मांधाता पर्वत व नर्मदा की सांस्कृतिक विरासत का संस्मरण
सत्येन्द्र कुमार पाठक
सृष्टि के आरंभ से ही भारतीय महाद्वीप की नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं रही हैं, बल्कि वे संस्कृति, अध्यात्म, दर्शन और स्थापत्य की प्रवाहमयी धारा रही हैं। मध्य भारत के विशाल भूभाग को सिंचित करने वाली पुण्यतोया नर्मदा (रेवा) की महिमा समस्त पौराणिक साहित्य में अद्वितीय मानी गई है। जहाँ देश की अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में लीन हो जाती हैं, वहीं नर्मदा जी भ्रंश घाटी (Rift Valley) के कठिन मार्गों को भेदती हुई पश्चिम दिशा की ओर अग्रसर होती हैं और अंततः गुजरात के भरूच के समीप खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में विलीन होती हैं। नर्मदा के 1,312 किलोमीटर के इस पावन प्रवाह क्षेत्र में अनगिनत तीर्थ, संगम और ऐतिहासिक नगर बसे हैं। किंतु मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित 'मांधाता पर्वत' (ओंकारेश्वर) का स्थान सर्वाधिक विलक्षण और अलौकिक है। यहाँ नर्मदा नदी और उसकी सहायक धारा 'कावेरी' (मध्य प्रदेश की कावेरी) के अद्वितीय संगम से प्राकृतिक रूप से 'ॐ' (ओंकार) के आकार वाले द्वीप का निर्माण होता है। यह मांधाता द्वीप केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह मन्वंतरों की तपोभूमि, पंचदेव परंपरा (सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, और वैष्णव) का केंद्र तथा विभिन्न महान भारतीय राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिर स्थापत्य का जीवन-ग्रंथ है। प्रस्तुत संस्मरण-आलेख में मांधाता पर्वत के प्राकट्य, इसके पौराणिक मन्वंतर कालीन इतिहास, विभिन्न राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिरों, नर्मदा के पावन संगमों, और नर्मदेश्वर शिवलिंग के वैशिष्ट्य का विस्तृत, प्रामाणिक और सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
पौराणिक मान्यताओं—विशेष रूप से नर्मदा पुराण, मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण (रेवा खंड)—के अनुसार नर्मदा जी का प्राकट्य सत्ययुग में हुआ था। कथा है कि एक बार देवाधिदेव भगवान शिव विंध्याचल और मैकल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य घोर तपस्या में लीन थे। उनकी काया से उत्पन्न पसीने (स्वेद-बिंदुओं) से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी और आनंददायिनी कन्या का प्राकट्य हुआ। भगवान शिव ने कन्या को आनंद प्रदान करने वाली देखकर उनका नाम 'नर्मदा' (नर्म = आनंद, दा = देने वाली) रखा। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर पृथ्वीलोक पर प्राणियों के पापों के क्षालन तथा उन्हें मोक्ष प्रदान करने हेतु नर्मदा जी को अमरकंठी या 'रेवा' के रूप में प्रवाहित किया गया।
नर्मदा जी की पौराणिक महिमा:"गंगा स्नाने तु पूतानि, काश्यां मरणान्मुक्तिः। स्मरणादेव नर्मदायाः, सर्वपापैः प्रमुच्यते॥"(अर्थात् गंगा में स्नान से, काशी में मरण से मोक्ष मिलता है; किंतु नर्मदा जी के केवल स्मरण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।)।मांधाता पर्वत का पौराणिक संबंध वैवस्वत मन्वंतर के महान सूर्यवंशी (इक्ष्वाकु वंश) चक्रवर्ती राजा मांधाता से है। राजा मांधाता ने इस पर्वत पर बैठकर सहस्रों वर्षों तक भगवान शिव की उग्र तपस्या की थी। उनके कठोर तपोबल और महायज्ञों से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष ने उन्हें दर्शन दिए और राजा मांधाता के अनुरोध पर लोक-कल्याण हेतु यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में सदा-सर्वदा के लिए विराजमान होना स्वीकार किया। तभी से इस पावन पर्वत को 'मांधाता पर्वत' कहा जाने लगा।
अमरकंटक में नर्मदा कुंड से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर 'सोनमुड़ा' नामक स्थान है, जहाँ से सोन नद (सोन भद्र) का उद्गम होता है। लोककथाओं और पौराणिक प्रसंगों के अनुसार, प्राचीन काल में नर्मदा और सोन भद्र के बीच निश्छल प्रेम था। किंतु किसी कारणवश सोन भद्र के मार्ग बदलने (या दासी जुहिला के मोह में पड़ने) के कारण नर्मदा जी अत्यंत रुष्ट हो गईं। उन्होंने अपना मार्ग बदलकर विपरीत दिशा (पूर्व के बजाय पश्चिम) की ओर एकाकी बहना शुरू कर दिया। यही कारण है कि नर्मदा भारत की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो पूर्व से पश्चिम की ओर कठोर चट्टानों को काटती हुई बहती है ।
सनातन संस्कृति में एक अत्यंत प्रसिद्ध और सिद्ध मान्यता है—"नर्मदा का हर कंकर, शिव शंकर है।" यह केवल एक लोक-विश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार समाहित है। पुराणों के अनुसार, जब नर्मदा जी ने स्वयं कठोर तपस्या की, तो भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि "हे नर्मदे! तुम्हारे जल के वेग में बहने वाला प्रत्येक पत्थर स्वतः ही बिना किसी पृथक प्राण-प्रतिष्ठा के शिवलिंग (नर्मदेश्वर) माना जाएगा।" नर्मदा नदी विंध्याचल और सतपुड़ा की कठोर चट्टानों के मध्य से तीव्र वेग के साथ बहती है। जल की निरंतर रगड़ और घर्षण से नदी की तलहटी में स्थित पत्थर प्राकृतिक रूप से चिकने, गोलाकार और अंडाकार (शिवलिंग के आकार में) ढल जाते हैं।।दैवीय चिह्नो युक्त नर्मदेश्वर पत्थरों पर प्राकृतिक रूप से जनेऊ, त्रिशूल, अर्धचंद्र, सूर्य या तिलक जैसी विविध रंगीन आकृतियाँ स्वतः उभर आती हैं। स्मृति ग्रंथों एवं शास्त्रों के अनुसार, नर्मदेश्वर शिवलिंग को घर या देवालय में स्थापित करने के लिए किसी तांत्रिक या वैदिक प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से 'स्वयंभू' और अनंत शिव-ऊर्जा से ओत-प्रोत माने जाते हैं।
. मांधाता पर्वत पर मन्वंतर से आज तक निर्मित प्रमुख मंदिर एवं निर्माणकर्ता साम्राज्य - मांधाता पर्वत (ओंकारेश्वर) भारतीय स्थापत्य कला, मूर्तिकला और धार्मिक इतिहास का एक ऐसा महाकोश है, जहाँ मन्वंतर कालीन पौराणिक काल से लेकर 18वीं-19वीं शताब्दी के होल्कर साम्राज्य तक लगातार मंदिरों का निर्माण, जीर्णोद्धार और विस्तार होता रहा। यहाँ मुख्य रूप से नागर शैली, भूमिश शैली और मराठा/होल्कर स्थापत्य शैली का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (मुख्य मंदिर)।संबद्ध साम्राज्य/शासक: पौराणिक काल में सूर्यवंशी राजा मांधाता; ऐतिहासिक काल में परमार राजवंश (10वीं-13वीं शताब्दी) और तत्पश्चात महारानी अहिल्याबाई होल्कर (18वीं शताब्दी)। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर मांधाता पर्वत के निचले हिस्से में नर्मदा तट पर स्थित है। मंदिर पाँच मंजिला है, जिसकी प्रत्येक मंजिल पर अलग-अलग देव विग्रह स्थापित हैं:।प्रथम तल: श्री ओंकारेश्वर (मूल ज्योतिर्लिंग) , द्वितीय तल: श्री महाकालेश्वर तृतीय तल: श्री सिद्धनाथ चतुर्थ तल: श्री गुप्तेश्वर। पंचम तल: श्री ध्वजधारी महादेव। परमार कालीन विशाल नक्काशीदार स्तंभ (Pillars) और गर्भगृह का भूमिश शैली का शिखर इसकी कलात्मक भव्यता को दर्शाता है। 18वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसका पुनरुद्धार करवाया और यहाँ प्रतिदिन 1,100 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करने की परंपरा शुरू की।।अमलेश्वर (ममलेश्वर) मंदिर परमार राजवंश (11वीं शताब्दी) तथा चौहान / भील नायक राजा। नर्मदा के दक्षिणी तट (शिवपुरी/अमलेश्वर क्षेत्र) पर स्थित यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। पौराणिक मान्यतानुसार ओंकारेश्वर और अमलेश्वर (ममलेश्वर) दोनों मिलकर एक ही ज्योतिर्लिंग का पूर्ण स्वरूप बनाते हैं ("एकं लिंगं द्विधा भिन्नम्")। यह शुद्ध परमार कालीन नागर/भूमिश स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके गर्भगृह, सभा मंडप और बाहरी दीवारों पर देव-कन्याओं, नर्तकियों और पौराणिक दृश्यों का सुंदर अंकन है।
सिद्धनाथ (सिद्धेश्वर) मंदिर: परमार राजवंश (10वीं से 12वीं शताब्दी)। यह मंदिर मांधाता पर्वत के ऊपरी पठार पर स्थित है। यद्यपि मध्यकाल में हुए आक्रमणों के कारण यह आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था, किंतु इसके अवशेष आज भी इसकी भव्यता की गवाही देते हैं।
इस मंदिर का आधार (Plinth) हाथियों की उकेरी गई मूर्तियों (गजाधर) से सुसज्जित है। इसके ऊंचे और विशाल स्तंभों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी परमार कालीन मूर्तिकला की पराकाष्ठा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। ऋणामुक्तेश्वर और ऋणमोचन मंदिर: होल्कर राजवंश एवं स्थानीय मराठा सूबेदार।। नर्मदा और कावेरी के संगम क्षेत्र के निकट स्थित इस मंदिर में दर्शन करने से जीव को पित्र ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। यहाँ विशेष रूप से कार्तिक और वैशाख मास में श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। गौरी सोमनाथ मंदिर (विशाल ममलेश्वर) परमार राजवंश तथा स्थानीय गोंड व चौहान राजा।: मांधाता पहाड़ी पर स्थित यह तीन मंजिला मंदिर एक अत्यंत विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। यह शिवलिंग काले चिकने कसौटी पत्थर (Basalt) से निर्मित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 6 फीट है। जनश्रुति है कि प्राचीन काल में इस शिवलिंग में देखने पर व्यक्ति को अपने पुनर्जन्म का आभास होता था।
चौबीस अवतार मंदिर और सप्तमातृका मंदिर परमार राजवंश (11वीं-12वीं शताब्दी)। मांधाता पर्वत पर स्थित यह मंदिर समूह सनातन धर्म की वैष्णव और शाक्त (देवी) परंपरा के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। यहाँ भगवान विष्णु के 24 अवतारों की अति सुंदर पाषाण प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। साथ ही ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा—इन 'सप्तमातृकाओं' का प्राचीन मंदिर स्थित है।।ओंकार मठ और शंकराचार्य गुफा आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) एवं राष्ट्रकूट / गुर्जर-प्रतिहार काल है।
मांधाता पर्वत की तलहटी में वह ऐतिहासिक गुफा स्थित है जहाँ जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा प्राप्त की थी और 'अद्वैत वेदांत' के सिद्धांत को सुदृढ़ किया था। हाल ही में यहाँ 108 फीट ऊँची आदि शंकराचार्य की प्रतिमा ('स्टैच्यू ऑफ वननेस' / एकात्मता की प्रतिमा) का निर्माण कर इस स्थल को अंतरराष्ट्रीय वेदांत केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। नर्मदा तट के प्रमुख ऐतिहासिक साम्राज्य, नगर और संगम - नर्मदा नदी केवल आध्यात्मिक चेतना की वाहक नहीं रही, बल्कि इसके तटों पर भारत के कई प्रतापी राजवंशों का वैभव पनपा। अमरकंटक से लेकर भरूच तक नर्मदा के किनारे कई ऐतिहासिक नगर और संगम स्थित है।माहिष्मती (महेश्वर) हैहय वंश (राजा सहस्रार्जुन), महारानी अहिल्याबाई होल्कर प्राचीन काल एवं 18वीं शताब्दी सहस्रार्जुन की प्राचीन राजधानी; महारानी अहिल्याबाई ने इसे होल्कर साम्राज्य की राजधानी बनाया, नर्मदा तट पर विशाल किला, महेश्वर घाट और रेशमी महेश्वरी साड़ियों की नींव रखी।।ओंकारेश्वर (मांधाता) सूर्यवंश (राजा मांधाता), परमार राजवंश, चौहान मन्वंतर काल, 10वीं–13वीं शताब्दी 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक; मांधाता द्वीप 'ॐ' आकृति में स्थित है।
त्रिपुरी (जबलपुर / तेवर) कलचुरी राजवंश (त्रिपुरी के कलचुरी) 9वीं से 12वीं शताब्दी कलचुरी राजाओं की राजधानी; नर्मदा के तट पर भेड़ाघाट (संगमरमर की चट्टानें), धुआँधार जलप्रपात और प्रसिद्ध 'चौसठ योगिनी मंदिर' का निर्माण। मंडला गोंड राजवंश (राजा हृदय शाह, रानी दुर्गावती) 16वीं–17वीं शताब्दी नर्मदा और बंजर नदी के संगम पर बसा नगर; गोंड राजाओं ने यहाँ मोती महल और अभेद्य दुर्ग बनवाए।
भृगुक्षेत्र (भरूच) मौर्य, गुप्त, सोलंकी/चौहान, मुग़ल प्राचीन काल से मध्यकाल तक प्राचीन 'भड़ौच' या 'भृगुकच्छ'—भारत का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री बंदरगाह, जहाँ से पश्चिम एशिया व रोम के साथ व्यापार होता था। केवड़िया (एकता नगर) आधुनिक भारत 21वीं शताब्दी नर्मदा पर स्थित सरदार सरोवर बाँध और विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' (सदार वल्लभभाई पटेल) का स्थल। है ।
5. नर्मदा की सहायक नदियाँ, प्रमुख संगम और तटवर्ती नगर - नर्मदा नदी के संपूर्ण 1,312 किलोमीटर के प्रवाह क्षेत्र में कुल 41 सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। इनमें से 22 नदियाँ बाएँ तट (सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला) से और 19 नदियाँ दाएँ तट (विंध्याचल पर्वत श्रृंखला) से आकर संगम बनाती हैं।।भ्रंश घाटी में बहने के कारण नर्मदा का प्रवाह अनूठा है। दक्षिण (सतपुड़ा) से आने वाली नदियाँ पहाड़ी वेग और प्रपात बनाती हुई आती हैं, जबकि उत्तर (विंध्याचल) से आने वाली नदियाँ शांत और मंद गति से आकर नर्मदा में विलीन होती हैं। भौगोलिक महत्व तवा नदी (नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदी बांद्राभान , जिला नर्मदापुरम (म.प्र.) नर्मदापुरम (होशंगाबाद) यह नर्मदा का सबसे विशाल संगम है। यहाँ प्रतिवर्ष प्रसिद्ध 'बांद्राभान मेला' आयोजित होता है। कावेरी नदी (मध्य प्रदेश वाली) ओंकारेश्वर, जिला खंडवा ओंकारेश्वर (मांधाता) कावेरी और नर्मदा का यह संगम मांधाता द्वीप ('ॐ' आकार) का निर्माण करता है। यहाँ कोटितीर्थ और ऋणमोचन संगम स्थित है। हिरन नदी सांकल / जबलपुर सीमा जबलपुर / पाटन दाएँ तट (उत्तर) से मिलने वाली प्रमुख नदी। जबलपुर का प्रसिद्ध भेड़ाघाट क्षेत्र इस संगम के निकट है। बरना नदी वामन घाट, जिला रायसेन बाड़ी / रायसेन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ भगवान विष्णु के 'वामन अवतार' से जुड़ा स्थल स्थित है। तंदोनी नदी पांडवद्वीप, जिला रायसेन रायसेन / सिलवानी क्षेत्र पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा पौराणिक संगम स्थल।।बंजर नदी मंडला, मध्य प्रदेश मंडला शहर बंजर और नर्मदा नदियाँ मंडला नगर को तीन ओर से घेरकर एक प्राकृतिक कुंडल बनाती हैं, जिसके मध्य गोंड किला स्थित है। शेर एवं शक्कर नदी नरसिंहपुर जिला, म.प्र. नरसिंहपुर / गाडरवारा सतपुड़ा की पहाड़ियों से निकलकर नरसिंहपुर के उपजाऊ मैदानी भाग में नर्मदा जी से संगम बनाती हैं। दूधी नदी होशंगाबाद-नरसिंहपुर सीमा पिपरिया / सोहागपुर के पास बाएँ तट से आकर नर्मदा में मिलने वाली प्रमुख सतपुड़ा कालीन नदी। ओरसांग नदी चांदोद, जिला वडोदरा (गुजरात) चांदोद / डभोई गुजरात में नर्मदा और ओरसांग का संगम अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसे 'गुजरात का प्रयाग' या प्रमुख 'पितृ-तर्पण स्थल' कहा जाता है।
