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चंपारण के नायक: पंडित राजकुमार शुक्ल और महात्मा गांधी

 

चंपारण के नायक: पंडित राजकुमार शुक्ल और महात्मा गांधी

लेखक: सत्येन्द्र कुमार पाठक

सार-संक्षेप

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनके बिना इतिहास का रुख मोड़ना असंभव था। पश्चिमी चंपारण के एक साधारण किसान पंडित राजकुमार शुक्ल ऐसे ही नायक थे। उनकी अटूट निष्ठा, सत्यनिष्ठा और 'जिद' ने महात्मा गांधी को चंपारण आने पर विवश किया, जिसके परिणामस्वरूप 'चंपारण सत्याग्रह' का जन्म हुआ। भारत का स्वतंत्रता संग्राम असंख्य बलिदानों, शौर्यगाथाओं और महान क्रांतियों का साक्षी रहा है। इतिहास की धारा में कई बड़े नेताओं, विद्वानों, वकीलों और सैन्य नायकों की गाथाएं प्रमुखता से दर्ज की गई हैं। परंतु इस विशाल क्रांति की नींव में कई ऐसे व्यक्तित्व भी समाहित हैं, जिन्होंने किसी उच्च पद या प्रचार की लालसा के बिना इतिहास का रुख बदल दिया। ये वे अनसुने नायक हैं, जो पृष्ठों में सूक्ष्म अक्षरों में सिमट कर रह गए, किंतु जिनका योगदान हिमालय जैसा विशाल था।। पंडित राजकुमार शुक्ल भारत के स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे ही अद्वितीय और अमिट हस्ताक्षर हैं। वे न तो किसी बड़ी रियासत के राजा थे, न ही उच्च शिक्षा प्राप्त बैरिस्टर या राजनीतिक वक्ता। वे चंपारण की सोंधी मिट्टी के एक अत्यंत साधारण किसान थे। परंतु उनकी छाती में अन्याय के विरुद्ध जलती हुई ज्वाला और चंपारण के पीड़ित किसानों को मुक्ति दिलाने का अटूट संकल्प था। यह उनकी एक सकारात्मक "जिद" ही थी, जिसने मोहनदास कर्मचंद गांधी को 'महात्मा' बनने की राह दिखाई और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को सत्याग्रह जैसा अमोघ अस्त्र प्रदान किया ।

पंडित राजकुमार शुक्ल का जन्म 23 अगस्त 1875 को बिहार राज्य के पश्चिमी चंपारण जिले में स्थित सतवरिया (सातवरिया) गाँव में हुआ था। यह गाँव बेतिया के निकट स्थित है। वे एक सम्मानित, धार्मिक और स्वाभिमानी ब्राह्मण परिवार से संबंध रखते थे। उनके पिता का नाम कोलाहल शुक्ल और माता का नाम केवल देवी था।

राजकुमार शुक्ल का बचपन अत्यंत सादगी और अभावों के बीच बीता। वे कोई औपचारिक रूप से बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति नहीं थे, परंतु व्यावहारिक ज्ञान, सामाजिक चेतना और न्याय की समझ उनमें कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी आँखों के सामने चंपारण के भोले-भाले किसानों पर ब्रिटिश नीलहों (यूरोपीय नील बागान मालिकों) के अमानवीय अत्याचारों को देखा। चारों ओर व्याप्त गरीबी, भुखमरी और शोषण के वातावरण ने उनके कोमल मन में अन्याय के खिलाफ क्रांति का बीजारोपण कर दिया। स्वभाव से निर्भीक, जिज्ञासु और जनसेवी होने के कारण वे बचपन से ही अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने से कभी पीछे नहीं हटे। उनका निधन 20 मई 1929 को हुआ। चंपारण में अंग्रेजों का क्रूर तंत्र: 'तिनकठिया प्रथा' का दंश।19वीं और 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में बिहार का चंपारण क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश क्राउन के अंतर्गत गोरे नीलहों (Plantation Owners) के क्रूर शोषण का केंद्र बना हुआ था। अंग्रेजों ने यहाँ के किसानों पर एक अत्यंत कठोर और शोषक व्यवस्था थोप रखी थी, जिसे "तिनकठिया प्रथा" कहा जाता था।

