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महापर्व: कांवर यात्रा

 

शैव भक्ति, तपस्या औरआस्था का। महापर्व: कांवर यात्रा

सत्येन्द्र कुमार पाठक।

सनातन धर्म की शैव संस्कृति में श्रावण (सावन) मास का महीना पूरी तरह से भगवान शिव की आराधना, साधना और प्रकृति के श्रृंगार को समर्पित होता है। इस पवित्र महीने में देश के कोने-कोने से करोड़ों शिव भक्त केसरिया वस्त्र धारण कर कठिन पैदल यात्रा पर निकलते हैं, जिसे कांवर यात्रा कहा जाता है। यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह अटूट आस्था, शारीरिक तपस्या, मानसिक संयम और सामाजिक समरसता का एक अद्भुत जीवंत उदाहरण है।।कांवर यात्रा की उत्पत्ति और परंपरा को लेकर हिंदू पौराणिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं में कई महत्वपूर्ण कथाएं प्रचलित हैं, जो इस यात्रा के आध्यात्मिक महत्व को और अधिक प्रगाढ़ बनाती हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, देवों और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान कई रत्न और वस्तुएं निकलीं, लेकिन साथ ही 'हलाहल' नामक अत्यंत घातक विष भी निकला। इस विष के प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि नष्ट होने लगी थी। तब संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस हलाहल विष को अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया। विष की प्रचंड उष्णता (गर्मी) के कारण शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए।

भगवान शिव जी के शरीर पर विष के प्रभाव और उसके ताप को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर पवित्र गंगाजल अर्पित किया। मान्यता है कि इसी पौराणिक घटना की स्मृति में आज भी कांवड़िये हर वर्ष सावन के महीने में पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

प्रथम कांवड़िया: भगवान परशुराम।- स्मृति ग्रंथों के अनुसार, पृथ्वी पर सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ लाकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था, जिससे इस यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित प्रसिद्ध पुरा महादेव मंदिर में गंगाजल लाकर शिव जी की आराधना की थी। आज भी सावन के दिनों में बागपत के इस मंदिर में लाखों कांवड़िये जल चढ़ाने पहुंचते हैं।

श्रवण कुमार और पितृ भक्ति - अपने माता-पिता की सेवा के लिए अमर हो चुके श्रवण कुमार का संबंध भी कांवर यात्रा की पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है। कथाओं के अनुसार, श्रवण कुमार ने अपने दृष्टिहीन माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें कांवड़ (एक प्रकार की बहंगी, जिसमें दोनों सिरों पर टोकरियाँ लटकी होती हैं) में बैठाकर देश के विभिन्न तीर्थस्थलों की यात्रा कराई थी। माना जाता है कि उन्होंने अपने माता-पिता को हरिद्वार में गंगा स्नान कराया और वहीं से जल लाकर शिव आराधना की थी।

लंकापति रावण की शिव भक्ति - एक अन्य पौराणिक प्रसंग के अनुसार, परम शिवभक्त रावण ने भी कांवड़ के माध्यम से पवित्र गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था। रावण ने अपनी तपोशक्ति और कांवड़ यात्रा के जरिए शिव जी को प्रसन्न किया था, जिससे इस परंपरा को और अधिक बल मिला।

कांवर यात्रा के दौरान श्रद्धालु देश की पवित्र नदियों से जल उठाते हैं और लंबी पैदल यात्रा तय करके विभिन्न प्रमुख शिव मंदिरों, उप-ज्योतिर्लिंगों और ज्योतिर्लिंगों तक पहुंचते हैं। इस यात्रा के मुख्य स्रोत स्थल उत्तराखंड के हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री औरप्रयागराज जैसे पवित्र स्थान हैं। यहाँ से जल भरकर कांवड़िये उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के विभिन्न शिव मंदिरों तक नंगे पांव यात्रा करते हैं। उत्तर प्रदेश का बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर इस मार्ग का एक प्रमुख केंद्र है।सुल्तानगंज से देवघर (बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग) मार्ग - पूर्वी भारत में कांवर यात्रा का सबसे बड़ा केंद्र बिहार का भागलपुर जिला है।।सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा: यहाँ की उत्तरवाहिनी गंगा (अजगैबीनाथ) से लाखों श्रद्धालु पवित्र जल भरते हैं। देवघर की यात्रा: सुल्तानगंज से जल उठाने के बाद कांवड़िये लगभग 105 किलोमीटर की कठिन और लंबी पैदल यात्रा तय करके झारखंड के देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ (रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग) पहुँचते हैं और वहाँ बाबा का जलाभिषेक करते हैं। यह मार्ग पूरी यात्रा के दौरान "बोल बम" के नारों से गूंजता रहता है।।बिहार में सुल्तानगंज के अलावा कई अन्य प्रसिद्ध स्थान भी हैं जहाँ सावन के महीने में कांवड़ियों का तांता लगा रहता है:।देवकुंड (औरंगाबाद): औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड में स्थित उप-ज्योतिर्लिंग बाबा दूधेश्वरनाथ पर पटना के गायघाट से गंगाजल लेकर कांवड़िये जलाभिषेक करते हैं। सिद्धेश्वरनाथ (जहानाबाद): जहानाबाद जिले के बराबर पर्वत समूह की सूर्यांक गिरि पर अवस्थित सिद्धेश्वरनाथ मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जल चढ़ाने आते हैं।।बाबा गरीबनाथ (मुजफ्फरपुर): मुजफ्फरपुर का यह प्रसिद्ध मंदिर उत्तरी बिहार का प्रमुख शिव केंद्र है, जहाँ सावन मास में लाखों कांवड़िये अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जल अर्पित करते हैं।

कांवर यात्रा केवल चलना नहीं है, बल्कि यह आत्म-संयम, पवित्रता और अनुशासन की एक कठिन परीक्षा है। यात्रा के दौरान कुछेक नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है: केसरिया वस्त्र: इस यात्रा में शामिल होने वाले सभी श्रद्धालु पूरी तरह से सात्विकता और त्याग के प्रतीक 'केसरिया' या भगवा वस्त्र धारण करते हैं। कांवड़ (जिसमें जल के पात्र बंधे होते हैं) को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता है। विश्राम के समय इसे किसी ऊंचे स्थान, स्टैंड या पेड़ पर टांगा जाता है ताकि इसकी पवित्रता बनी रहे।

कांवड़िये बिना चप्पलों या जूतों के, नंगे पांव ही सैकड़ों किलोमीटर की लंबी दूरी तय करते हैं।

सात्विक जीवनशैली: यात्रा के दौरान पूरी तरह से शाकाहारी और सात्विक भोजन किया जाता है। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और किसी भी तरह के व्यसन से पूरी तरह दूरी बनाई जाती है। "बोल बम" का उद्घोष: यात्रा मार्ग पर थकान और कठिनाइयों को भूलकर भक्त केवल "बोल बम", "कांवरिया बम" और "हर-हर महादेव" के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं । यह यात्रा समाज के हर वर्ग, जाति और उम्र के लोगों को एक सूत्र में पिरोती है। जब अमीर-गरीब, युवा-बुजुर्ग सभी एक रंग में रंगकर एक ही धुन पर आगे बढ़ते हैं, तो कांवर यात्रा भारतीय संस्कृति की उस सनातन एकता का दर्शन कराती है जो समय की हर सीमा से परे है।

करपी , अरवल , बिहार 804419।


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