भारत की अधिकांश नदियाँ (जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) मैदानी भागों से बहते हुए पूर्व दिशा की ओर जाती हैं और बंगाल की खाड़ी में गिरने से पूर्व विशाल डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हैं। किंतु नर्मदा नदी का भौगोलिक व्यवहार इससे पूर्णतः भिन्न है:। नर्मदा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर पश्चिम दिशा में बहती है।।नर्मदा नदी कठोर चट्टानी भ्रंश घाटियों के बीच से होकर बहती है। तीव्र ढलान और वेग के कारण यह अपने साथ भारी मात्रा में गाद जमा नहीं होने देती। समुद्र में विलीन होते समय नर्मदा जी डेल्टा बनाने के बजाय एश्चुअरी बनाती हैं। जहाँ नदी का ताजा मीठा जल और समुद्र का खारा जल आपस में सीधे टकराते हैं, उसे ज्वारनदमुख कहते हैं।अंतिम महा-संगम: गुजरात के ऐतिहासिक भरूच (Bharuch) जिले के समीप नर्मदा जी 'खंभात की खाड़ी' में जाकर अरब सागर में लीन हो जाती हैं। भरूच का विमलेश्वर और कबीरवड क्षेत्र इस अंतिम महा-संगम का साक्षी बनता है।
मांधाता पर्वत का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक: पंचदेव परंपरा का केंद्र है। मांधाता पर्वत केवल स्थापत्य या नदियों के संगम का स्थल नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की पंचदेव परंपरा और विविध आध्यात्मिक धाराओं का अद्वितीय संगम स्थल रहा है: शैव संप्रदाय: 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण यह अनादि काल से शैव परंपरा का सर्वोच्च केंद्र है। वैष्णव संप्रदाय: मांधाता पर स्थित विष्णु के चौबीस अवतारों का मंदिर और लक्ष्मी-नारायण मंदिर वैष्णव भक्तों की आस्था का केंद्र है।।शाक्त संप्रदाय: यहाँ स्थित सप्तमातृका मंदिर, महिषासुरमर्दिनी मंदिर और आनंद भैरवी मंदिर देवी शक्ति के उपासकों की सिद्ध पीठ हैं। सौर संप्रदाय: सूर्यवंशी सम्राट मांधाता की तपोभूमि होने के कारण यह सूर्य उपासना का भी ऐतिहासिक केंद्र रहा है। अद्वैत वेदांत की तपोभूमि: जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इसी मांधाता पर्वत पर अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया था और यहीं से संपूर्ण भारत में अद्वैत वेदांत का संदेश प्रसारित किया था।
जीवनदायिनी रेवा और मांधाता की अमर चेतना स्थल अमरकंटक की मैकल पहाड़ियों से प्रादुर्भूत होकर खंभात की खाड़ी तक बहने वाली नर्मदा जी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना की रीढ़ हैं। मन्वंतरों से लेकर आज तक मांधाता पर्वत पर परमार, कलचुरी, गोंड और होल्कर जैसे महान राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिर स्थापत्य भारतीय शिल्प शास्त्र के स्वर्ण युग को दर्शाते हैं। तवा, कावेरी, बरना, बंजर और ओरसांग जैसी 41 सहायक नदियों को अपने आँचल में समेटती हुई नर्मदा जी जहाँ प्राकृतिक समृद्धि लाती हैं, वहीं इसके तट पर स्थित नर्मदेश्वर पत्थर जन-जन को शिवत्व का बोध कराते हैं। मांधाता पर्वत पर गूंजती "हर हर नर्मदे, हर हर महादेव" की ध्वनि आज भी हर श्रद्धालु के हृदय में वही आनंद उत्पन्न करती है जो सत्ययुग में नर्मदा के प्रथम अवतरण पर उत्पन्न हुआ था। रेवा तट की यह यात्रा वास्तव में समय, इतिहास और अध्यात्म के असीम सागर में डुबकी लगाने के समान है।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY