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मेहनत की रोटी

 

बाल एकांकी: मेहनत की रोटी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पात्र: मंगरू: १० वर्ष (मेहनती और समझदार) , झगडू: १२ वर्ष (थोड़ा चंचल, जिसे खेल-कूद पसंद है)
बुधना: ९ वर्ष (जिज्ञासु और पढ़ाई में तेज) ,बाबूजी: (मंगरू, झगडू और बुधना के पिता, एक स्वाभिमानी मजदूर)
माँ: (धैर्यवान और ममतामयी) ।
दृश्य १
(स्थान: गाँव के एक कच्चे मकान का आँगन। शाम का समय है। माँ चूल्हे पर खाना बना रही है। बुधना किताब लेकर बैठा है, जबकि झगडू और मंगरू मिट्टी के खिलौनों से खेल रहे हैं।)
झगडू: (झुँझलाकर) यार मंगरू, ये मिट्टी के खिलौने कब तक खेलेंगे? देख, पास वाले स्कूल के बच्चे कैसे गेंद-बल्ले से खेलते हैं। हमारे पास तो कुछ नहीं है।
मंगरू: झगडू भैया, बाबूजी दिन-भर धूप में पसीना बहाते हैं, तब जाकर हमारे पास ये किताबें और खाने का सामान आता है। हमें तो उनका शुक्रगुजार होना चाहिए।
बुधना: (बीच में टोकते हुए) हाँ भैया! आज स्कूल में मास्टर जी कह रहे थे कि मेहनत करने वाला इंसान ही असली नायक होता है। और हमारे बाबूजी तो नायक हैं!
माँ: (मुस्कुराते हुए) सही कहा बुधना ने। जो मेहनत की रोटी खाता है, उसका सिर हमेशा गर्व से ऊँचा रहता है।
दृश्य २
(बाबूजी का प्रवेश। उनके कंधे पर एक फावड़ा और गमछा है। वह थके हुए लग रहे हैं, लेकिन बच्चों को देखकर उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।)
बाबूजी: कैसे हैं मेरे लाल? आज पढ़ाई कैसी हुई?
मंगरू: (बाबूजी का हाथ पकड़कर) बहुत अच्छी बाबूजी! आप बैठिए, मैं पानी लाता हूँ।
(बाबूजी आँगन में बिछी एक खटिया पर बैठ जाते हैं। माँ पानी देती है।)
बाबूजी: आज शहर के बड़े बाबू पूछ रहे थे—"पढ़े-लिखे हो, फिर भी ये मजदूरी क्यों करते हो?" मैंने बस इतना ही कहा कि "बाबूजी, मजदूरी करना मजबूरी नहीं, गर्व है।"
(बाबूजी खड़े होकर अपनी फटी हुई कमीज की परवाह किए बिना जोश से कहते हैं:)
मैं मजदूर हूं।
बच्चों के खातिर करता परिश्रम,
उसी के लिए सारा जीवन समर्पण।
सारी दुनिया से लड़ता,
मजदूरी ही करता।
झगडू: (प्रभावित होकर) बाबूजी, क्या आपको कभी बुरा नहीं लगता कि आप इतना भारी काम करते हैं?
बाबूजी: (झगडू के सिर पर हाथ फेरते हुए) बेटा, काम कोई भी हो, छोटा नहीं होता। मजदूर ही है जो बड़े-बड़ेपुल और इमारतें बनाता है।
मैंने कष्ट सहा,
मजदूरी की।
बच्चों की परवरिश में,
कोई कमी न की।
दृश्य ३
(रात का समय। लालटेन की रोशनी में तीनों बच्चे पढ़ने बैठे हैं। माँ और बाबूजी उन्हें देख रहे हैं।)
बुधना: बाबूजी, मैं बड़ा होकर देश के लिए कुछ करना चाहता हूँ
बाबूजी: बेटा, तुम पढ़-लिखकर नेक इंसान बन जाओ, वही मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम होगा।
बच्चों को पाल पोसकर,
बनाया नेक इंसान।
सारे जहां से अच्छा,
अपना भारत महान।
माँ: देखो बच्चों, तुम्हारे बाबूजी ने कभी हार नहीं मानी। चाहे सर्दी हो या गर्मी, उन्होंने सिर्फ तुम्हारे भविष्य के लिए मजदूरी की है।
मंगरू: हम वादा करते हैं बाबूजी, हम आपकी मेहनत बेकार नहीं जाने देंगे। हम भी खूब मेहनत करेंगे।
बाबूजी: (भावुक होकर) शाबाश! याद रखना, देश हो या मेरे बच्चे, मैंने तुम्हारे और इस मिट्टी के स्वप्न साकार करने के लिए ही मजदूरी की है।
दृश्य ४
(सभी एक साथ मंच के केंद्र में खड़े होते हैं।)
बाबूजी: मैं मजदूर हूं।
बच्चे (एक साथ): और हम आपकी मेहनत की पहचान हैं!
(पर्दा गिरता है)
शिक्षा: श्रम ही जीवन का आधार है। ईमानदारी से की गई मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती और एक मजदूर ही समाज की असली नींव होता है।
करपी,अरवल, बिहार ८०४४१९
९४७२९८७४९१

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