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पलाश: भारतीय सभ्यता का शाश्वत प्रतीक

 

पलाश: भारतीय सभ्यता का शाश्वत प्रतीक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय वाङ्मय में 'ब्रह्मावृक्ष' और 'किंशुक' के नाम से पलास जाना जाता है, केवल एक वनस्पति नहीं अपितु भारतीय सांस्कृतिक और पारिस्थितिक तंत्र का एक केंद्रीय स्तंभ है। यह आलेख पलाश के उद्भव, वेदों से लेकर आधुनिक काल तक इसके क्रमिक विकास, और इसकी बहुआयामी उपयोगिता का शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पलाश की उत्पत्ति के विषय में 'पद्म पुराण' (सृष्टि खंड) और 'अग्नि पुराण' में विस्तृत उल्लेख मिलते हैं। पौराणिक शोध: पौराणिक संदर्भों के अनुसार, पलाश 'अग्नि' का पार्थिव स्वरूप है। जब देवताओं ने असुरों से रक्षा हेतु अग्नि देव का आह्वान किया, तब वे 'समिद्धर' (पलाश) के रूप में प्रकट हुए। त्रिमूर्ति सिद्धांत: के त्रिदल पत्तों के संरचनात्मक विन्यास पर शोध करने वाले विद्वान इसे 'ब्रह्मा, विष्णु और महेश' के सम्मिलित रूप का प्रतीक मानते हैं। मध्य का पत्ता विष्णु (पालक), बायां ब्रह्मा (सृजक) और दायां शिव (संहारक) का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए इसे 'ब्रह्मावृक्ष' की संज्ञा दी गई। वैदिक और शास्त्रीय कालखंड: ज्ञान का दंड - पलाश का सबसे प्राचीन लिखित प्रमाण ऋग्वेद और यजुर्वेद की संहिताओं में मिलता है। वैदिक सन्दर्भ: ऋग्वेद में इसे 'पर्ण' कहा गया है। यजुर्वेद (कपिष्ठल कठ संहिता) के अनुसार, सोम रस को छानने के लिए जिस पवित्र पात्र का उपयोग होता था, वह पलाश का बना होता था। शिक्षा पद्धति (विद्या): 'पारस्कर गृह्यसूत्र' और 'मनुस्मृति' के अनुसार, उपनयन संस्कार में ब्राह्मण वर्ण के बालक के लिए 'पलाश-दंड' अनिवार्य था। शोध बताते हैं कि पलाश की लकड़ी में चुंबकीय और आध्यात्मिक ऊर्जा संचय की क्षमता मानी जाती थी, जो विद्यार्थी की एकाग्रता में सहायक थी। यज्ञ विज्ञान: श्रौत सूत्रों के अनुसार, यज्ञ के मुख्य पात्र 'जुहू' और 'उपभृत' पलाश की लकड़ी से निर्मित होते थे। इसकी समिधा (ईंधन) जलने पर फॉर्मेल्डिहाइड जैसी गैसें मुक्त करती है, जो वायुमंडल को कीटाणुमुक्त (Sanitize) करती है। ऐतिहासिक युगों का विश्लेषण: सतयुग से ब्रिटिश काल तक - कालखंड महत्व और प्रासंगिकता सतयुग/त्रेता आध्यात्मिक प्रतीक, ऋषियों के आश्रमों का अनिवार्य वृक्ष। रामायण के 'अरण्य कांड' में पलाश के वनों का भौगोलिक साक्ष्य। द्वापर युग उत्सव धर्मिता का उदय। टेसू के फूलों से 'प्राकृतिक रंजक' (Natural Dye) का उपयोग कर होली खेलने की संस्कृति का विस्तार। मौर्य/गुप्त काल कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में वन-संपदा के रूप में पलाश का उल्लेख। आयुर्वेदिक संहिताओं (चरक/सुश्रुत) में इसका औषधीय मानकीकरण। मुगल काल उद्यानों में सौंदर्यपरक उपयोग। चित्रकला (Miniature Paintings) में पलाश के फूलों से बने रंगों का व्यापक प्रयोग। ब्रिटिश काल 1757 - प्लासी का युद्ध: यह स्थान 'पलाशी' (पलाश के वनों की अधिकता वाला स्थान) के नाम से जाना जाता था। क्लाइव और सिराजुद्दौला की सेनाओं के रक्त और पलाश के लाल फूलों का ऐतिहासिक संयोग भारतीय नियति का मोड़ बना। वानस्पतिक एवं वैज्ञानिक शोध (Botanical Taxonomy) पलाश पर आधुनिक वानस्पतिक शोध इसके तीन प्रमुख भेदों को रेखांकित करते हैं: ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (Butea monosperma): मुख्य वृक्ष, जिसे 'Flame of the Forest' कहा जाता है। ब्यूटिया सुपर्बा (Butea superba): लाल फूलों वाली लता (Lata Palash), जो अपनी कामशक्ति वर्धक गुणों के लिए विश्व स्तर पर शोध का विषय है।
ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा : सफेद फूलों वाली दुर्लभ लता, जिसे 'श्वेत पलाश' कहते हैं। तंत्र और आयुर्वेद में इसे 'दिव्य औषधि' माना गया है। रासायनिक घटक: शोध दर्शाते हैं कि पलाश के फूलों में 'ब्यूटिन' , 'ब्यूटिनिन' और 'आइसोब्यूटिन' जैसे फ्लेवोनोइड्स पाए जाते हैं, जो एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होतो है। बिहार के क्षेत्र में पलाश का ऐतिहासिक महत्व अद्वितीय है। बिहार की पहाड़ियों (हिल्स) और प्राचीन दुर्गों के चारों ओर पलाश के वनों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में इसे 'प्राकृतिक दुर्ग रक्षक' के रूप में भी देखा जाता था। लोक जीवन में मगध की 'पलाश संस्कृति' में इसे 'ब्रह्मोपनेता' माना जाता है। यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसके पत्तों से बनी पत्रावली (पत्तल) का उपयोग शुद्धता और पर्यावरण संरक्षण का प्राचीनतम मॉडल है। तंत्र विद्या और गूढ़ रहस्य में पलाश को तंत्र शास्त्र में 'पंच-पल्लव' में स्थान दिया गया है। पीला पलाश: शोधकर्ताओं और तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, पीले फूलों वाला पलाश एक 'उत्परिवर्तन' (Mutation) है जो अत्यंत दुर्लभ है। इसे 'दरिद्रता नाशक' माना गया है। पुष्प नक्षत्र: अनुराधा नक्षत्र में पलाश का पूजन और इसकी जड़ का औषधीय सेवन विशेष फलदायी माना जाता है।
आज के दौर में पलाश 'ग्लोबल वॉर्मिंग' के विरुद्ध एक योद्धा के रूप में उभरा है: पलाश की जड़ें नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं और बंजर भूमि (Saline Soil) को उपजाऊ बनाने में सक्षम हैं । पलाश से प्राप्त 'कमरकस' (गोंद) का निर्यात वैश्विक स्तर पर फार्मास्युटिकल और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में किया जा रहा है।
पलाश केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि भारत की 'कालजयी विद्या' का भौतिक रूप है। इसकी उत्पत्ति दैवीय है, इतिहास गौरवशाली है और भविष्य पारिस्थितिक रूप से सुरक्षित है। वेदों की ऋचाओं से लेकर प्लासी के मैदान तक और आयुर्वेद की संहिताओं से लेकर आधुनिक शोध प्रयोगशालाओं तक, पलाश ने अपनी प्रासंगिकता को निरंतर सिद्ध किया है। 'ब्रह्मावृक्ष' का संरक्षण वास्तव में भारतीय संस्कृति और प्रकृति के मध्य के प्राचीन अनुबंध का संरक्षण है।
संदर्भ - चरक संहिता (सूत्रस्थानम्) – महर्षि चरक। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) रिपोर्ट – ब्यूटिया प्रजाति विश्लेषण। पद्म पुराण – सृष्टि खंड (वृक्ष महिमा)। प्लासी का युद्ध: एक ऐतिहासिक विश्लेषण – जे.एन. सरकार। मगध की विरासत – क्षेत्रीय सांस्कृतिक अध्ययन।
करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

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