग वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वट वृक्ष के तने से एक काले पत्थर का शिवलिंग स्वतः निकला हुआ है। किसी इंसान ने उसे स्थापित नहीं किया। इसलिए इसे *"स्वयंभू शिवलिंग"* कहा जाता है। पुजारी परिवार एवं स्वर्णिम कला केंद्र के अध्यक्षा कवयित्री डॉ ऊषा श्रीवास्तव के अनुसार आज उनकी 8वीं पीढ़ी यहां पूजा कर रही है।
बटेश्वर नाथ मंदिर कमेटी के अनुसार "मंदिर बंगाल के किसी जजमान ने बनवाया"*। 19वीं शताब्दी के मध्य में बंगाल से आने वाले श्रद्धालुओं ने चंदा कर पक्का मंदिर बनवाया। अंग्रेज काल में भी बंगाल और बिहार के बीच व्यापार और तीर्थ यात्रा का संबंध था, इसलिए यह संभव है। बैंगन समर्पण की अनूठी परंपरा है। देश में शायद ही कोई दूसरा शिव मंदिर होगा जहां *कच्चा बैंगन* चढ़ाया जाता हो।: कहा जाता है कि एक बार एक गरीब किसान के पास भगवान को चढ़ाने के लिए कुछ नहीं था। उसने खेत से तोड़कर 2 कच्चे बैंगन चढ़ा दिए। बाबा उसकी श्रद्धा से प्रसन्न हुए और उसकी मनोकामना पूरी की। तब से परंपरा चल पड़ी। भक्त मानते हैं कि जो भी मनोकामना मांगकर बैंगन चढ़ाता है, वह पूरी होती है। पूजा के बाद वही बैंगन प्रसाद बन जाता है। इसे घर ले जाकर खाने से रोग दूर होते हैं।।महाशिवरात्रि पर यहां 15 दिनों का विशाल मेला लगता है। तेजपत्ता, काष्ठ फर्नीचर और कृषि उपकरणों की बिक्री होती है। सावन में महुआ, हाजीपुर, समस्तीपुर से 15-20 किमी पैदल कांवड़ यात्रा होती है।
देवर्षि नारद, देव शिल्पी विश्वकर्मा और वास्तु पुरुष ने सबसे पहले *यहीं महादेव के निवास के लिए जगह चुनी थी*। लेकिन जब नाप हुई तो यह जमीन कैलाश से "एक जौ" कम निकली। इसी कारण काशी यहां नहीं बसी। इसलिए इसे *"गुप्त काशी"* कहते हैं।।ऋषि कोहल की तपोस्थली थी ।प्राचीन नाम* पहले बटेश्वर को *वशिष्ठेश्वर महादेव* कहा जाता था। सेन वंश*: *सन 1216 में बंगाल के सेन राजा* ने इस मंदिर का निर्माण कराया। सेन वंश 11वीं से 13वीं सदी तक बंगाल-बिहार पर राज करता था। वह शिव और शक्ति का उपासक था। सन 1272 में बंगाल के हुगली निवासी मथुरानाथ चट्टोपाध्याय* ने जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद समय-समय पर स्थानीय राजाओं और भक्तों ने मरम्मत कराई।यहां शिवलिंग के सामने पार्वती नहीं बल्कि *दक्षिणेश्वरी काली* का मंदिर है। इसलिए यह शक्ति पीठ और तंत्र पीठ भी है। भगवान बुद्ध ने यहां 3 महीने वर्षावास किया था। 84 मुनियों ने यहां साधना की थी।
: बैंगन समर्पण का वैज्ञानिक और सांस्कृतिक - बैंगन को संस्कृत में "वातिंगन" कहते हैं। आयुर्वेद में यह वात नाशक है। सावन में बैंगन खाना वर्जित है क्योंकि इसमें कीड़े ज्यादा होते हैं। लेकिन बटेश्वरनाथ में कच्चा बैंगन चढ़ाने के पीछे 3 कारण माने जाते हैं । कृषि प्रधान समाज*: वैशाली मगध काल से कृषि प्रधान रहा है। बैंगन यहां की मुख्य फसल है। किसान अपनी पहली फसल भगवान को समर्पित करता है। त्याग का प्रतीक*: बैंगन सस्ता है। गरीब से गरीब भी चढ़ा सकता है। शिव "भोले" हैं, उन्हें आडंबर नहीं, श्रद्धा चाहिए। तंत्र से जुड़ाव*: कुछ विद्वान मानते हैं कि काली के साथ बैंगन का संबंध तांत्रिक साधना से है।
: मन्वंतर काल से आधुनिक काल तक का कालक्रम में सतयुग-त्रेतायुग** ऋषि वशिष्ठ की तपस्या, रघुकुल से जुड़ाव लोकश्रुति , द्वापर-ऋषि काल ऋषि कोहल, दुर्वासा की तपोस्थली , बौद्ध काल में भगवान बुद्ध का 3 माह साधना स्थल को धम्म दाह व धमदहा स्थल बाद में बटेश्वर नाथ कहा गया है । मध्यकाल 1216 ई. में सेन राजा द्वारा भागलपुर मंदिर निर्माण, मध्यकाल 1272 ई.में मथुरानाथ चट्टोपाध्याय द्वारा जीर्णोद्धा , 18वीं सदी में राजा बदन सिंह द्वारा आगरा बटेश्वर निर्माण , 19वीं सदी मध्य बंगाल के जजमान द्वारा वैशाली मंदिर निर्माण मंदिर समिति आधुनिक काल में बिहार सरकार द्वारा मेला आयोजन, सुविधाएंमिला है। बटेश्वरनाथ और बिहार की सांस्कृतिक पहचान* है। सामाजिक समरसता में जाति-धर्म से ऊपर सभी आते हैं। पुजारी गिरी समाज से हैं। मेले से हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। तेजपत्ता और फर्नीचर का व्यापार प्रसिद्ध है। सरकार इसे "धार्मिक सर्किट" से जोड़ने की योजना बना रही है। वैशाली -
बटेश्वरनाथ हमें सिखाता है कि भगवान किसी संगमरमर के महल में नहीं, वट वृक्ष की जड़ में भी मिल सकते हैं। उन्हें सोने-चांदी नहीं, एक कच्चा बैंगन भी प्रिय है बशर्ते भाव सच्चा हो। वैशाली का बटेश्वर धाम "लोक आस्था" का प्रतीक है । ब्रिटिश साम्राज्य काल में बटेश्वर धाम में बटेश्वर चतपता ब्रांड का मुख्य केंद्र था ।
वट से प्रकटे देव, बैंगन से तृप्त हों देव। बटेश्वरनाथ की जय।
करपी , अरवल, बिहार 804419
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY