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सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रणेता तिलक

 

सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रणेता तिलक

सत्येन्द्र कुमार पाठक 

अंग्रेजी सरकार के कड़े कानूनों और सभाओं पर लगी रोक से निपटने के लिए तिलक ने बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए धार्मिक व सांस्कृतिक उत्सवों को जन-जागरण का माध्यम बनाया:।सार्वजनिक गणेशोत्सव (1893): घरों तक सीमित रहने वाली गणपति पूजा को उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर ला खड़ा किया, जहाँ लोग एकत्रित होकर देश की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा कर सकें। शिवाजी महोत्सव (1895)का प्रारंभ का  युवाओं में राष्ट्रीय स्वाभिमान, साहस और देशभक्ति की भावना भरने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती को व्याप करना था। कॉले उनमें नेतृत्व क्षम थीं।। विभाज।क्रांति-सूर्य लोकमान्य तिलक: भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक और भावी पीढ़ी के पथप्रदर्शक "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा!"

वर्ष 1916 में कही गई यह सिंहगर्जना केवल एक राजनीतिक नारा नहीं थी, बल्कि वह महामंत्र था जिसने सदियों की गुलामी से सुप्त पड़ी भारतीय चेतना को झकझोर कर जगा दिया। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में दर्ज है, जिन्होंने राष्ट्रवाद की अमूर्त धारणा को एक जीवंत और व्यापक जन-आंदोलन का रूप दिया। वे न केवल एक निडर स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक प्रखर पत्रकार, दूरदर्शी शिक्षाविद, संस्कृति के संवाहक और युवाओं तथा बाल पीढ़ी के महान पथप्रदर्शक भी थे। ब्रिटिश पत्रकार वैलेंटाइन शिरोल ने उन्हें 'भारतीय असंतोष का जनक' कहा, तो देश की जनता ने उन्हें अपने हृदय में स्थान देकर 'लोकमान्य' (जनता द्वारा स्वीकृत) की अमर उपाधि से अलंकृत किया।

बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गांव में एक संभ्रांत और सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। उनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक शिक्षक और संस्कृत के विद्वान थे। बाल्यकाल में तिलक को घर में 'बाल' कहा जाता था और उनका मूल नाम केशव था।

कुशाग्र बुद्धि व निडरता: बचपन से ही तिलक की प्रतिभा विलक्षण थी। गणित और संस्कृत विषयों में उनका ज्ञान अद्भुत था। असत्य और अन्याय के प्रति उनका विरोध बाल्यकाल से ही स्पष्ट दिखाई देता था।।उच्च शिक्षा: वर्ष 1877 में उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित डेक्कन कॉलेज से गणित में स्नातक (B.A.) किया और 1879 में एल.एल.बी. (L.L.B.) की उपाधि प्राप्त की। वकालत की डिग्री होने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों की सेवा में जाने के बजाय देशसेवा और राष्ट्र-निर्माण के मार्ग को चुना।

लोकमान्य तिलक का दृढ़ विश्वास था कि जब तक किसी देश की युवा और बाल पीढ़ी मानसिक रूप से स्वाधीन और शिक्षित नहीं होगी, तब तक देश की वास्तविक स्वतंत्रता संभव नहीं है। उन्होंने मैकाले की उस शिक्षा नीति का कड़ा विरोध किया जो केवल सरकारी क्लर्क पैदा करने के लिए बनाई गई थी।

न्यू इंग्लिश स्कूल (1880): बच्चों को सस्ती, गुणवत्तापूर्ण और राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत शिक्षा देने के उद्देश्य से उन्होंने पुणे में इसकी स्थापना की। डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी (1884): युवाओं के चरित्र-निर्माण और सस्ती उच्च शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने गोपाल गणेश आगरकर और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर इस संस्था का गठन किया। इसी के अंतर्गत प्रसिद्ध फर्ग्यूसन कॉलेज (1885) की स्थापना हुई, जहाँ भारतीय मूल्यों के साथ आधुनिक विज्ञान की शिक्षा दी जाने लगी।

 बाल पीढ़ी में राष्ट्र-प्रथम के संस्कार का तिलक ने बच्चों और युवाओं को सिखाया कि शिक्षा का ध्येय केवल व्यक्तिगत नौकरी या जीविका कमाना नहीं, बल्कि समाज और देश की निस्वार्थ सेवा करना है। उन्होंने युवाओं के शारीरिक विकास के लिए अखाड़ों और व्यायामशालाओं को बढ़ावा दिया ताकि एक स्वस्थ और निडर युवा पीढ़ी का निर्माण हो सके।

जन-जन तक स्वाधीनता की चेतना पहुँचाने के लिए तिलक ने पत्रकारिता को अपना मुख्य अस्त्र बनाया। उन्होंने दो प्रमुख समाचार पत्रों का संपादन और प्रकाशन शुरू किया: केसरी (मराठी): यह पत्र आम जनता की भाषा में लिखा जाता था। इसके माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों पर करारे प्रहार किए और आम नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया।द मराठा (अंग्रेजी): यह पत्र शिक्षित वर्ग और ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारियों तक भारतीय दृष्टिकोण और मांगों को स्पष्ट रूप से पहुँचाने का कार्य करता था।