तिनकठिया प्रथा के कानूनी और व्यावहारिक प्रावधान अत्यंत शोषक थे:।अनिवार्य खेती: इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक किसान को अपनी कुल कृषि योग्य भूमि के प्रति बीघा (20 कट्ठा) में से कम से कम 3 कट्ठा जमीन पर अनिवार्य रूप से नील (Indigo) की खेती करनी पड़ती थी।उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण: अंग्रेज प्रबंधक किसान की सबसे अधिक उपजाऊ और सिंचित भूमि पर ही नील बोने के लिए विवश करते थे, जिससे किसान अपनी खाद्यान्न फसलों (जैसे चावल और गेहूं) के लिए घटिया भूमि पर निर्भर रहने को मजबूर थे।


अत्यंत कम मूल्य: नील की उपज का दाम अंग्रेज अपनी मनमर्जी से तय करते थे, जो लागत मूल्य से भी बहुत कम होता था। किसानों को अपनी कड़ी मेहनत के बदले नाममात्र की राशि मिलती थी।


मिट्टी की उर्वरता का ह्रास: नील की जड़ें गहरी होती थीं, जिससे भूमि की उर्वरता तेजी से घट जाती थी और उस खेत में कई वर्षों तक अन्य कोई फसल उगाना संभव नहीं रहता था।


यदि कोई किसान नील उगाने से मना करता या इसका विरोध करता, तो उस पर भारी लगान और जुर्माना ठोंक दिया जाता था। गोरे मैनेजरों के लाठैत (लठैत) किसानों को पीटते, उनके घरों को लूट लेते और उन्हें उनकी जमीन से बेदखल कर देते। पुलिस, कचहरी और प्रशासन — सब कुछ अंग्रेजों की जेब में था। किसान कर्ज, भूख और निरंतर अपमान के अनन्त दुचक्र में फँस चुके थे। चंपारण रो रहा था और उसे एक मुक्तिदाता की अत्यंत आवश्यकता थी।


4. शोषण के विरुद्ध संग्राम: पंडित शुक्ल का संगठन कार्य

जब चंपारण का आम किसान निराशा और भय के अंधकार में डूबा हुआ था, तब पंडित राजकुमार शुक्ल एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे। उन्होंने यह स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि अकेले रोने या व्यक्तिगत विरोध करने से यह अमानवीय व्यवस्था समाप्त नहीं होगी; इसके लिए व्यापक जन-संगठन और संघर्ष की आवश्यकता है।


राजकुमार शुक्ल ने गाँव-गाँव की खाक छानी। वे किसानों के घर-घर गए, चौपालों पर बैठकें कीं और लोगों को समझाकर एकजुट करना शुरू किया। वे किसानों के आंसुओं के साक्षी बने और उन्होंने स्वयं भी नीलहों का भीषण उत्पीड़न सहा। अंग्रेजों ने उन पर कई फर्जी मुकदमे दर्ज कराए, उन्हें जेल भेजा और शारीरिक यातनाएं दीं, किंतु राजकुमार शुक्ल का अटल संकल्प डिगा नहीं। वे निर्भीक होकर अधिकारियों को पत्र लिखते रहे और स्थानीय अदालतों में किसानों का पक्ष रखते रहे। परंतु जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि स्थानीय स्तर पर लड़ाई लड़ने से ब्रिटिश हुकूमत के बहरे कानों तक आवाज नहीं पहुंचेगी; इसके लिए राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व की आवश्यकता है।


5. लखनऊ अधिवेशन (1916): महात्मा गांधी से ऐतिहासिक भेंट

दिसंबर 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लखनऊ में आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में देश भर से बड़े-बड़े नेता, वकील और राष्ट्रीय हस्तियां भाग ले रही थीं। चंपारण के किसानों की व्यथा को राष्ट्रीय मंच पर उठाने के लिए पंडित राजकुमार शुक्ल भी अपने कुछ सहयोगियों के साथ लखनऊ पहुँचे।


लखनऊ अधिवेशन में राजकुमार शुक्ल की दृष्टि केवल एक ही व्यक्ति को तलाश रही थी — मोहनदास कर्मचंद गांधी। गांधी जी उस समय दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के खिलाफ सत्याग्रह का सफल प्रयोग करके भारत लौटे थे और देश भर में उनकी न्यायप्रियता और विशिष्ट कार्यशैली की चर्चा थी।


जब राजकुमार शुक्ल ने पहली बार गांधी जी से भेंट की, तो उन्होंने चंपारण के किसानों की दुर्दशा का दुखड़ा रोया और उनसे चंपारण चलने का आग्रह किया। उन्होंने गांधी जी के पैर पकड़कर विनती की — "बापू, आप एक बार चंपारण चलकर किसानों का दुख अपनी आँखों से देखिए।" गांधी जी ने स्वीकार किया कि वे चंपारण या नील की खेती के बारे में बहुत कम जानते हैं। उन्होंने शुरुआत में कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं की और कहा कि वे अभी देश भ्रमण और अन्य व्यस्तताओं में बंधे हैं। परंतु राजकुमार शुक्ल कोई साधारण अनुनय-विनय करने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे किसान की उस हठ के धनी थे, जो पर्वतों को भी झुका देती है।


6. "एक किसान की जिद": गांधी जी का पीछा और चंपारण आगमन

लखनऊ में स्पष्ट आश्वासन न मिलने पर राजकुमार शुक्ल निराश नहीं हुए। उन्होंने गांधी जी का साथ न छोड़ने का निश्चय किया। जहाँ-जहाँ गांधी जी गए, राजकुमार शुक्ल उनके पीछे-पीछे साये की तरह चलते रहे:


कानपुर से साबरमती: लखनऊ के बाद गांधी जी कानपुर गए, शुक्ल जी भी कानपुर पहुँच गए। जब गांधी जी अहमदाबाद में अपने साबरमती आश्रम लौटे, तो शुक्ल जी आश्रम के द्वार पर उपस्थित मिले।


कोलकाता की यात्रा: गांधी जी ने उनसे कहा कि उन्हें अमुक तारीख को कोलकाता जाना है। राजकुमार शुक्ल निर्धारित तिथि से पहले ही कोलकाता पहुँच कर गांधी जी के रुकने के स्थान पर बैठ गए।


गांधी जी राजकुमार शुक्ल की इस निस्वार्थ सत्यनिष्ठा, अटूट संकल्प और निष्कंप 'जिद' से गहराई से प्रभावित हुए। अपनी आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' (The Story of My Experiments with Truth) में महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है कि एक अनपढ़ और गरीब किसान की इस दृढ़ता ने उन्हें चंपारण आने के लिए बाध्य कर दिया।


"मैंने चंपारण का नाम तक नहीं सुना था... लेकिन राजकुमार शुक्ल की जिद और निष्ठा ने मुझे वहाँ खींच लिया। वे एक ऐसे किसान थे जिन्होंने मुझे चंपारण आने के लिए बाध्य कर दिया।"


— महात्मा गांधी


अंततः, 10 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी, पंडित राजकुमार शुक्ल के साथ पटना पहुँचे और वहाँ से मुजफ्फरपुर होते हुए मोतिहारी (चंपारण) की धरती पर कदम रखा। इतिहास का वह एक ऐतिहासिक मोड़ था, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा और दशा दोनों को सदैव के लिए बदल दिया।


7. चंपारण सत्याग्रह (1917): भारत में सत्याग्रह का प्रथम प्रयोग

15 अप्रैल 1917 को जब गांधी जी मोतिहारी पहुँचे, तो ब्रिटिश प्रशासन में हड़कंप मच गया। चंपारण के जिलाधिकारी ने गांधी जी को तुरंत जिला छोड़ने का सरकारी आदेश जारी किया। परंतु गांधी जी ने अहिंसक रूप से इस आदेश को मानने से मना कर दिया। यह भारत की धरती पर सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) का पहला प्रत्यक्ष प्रयोग था।


गांधी जी ने पंडित राजकुमार शुक्ल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह और महादेव देसाई जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर चंपारण के हजारों किसानों के विस्तृत बयान दर्ज करने का अभियान शुरू किया। गाँव-गाँव जाकर किसानों की आपबीती लिखी गई। अंग्रेजों ने गांधी जी को डराने और गिरफ्तार करने का प्रयास किया, किंतु जनता का अभूतपूर्व समर्थन देखकर ब्रिटिश सरकार को पीछे हटना पड़ा।


सत्याग्रह की ऐतिहासिक सफलताएँ:

तिनकठिया प्रथा का अंत: सरकार को 'चंपारण एग्रीरियन कमेटी' गठित करनी पड़ी, जिसमें गांधी जी को भी सदस्य बनाया गया। कमेटी की जांच के आधार पर शताब्दियों पुरानी शोषक 'तिनकठिया प्रथा' को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया।


आर्थिक राहत: नीलहों द्वारा अवैध रूप से वसूले गए धन का 25 प्रतिशत हिस्सा किसानों को वापस लौटाने का आदेश दिया गया। गोरे नीलहा बागान मालिक धीरे-धीरे चंपारण छोड़कर भागने लगे।


रचनात्मक कार्य: सत्याग्रह केवल राजनीतिक जीत तक सीमित नहीं रहा। गांधी जी और उनके सहयोगियों ने चंपारण के गाँवों में प्राथमिक विद्यालय खोले, स्वच्छता अभियान चलाया, और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई।


'महात्मा' की उपाधि: चंपारण सत्याग्रह की इस अभूतपूर्व और अहिंसक सफलता से अभिभूत होकर राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास कर्मचंद गांधी को "महात्मा" की अमर उपाधि से विभूषित किया। इस विशाल आंदोलन की नींव राजकुमार शुक्ल की दृढ़ता ही थी।


8. पंडित राजकुमार शुक्ल का व्यक्तित्व: सादगी, साहस और त्याग

पंडित राजकुमार शुक्ल का व्यक्तित्व भारतीय ग्रामीण चेतना का उत्कृष्ट प्रतीक था। उनके चरित्र में अनेक ऐसे गुण विद्यमान थे, जो उन्हें एक साधारण किसान से उठाकर जननायक की श्रेणी में खड़ा करते हैं:


अदम्य साहस: बिना किसी राजनीतिक शक्ति, धन या वकीलों की फौज के, उन्होंने उस दौर में दुनिया के सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के नुमाइंदों से सीधी टक्कर ली।


निस्वार्थ जनसेवा: उन्होंने कभी अपने व्यक्तिगत लाभ, पद या प्रसिद्धि की इच्छा नहीं रखी। उनका पूरा जीवन चंपारण के किसानों के दुखों को दूर करने में समर्पित रहा।


अटल सत्यनिष्ठा: वे सत्य के प्रति पूर्णतः निष्ठावान थे। झूठे वादों और प्रलोभनों के आगे वे कभी नहीं झुके। वे निर्भीक, सत्यवादी और जनसेवी थे।


दूरदर्शिता: उन्होंने यह भली-भांति समझ लिया था कि देश की आजादी का मार्ग तब तक प्रशस्त नहीं हो सकता, जब तक कि भारत का अन्नदाता किसान शोषित और भयभीत रहेगा।


9. महाप्रयाण, उपेक्षा एवं मरणोपरांत सम्मान

चंपारण सत्याग्रह की महान विजय के पश्चात भी पंडित राजकुमार शुक्ल ने कोई राजनीतिक पद या श्रेय स्वीकार नहीं किया। वे पुनः अपनी सादगीपूर्ण ग्रामीण दिनचर्या में लौट गए। आंदोलन के दौरान हुए संघर्षों और शारीरिक/मानसिक कष्टों के कारण उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरता गया। 20 मई 1929 को इस महान देशभक्त और जननायक का निधन हो गया।


यह अत्यंत दुखद और विचारणीय पहलू है कि स्वतंत्रता के शुरुआती दौर में इतिहासकार और समाज पंडित राजकुमार शुक्ल के इस अप्रतिम योगदान को उचित स्थान देने में कुछ हद तक असफल रहे। उनका निधन अत्यंत निर्धनता की स्थिति में हुआ था। यहाँ तक कि उनके अंतिम संस्कार के लिए भी ग्रामीणों को आर्थिक सहयोग जुटाना पड़ा था। उस समय के एक अंग्रेज अधिकारी एम.एन. वाकर ने, जो कभी शुक्ल जी का विरोधी रहा था, उनके निधन पर दुःख व्यक्त करते हुए अपनी जेब से दान दिया था और कहा था कि "वह चंपारण का अकेला मर्द था जो अंग्रेजों से लड़ा।"


कालांतर में, स्वतंत्र भारत और बिहार सरकार ने पंडित राजकुमार शुक्ल के ऐतिहासिक अवदान को स्वीकार किया और उन्हें उचित सम्मान प्रदान किया:


डाक टिकट जारी: भारत सरकार के डाक विभाग ने वर्ष 2000 में पंडित राजकुमार शुक्ल की स्मृति और सम्मान में एक विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किया।


स्मारक एवं संस्थान: पश्चिमी चंपारण (मोतिहारी व बेतिया) में उनके नाम पर कई स्मारकों, पार्कों और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की गई।


जयंती व पुण्यतिथि: प्रतिवर्ष 23 अगस्त (जयंती) और 20 मई (पुण्यतिथि) को बिहार सरकार तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा राजकीय व सामाजिक स्तर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में उनके जीवन पर निबंध और भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।


10. पंडित शुक्ल के जीवन से मिलने वाली सार्वकालिक शिक्षाएँ

पंडित राजकुमार शुक्ल का जीवन केवल अतीत का एक अध्याय भर नहीं है, बल्कि वह वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक सदा प्रज्वलित रहने वाला स्रोत है। उनका जीवन हमें तीन महान सिद्धांत सिखाता है:


"एक व्यक्ति भी बदलाव ला सकता है (संकल्प की शक्ति)": राजकुमार शुक्ल के पास न अपार धन था, न कोई उच्च पद, और न ही आधुनिक संसाधन। उनके पास केवल एक दृढ संकल्प और सत्य का बल था। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि उद्देश्य पवित्र हो, तो एक अकेला व्यक्ति भी परिवर्तन की आंधी ला सकता है।

"समस्या को जड़ से पकड़ो": शुक्ल जी ने केवल शिकायतों का रोना नहीं रोया। उन्होंने समस्या की जड़ (तिनकठिया प्रथा) को पहचाना और उसके समाधान के लिए सही व्यक्ति (गांधी जी) तक पहुंचे।

"जिद सकारात्मक हो तो इतिहास बनती है": स्वार्थ के लिए की गई जिद विनाश लाती है, परंतु जब जिद समाज, देश और पीड़ित मानवता के कल्याण के लिए हो, तो वह इतिहास की दिशा बदल देती है। राजकुमार शुक्ल की सकारात्मक जिद ने ही चंपारण सत्याग्रह की नींव रखी।आज जब हम गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब राजकुमार शुक्ल हमें याद दिलाते हैं कि संघर्ष की शुरुआत अपने घर और गाँव से ही होती है। सच्चा नेतृत्व पद से नहीं, पीड़ा को समझने और उसके लिए आवाज उठाने से आता है ।

पंडित राजकुमार शुक्ल भारत के स्वाधीनता संग्राम के आकाश में वह ध्रुवतारा हैं, जो अपनी निस्वार्थ चमक से युगों-युगों तक मार्गदर्शित करता रहेगा। उनका सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान यह नहीं था कि उन्होंने कोई महान भाषण दिया या कोई पुस्तक लिखी, बल्कि उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि वे "सही समय पर सही व्यक्ति को सही स्थान पर ले आए।"यदि राजकुमार शुक्ल की वह जिद न होती, तो शायद महात्मा गांधी का चंपारण आगमन न होता; और यदि चंपारण सत्याग्रह न होता, तो भारत को 'सत्याग्रह' जैसा अहिंसक हथियार इतनी शीघ्रता से प्राप्त न होता। चंपारण सत्याग्रह ही आगे चलकर असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और अंततः 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' की वैचारिक एवं व्यावहारिक प्रेरणा बना।।वे चंपारण की पावन मिट्टी के सच्चे सपूत थे, जिनकी जलती हुई लौ से गांधी जी के सत्याग्रह का चिराग प्रकाशित हुआ और उस प्रकाश से संपूर्ण राष्ट्र में आजादी की अमर मशाल प्रज्वलित हो उठी। ऐसे अमर क्रांतिदूत, दृढनिश्चयी किसान नायक पंडित राजकुमार शुक्ल को शत-शत नमन!

 


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