Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

उज्जैन के मौन तीर्थ पीठ

 

मौन की गूँज: उज्जैन के मौन तीर्थ पीठ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
अवंतिका नगरी, जिसे आज हम उज्जैन के नाम से जानते हैं, सदियों से मोक्षदायिनी और कालजयी रही है। यहाँ की मिट्टी में भगवान महाकाल का वास है और क्षिप्रा के जल में अमृत की बूंदें समाहित हैं। इसी पावन धरा पर 16 अप्रैल से 18 अप्रैल 2026 तक का मेरा प्रवास केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि स्वयं से साक्षात्कार का एक दिव्य अवसर सिद्ध हुआ। महाकाल की इस भूमि पर, जहाँ समय भी ठहर जाता है, वहाँ मौन तीर्थ पीठ के परिसर में बिताए गए तीन दिन आध्यात्मिक शांति और भारतीय जीवन शैली की गहराई में गोता लगाने के समान थे। मौन तीर्थ पीठ: प्रकृति और आध्यात्म का अनूठा सामंजस्य - क्षिप्रा नदी के पावन तट पर लगभग 10 एकड़ में फैला मौन तीर्थ पीठ का परिसर किसी आधुनिक ऋषि के आश्रम की भांति प्रतीत होता है। प्रवेश करते ही शोर थम जाता है और अंतर्मन की वाणी मुखर होने लगती है। यहाँ की हरियाली और शांति शहर के कोलाहल से कोसों दूर एक अलग ही लोक का अहसास कराती है। प्राकृतिक सान्निध्य: परिसर में फैले विशाल वृक्ष, हरे-भरे मैदान और पक्षियों का कलरव मन को स्वतः ही एकाग्र कर देता है। यहाँ मोर अपनी मस्ती में नृत्य करते हैं, बतखें और हंस जलाशय में तैरते हुए जीवन की सहजता का पाठ पढ़ाते हैं। चिड़ियों की चहचहाट यहाँ किसी मधुर संगीत की भांति कानो में पड़ती है।
ध्वनि का सौंदर्य का मंदिरों में बजती घंटियों और शंख की ध्वनियां वातावरण में एक विशेष ऊर्जा का संचार करती हैं। सुबह-शाम जब वेदों की ऋचाओं का पाठ होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात् ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही हो। : यहाँ का कल्पवृक्ष, मौनी बाबा का समाधि स्थल, नवग्रह मंदिर, हनुमान मंदिर, भगवान शिव और राम-जानकी-लक्ष्मण मंदिर अध्यात्म के जीवंत केंद्र हैं। यहाँ की 'मौन संस्कृति' केवल चुप रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के कोलाहल को शांत करने की एक साधना है।
महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. सुमनानंद गिरि जी का सान्निध्य - 18 अप्रैल 2026 का दिन मेरे जीवन के अविस्मरणीय दिनों में से एक रहा। इस दिन मुझे मौन तीर्थ पीठ के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. सुमनानंद गिरि जी महाराज के दर्शन और आशीर्वचन प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। महाराज श्री का व्यक्तित्व ज्ञान, करुणा और सौम्यता का संगम है। उनके सान्निध्य में प्राप्त हुए ग्रंथ और उपहार केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि ज्ञान के आलोक स्तंभ हैं। महाराज जी द्वारा आशीर्वचन के रूप में भेंट किए गए: मानस अर्चन: भगवान राम के चरित्र और आदर्शों का विवेचन। मानस सुमन अभिनंदन ग्रन्थ: संतों के प्रति श्रद्धा और उनके योगदान का दस्तावेज। सत्संग सुमन: सत्संग की महिमा और जीवन दर्शन का संग्रह। युगपुरुष की अध्यात्म यात्रा: मौनी बाबा के जीवन और साधना का प्रेरणादायक वृत्तांत। भगवान गंगाधर सदाशिव: अति प्राचीन तांत्रिक लिंग का प्रसाद रूप में मिलना मेरे लिए आध्यात्मिक सौभाग्य की पराकाष्ठा थी। महाराज जी ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में 'मौन' ही वह औषधि है जो मनुष्य के मानसिक और शारीरिक संतापों को हर सकती है।
मानस अर्चन: पत्रकारिता के माध्यम से सनातन का संदेश इस प्रवास के दौरान सम्मान समारोह में 'मानस अर्चन' पत्रिका के संपादकीय मंडल से मिलने का अवसर भी मिला। संपादक हिमांशु कौशिक, कार्यकारी संपादक सुधीर नागर, प्रबंध संपादक समीक्षा शर्मा और इंदर सिंह चौधरी की उपस्थिति ने इस बौद्धिक विमर्श को और गहरा कर दिया।
अप्रैल 2026 का अंक और उसकी प्रासंगिकता:'मानस अर्चन' हिंदी मासिक का अप्रैल अंक आध्यात्मिकता के पुनर्जागरण की दिशा में एक सशक्त कदम है। इसमें सम्मिलित आलेख समाज के हर वर्ग के लिए अनुकरणीय हैं: श्री मौन तीर्थ प्रबोधन: संपादकीय स्तंभ 'आधुनिक युग में आध्यात्मिकता का पुनर्जागरण: समय की पुकार' आज की सबसे बड़ी आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह बताता है कि कैसे तकनीक और तनाव के बीच हमें वापस अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। रामचरित मानस: मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की वर्तमान युग में उपयोगिता। मौनी बाबा संस्मरण: सिद्ध संत मौनी बाबा के जीवन के अनछुए पहलुओं और उनके द्वारा स्थापित मौन की महिमा का वर्णन। बाल संस्कार: आने वाली पीढ़ी को सनातन मूल्यों से जोड़ने का एक सराहनीय प्रयासहै।
मौन संस्कृति: एक जीवन पद्धति है। मौन तीर्थ पीठ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'मौन संस्कृति' है। यहाँ मौन को निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक सक्रिय साधना माना गया है। भारतीय जीवन शैली में मौन का अर्थ केवल वाणी पर नियंत्रण नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता है। जब हम मौन होते हैं, तो हमारी ऊर्जा बाहर नष्ट होने के बजाय भीतर की ओर मुड़ती है। यही कारण है कि इस पीठ के परिसर में कदम रखते ही एक अलौकिक शांति का अनुभव होता है। : आधुनिक विज्ञान भी अब मानता है कि मौन और ध्यान से रक्तचाप नियंत्रित होता है और तनाव के स्तर में कमी आती है। मौन तीर्थ पीठ का शांत वातावरण प्राकृतिक चिकित्सा का काम करता है।
: एक नई चेतना का उदय उज्जैन के मौन तीर्थ पीठ में बिताए गए ये तीन दिन मेरे जीवन के लिए एक पाथेय की तरह हैं। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. सुमनानंद गिरि जी के आशीर्वचन और 'मानस अर्चन' के माध्यम से प्राप्त ज्ञान ने मेरी चेतना को एक नई दिशा दी है। "मौन तीर्थ केवल एक स्थान नहीं है, यह एक अनुभूति है—यह वह स्थान है जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और सत्य का अनुभव शुरू होता है।" महाकाल की इस भूमि पर अध्यात्म और शांति का यह संगम हर जिज्ञासु को एक बार अवश्य अनुभव करना चाहिए। यहाँ से विदा लेते समय मेरे हृदय में एक ही संकल्प था—अपने भीतर के मौन को जीवित रखना और सनातन धर्म की इस गौरवशाली विरासत को अपने जीवन में उतारना।
जय महाकाल! जय मौन तीर्थ!
करपी , अरवल , बिहार 804419
मोबाइल नम्बर 9472987491

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