तिलक की लेखनी में इतनी धार थी कि 'केसरी' के लेखों को पढ़कर लाखों युवा देश पर मर-मिटने के लिए तैयार हो जाते थे। अंग्रेजी हुकूमत ने राजनीतिक सभाओं और रैलियों पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। तिलक ने इस चुनौती का उत्तर देते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक मंचों को जन-समूह को एकजुट करने का माध्यम बनाया: सार्वजनिक गणेशोत्सव (1893): घरों के भीतर सीमित रहने वाली गणपति पूजा को तिलक ने एक सार्वजनिक सामाजिक उत्सव का रूप दिया। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न जातियों और वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाना और उनमें राष्ट्रीय चेतना जगाना था। उत्सव के दौरान बालकों और युवाओं की 'मेला मंडलियां' देशभक्ति के गीत और नाटक प्रस्तुत करती थीं।

शिवाजी महोत्सव (1895): छत्रपति शिवाजी महाराज के साहस, शौर्य और 'स्वराज्य' के आदर्शों से युवाओं को प्रेरित करने के लिए उन्होंने शिवाजी महोत्सव की शुरुआत की। इसने युवाओं में राष्ट्रीय स्वाभिमान की एक नई लहर पैदा की।।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती वर्षों में जब 'उदारवादी' नेता अंग्रेजों के सामने याचिकाएं और प्रार्थना पत्र  देने की नीति अपनाते थे, तब तिलक ने इस दृष्टिकोण को 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' कहकर इसका तीव्र विरोध किया। उन्होंने लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर 'लाल-बाल-पाल' ऐतिहां सिक त्रिमूर्ति बनाई और 'गर्म दल' का नेतृत्व किया। उनकी स्पष्ट अवधारणा थी कि स्वतंत्रता मांगने से नहीं, बल्कि अपने अधिकार से छीनकर ली जाती है। 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने पूरे देश में 'स्वदेशी' और 'बहिष्कार' आंदोलन का तीव्र नेतृत्व किया। 

1908 में मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद क्रांतिकारियों के समर्थन में 'केसरी' में निर्भीक लेख लिखने के आरोप में अंग्रेजों ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। उन्हें 6 वर्ष के कठोर कारावास की सजा देकर बर्मा (म्यांमार) की मांडले जेल भेज दिया गयमांडले जेल की सीलन भरी कोठरी और अस्वस्थ वातावरण में भी तिलक का मनोबनहीं टूटा। जेल में बिताए वर्षों के दौरान उन्होंने अपनी अमर कृति 'गीता रहस्य' लिखी। इसमें उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के 'कर्मयोग' की तार्किक और व्यावहारिक व्याख्या की। उन्होंने देशवासियों को संदेश दिया कि निष्क्रियता त्यागकर राष्ट्र-रक्षा के लिए कर्म करना ही सबसे बड़ा धर्म है। . होमरूल आंदोलन और अंतिम वर्ष 1914 में जेल से रिहा होने के बाद तिलक ने पुनः पूरी ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाली:होमरूल लीग (1916): डॉ. एनी बेसेंट के साथ मिलकर उन्होंने 'अखिल भारतीय होमरूल लीग' की स्थापना की। इसका मुख्य लक्ष्य भारत के लिए 'स्वशासन' प्राप्त करना था। इसके तहत उन्होंने देश भर का भ्रमण किया और स्वराज्य का अलख जगाया।।लखनऊ समझौता (1916): राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए उन्होंने कांग्रेस के दोनों धड़ों (गर्म दल और नरम दल) तथा मुस्लिम लीग को एक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।,           'लोकमान्य', 'भारतीय असंतोष के जनक' ,ऐतिहासिक नारा       "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।" प्रमुख समाचार पत्र       केसरी (मराठी) एवं द मराठा (अंग्रेजी) ,प्रमुख रचनाएँ   गीता रहस्य, द आर्कटिक होम इन द वेदास , शैक्षणिक योगदान   न्यू इंग्लिश स्कूल, है।

9महाप्रयाण और अमर विरासत।1 अगस्त 1920 को मुंबई में इस महान राष्ट्रनायक का निधन हो गया। उनके निधन का समाचार मिलते ही संपूर्ण देश शोक में डूब गया। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोगों का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ा। महात्मा गांधी ने उन्हें "आधुनिक भारत का निर्माता" कहकर नमन किया, वहीं पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें "भारतीय क्रांति का जनक" स्वीकार किया है।।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में एक युग थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अभिजात्य वर्ग के कमरों की परिचर्चाओं से बाहर निकालकर खेत-खलिहानों, कारखानों और आम जनता के बीच पहुँचाया। शिक्षा, संस्कृति, पत्रकारिता और युवा-संगठन के माध्यम से उन्होंने राष्ट्र की जो सेवा की, वह अमर है। उनका जीवन और उनका कालजयी नारा "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" आज भी हर भारतीय के हृदय में राष्ट्र-भक्ति और स्वाभिमान की ज्योति जलाता रहता है।

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