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भारतीय लोकतंत्र की चेतना

 

भारतीय लोकतंत्र की चेतना: छात्र आंदोलन,

सत्येन्द्र कुमार पाठक 

भारत का इतिहास केवल शासकों के बदलाव या राजनीतिक समीकरणों का लेखा-जोखा मात्र नहीं है; यह इतिहास उन सड़कों का भी है जो युवाओं के कदमों की आवाज़ से कांपी हैं। भारत में छात्र आंदोलन कभी केवल शैक्षणिक परिसरों तक सीमित नहीं रहे। वे सदैव देश के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे की अंतरात्मा को झकझोरने का माध्यम बने हैं।।जब-जब लोकतंत्र अपनी राह से भटका है, जब-जब प्रशासनिक लालफीताशाही ने युवाओं के सपनों की बलि दी है, और जब-जब सत्ता अपने एकाधिकार के अहंकार में डूबी है—तब-तब विश्वविद्यालयों के कमरों से निकलकर छात्रों ने सड़कों पर क्रांति की नई इबारत लिखी है। आज एक बार फिर, देश का युवा नीट , यूजीसी-नेट  जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ सड़कों पर है। यह महज़ एक परीक्षा का विरोध नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था और उसके गिरते मानकों के विरुद्ध एक शंखनाद है।।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 21वीं सदी तक, छात्र आंदोलनों की एक समृद्ध और गौरवशाली परंपरा रही है। छात्रों ने कभी भी व्यवस्था के आगे सरेंडर नहीं किया, बल्कि हमेशा एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।

बंग-भंग विरोधी आंदोलन (1905): बंगाल विभाजन के विरोध में कलकत्ता और आसपास के शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी। स्वदेशी अपनाने और विदेशी सामानों का बहिष्कार करने की पहली मशाल छात्रों ने ही जलाई थी। हिंदी विरोधी आंदोलन (1965): दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु (मदुरै और चेन्नई) में जब केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने का प्रयास किया गया, तो छात्रों का उग्र विरोध सामने आया। इस आंदोलन ने न केवल भारत की भाषाई नीति को पुनर्परिभाषित किया, बल्कि द्रविड़ राजनीति की नींव भी मजबूत की।।आपातकाल और नवनिर्माण: 1974 का ऐतिहासिक दौर और 1970 का दशक भारतीय राजनीति के इतिहास में एक मोड़ था।।गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन (1974): हॉस्टल के मेस बिल में हुई बढ़ोतरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन इतना व्यापक हो गया कि इसने तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देने और राज्य विधानसभा को भंग करने पर मजबूर कर दिया। बिहार का जेपी आंदोलन (1974): लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पटना विश्वविद्यालय के छात्रों के आह्वान पर 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया। भ्रष्टाचार, महंगाई और कुशासन के खिलाफ उठा यह छात्र आंदोलन आगे चलकर देशव्यापी बना और 1975 में देश पर थोपे गए आपातकाल के खिलाफ सबसे बड़ी ढाल साबित हुआ।

 आरक्षण विवाद और सामाजिक न्याय की लड़ाई का मंडल विरोधी आंदोलन (1990): वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों (OBC आरक्षण) को लागू करने के बाद उत्तर भारत, खासकर दिल्ली विश्वविद्यालय  के छात्र सड़कों पर उतर आए। राजीव गोस्वामी के आत्मदाह की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। युवा फॉर समानता (2006): में  उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के विस्तार के विरोध में देश के प्रमुख मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों ने बड़ा आंदोलन चलाया, जिसने नीति-निर्माताओं को सोचने पर मजबूर किया।।हालिया दशक के आंदोलन का सीएए-एनआरसी और जेएनयू/जामिया विवाद (2019-20): नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) और JNU के छात्रों की मुख्य भूमिका रही।।पेपर लीक एवं NTA सुधार आंदोलन (2024-26): प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, पर्चा लीक और पारदर्शी संस्थागत ढांचे की कमी के खिलाफ देश के कोने-कोने में छात्रों का गुस्सा एक बार फिर उबल पड़ा है।

हिंसक झड़पें और शासन-प्रशासन की भूमिका: दमन बनाम जनआक्रोश का छात्र आंदोलन जब भी अपने चरम पर पहुँचते हैं, शासन और प्रशासन का पहला रवैया अक्सर संवाद की बजाय 'दमन' का होता है।

राज्य का दंडात्मक रवैया में प्रशासनिक तंत्र छात्रों के असंतोष को एक 'कानून-व्यवस्था' की समस्या के रूप में देखता है।।बल प्रयोग में : बैरिकेडिंग, वाटर कैनन (पानी की बौछारें), आंसू गैस के गोले और बर्बर लाठीचार्ज छात्रों के विरोध का पहला जवाब बनते हैं। डिजिटल नाकेबंदी का : असम आंदोलन से लेकर हाल के आंदोलनों तक, प्रशासन का एक बड़ा हथियार इंटरनेट सेवाओं को ठप करना रहा है, ताकि छात्रों की आवाज़ और लामबंदी को रोका जा सके।।मुकदमों का जाल:में  प्रदर्शनकारी छात्रों पर गैर-जमानती धाराएं, देशद्रोह या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोप लगाकर उनके करियर को संकट में डालने की कोशिशें ऐतिहासिक रूप से होती रही हैं।

आत्मदाह और शहादत का त्रासदीपूर्ण पहलू का जब छात्रों की जायज मांगों को अनसुना कर दिया जाता है, तो आक्रोश हताशा में बदल जाता है। 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन और 1990 के मंडल आंदोलन में दर्जनों छात्रों ने आत्मदाह किया। हाल के वर्षों में परीक्षाओं के रद्द होने और नौकरी न मिलने के अवसाद में छात्रों द्वारा की जाने वाली खुदकुशी व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है।

राजनीति का चक्रव्यूह: सत्ता पक्ष, विपक्ष और नेताओं की पौध का छात्र राजनीति भारत में केवल बदलाव की वाहक ही नहीं रही, बल्कि यह देश की शीर्ष राजनीति के लिए नर्सरी का काम करती रही है। छात्र आंदोलनों से निकले दिग्गज नेता 1974 की पौध: आज की भारतीय राजनीति में बड़े चेहरे—जैसे लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी, और शरद यादव—सभी पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ (PUSU) और जेपी आंदोलन की ही देन हैं।।प्रफुल्ल कुमार महंता: असम ऑल असाम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के प्रमुख के रूप में उन्होंने 6 साल तक विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन चलाया और सीधे छात्र राजनीति से निकलकर मात्र 35 वर्ष की आयु में असम के मुख्यमंत्री बने।

सत्ता पक्ष का दंभ और विपक्ष का अवसरवाद में सत्ता पक्ष: चाहे केंद्र में किसी भी दल की सरकार रही हो, सत्ता में बैठते ही छात्रों की मांगें उन्हें "विरोधी दलों से प्रेरित" या "उपद्रवियों की साजिश" नज़र आने लगती हैं। सरकारें अक्सर समस्या की तह में जाने के बजाय उसे दबाने का प्रयास करती हैं।।विपक्ष: विपक्षी दलों के लिए छात्र आंदोलन एक बना-बनाया राजनीतिक हथियार होते हैं। वे छात्रों की कंधों पर बंदूक रखकर सत्ता पक्ष पर निशाना साधते हैं, हालांकि जब वही विपक्ष सत्ता में आता है, तो उसका रवैया भी छात्रों के प्रति बहुत अलग नहीं होता। बिहार और झारखंड: क्रांति का गढ़ - बिहार हमेशा से वैचारिक क्रांति की भूमि रहा है। 1974 का संपूर्ण क्रांति आंदोलन हो या हाल के वर्षों में रेलवे NTPC भर्ती और NEET पेपर लीक को लेकर पटना की सड़कों पर उतरा जनसैलाब—बिहार का छात्र हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़ा रहता है। झारखंड में 'आजसू' (AJSU) जैसे छात्र संगठनों ने अलग राज्य के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई।।पश्चिम बंगाल: बौद्धिक और वैचारिक उथल-पुथल - कलकत्ता विश्वविद्यालय, प्रेसिडेंसी कॉलेज और जादवपुर विश्वविद्यालय हमेशा से वामपंथी और बौद्धिक आंदोलनों के केंद्र रहे हैं। 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन को सबसे ज्यादा ऊर्जा कलकत्ता के युवा छात्रों और मेधावी युवाओं से ही मिली थी, जिसने भारतीय राजनीति को एक नया हिंसक मोड़ दिया था।

दिल्ली और उत्तर प्रदेश: सत्ता की नाभि - दिल्ली: देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय  और जामिया मीलिया इस्लामिया में होने वाले आंदोलन तुरंत राष्ट्रीय मीडिया और सरकार का ध्यान खींचते हैं। मंडल आयोग विरोधी आंदोलन से लेकर निर्भया कांड के बाद का छात्र आक्रोश और हालिया नीट नेट  विवाद का केंद्र दिल्ली ही रहा।।उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्र राजनीति के स्तंभ रहे हैं। हाल के वर्षों में प्रयागराज और लखनऊ में UP TGT/PGT, सिपाही भर्ती परीक्षा और आर ओ / ए आर ओ पेपर लीक के खिलाफ हुए विशाल छात्र प्रदर्शनों ने राज्य सरकार की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए।

असम और पूर्वोत्तर: अस्मिता की रक्षा।1979 से 1985 के बीच चला 'असम छात्र आंदोलन' भारत के इतिहास का सबसे लंबा और संगठित छात्र आंदोलन था। इसका मुख्य उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना और असमिया भाषा व संस्कृति की रक्षा करना था। इस आंदोलन का अंत 'असम समझौते' के साथ हुआ।

 राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दक्षिण भारत।राजस्थान: कोटा, जो देश की कोचिंग राजधानी है, हाल के दिनों में छात्रों के मानसिक दबाव, सुसाइड केसों और प्रतियोगी परीक्षाओं के पर्चा लीक मामलों को लेकर छात्र असंतोष का नया केंद्र बना है।।मध्य प्रदेश: व्यापमं  घोटाले ने मध्य प्रदेश के पूरे छात्र समुदाय को सड़क पर ला दिया था। यह घोटाला प्रशासनिक भ्रष्टाचार का सबसे भयानक चेहरा था।।पंजाब व हरियाणा: पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी ने भगत सिंह की विरासत को संभालते हुए हमेशा किसान आंदोलनों और छात्र अधिकारों के पक्ष में आवाज बुलंद की है।।दक्षिण भारत: तमिलनाडु ने हिंदी विरोधी आंदोलन के माध्यम से राज्यों के अधिकारों और भाषाई स्वायत्तता की अलख जगाई, वहीं कर्नाटक में फीस वृद्धि और शिक्षा के व्यवसायीकरण के खिलाफ बड़े छात्र आंदोलन हुए हैं।

. समकालीन संकट: NEET, UGC-NET विवाद और धर्मेंद्र प्रधान की चुनौती का वर्तमान समय में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और उनका मंत्रालय एक ऐसे अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है, जिसने देश के करोड़ों अभ्यर्थियों के भविष्य को दांव पर लगा दिया है। NTA और UGC की गिरती साख।राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) का गठन इसलिए किया गया था ताकि पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं आयोजित की जा सकें। परंतु, NEET-UG में एक ही सेंटर से कई टॉपर्स का निकलना, ग्रेस मार्क्स का विवाद, और UGC-NET परीक्षा का पेपर डार्कनेट पर लीक होने के कारण रद्द किया जाना—इन सभी घटनाओं ने NTA की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है।

आरक्षण, सामाजिक न्याय और ST/SC एक्ट का कोण -परीक्षाओं में पारदर्शिता केवल मेरिट का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सामाजिक न्याय से जुड़ा है। जब प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होते हैं या उनमें धांधली होती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान गरीब, वंचित, और अनुसूचित जाति/जनजाति (ST/SC) तथा पिछड़ा वर्ग (OBC) के उन छात्रों को होता है जो बड़ी मुश्किल से सीमित संसाधनों में तैयारी करते हैं।

ST/SC एक्ट और आरक्षण की नीतियां तब तक बेमानी हैं जब तक कि प्रवेश परीक्षाएं निष्पक्ष न हों। धांधली के कारण योग्य और वंचित वर्गों के प्रतिभाशाली बच्चे प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाते हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।।. प्रशासनिक कड़ाई: शिक्षा विभाग के 47 अधिकारियों की बर्खास्तगी

बढ़ते छात्र आंदोलन, चौतरफा राजनीतिक दबाव और न्यायपालिका की सख्त टिप्पणियों के बाद सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है। इसी क्रम में, शिक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाते हुए शिक्षा विभाग के 47 अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया है। जीरो टॉलरेंस का संदेश: 47 अधिकारियों पर गाज गिरना यह साफ़ दर्शाता है कि सरकार के भीतर और परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्थाओं में भ्रष्टाचार का दीमक कितना गहरा फैला हुआ था। यह संदेश देने की कोशिश है कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अधिकारियों की जवाबदेही: लंबे समय से नौकरशाही में यह धारणा बन गई थी कि वे किसी भी असफलता के बाद बच निकलेंगे। बर्खास्तगी की यह कार्रवाई अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक कड़ा सबक है।

लेकिन क्या यह मूल समस्या का समाधान है? केवल निचली या मध्यम स्तर की कड़ियों को हटाने से पूरी व्यवस्था शुद्ध नहीं हो सकती। जब तक कि निर्णय लेने वाले शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक तंत्र को पूरी तरह दोषमुक्त नहीं माना जा सकता।

 संस्थागत सुधार की तत्काल आवश्यकता: आगे की राह में छात्र आंदोलनों को केवल दबाने या कुछ अधिकारियों को बर्खास्त कर देने से देश की शिक्षा व्यवस्था का भला नहीं हो सकता। इसके लिए व्यापक संरचनात्मक और विधायी सुधारों (Structural and Legislative Reforms) की आवश्यकता है। NTA जैसी संस्था को आउटसोर्सिंग और निजी वेंडरों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह समाप्त करनी होगी। परीक्षा केंद्र बनाने, प्रश्न पत्र छापने और कंप्यूटर सिस्टम मुहैया कराने वाले निजी ठेकेदारों के कड़े ऑडिट की आवश्यकता है।।पेपर लीक को रोकने के लिए बनाए गए नए कानूनों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। दोषियों के लिए गैर-जमानती वारंट, संपत्ति ज़ब्त करने और कम से कम 10 साल की सजा का प्रावधान होना चाहिए। इन मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए जाएं ताकि 6 महीने के भीतर फैसला आ सके।

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) दशकों से बिना किसी बड़े विवाद के देश की सबसे कठिन परीक्षाएं आयोजित कराता रहा है। NTA को UPSC की गोपनीयता, सुरक्षा मानकों और विकेंद्रीकृत प्रणाली से सीख लेनी चाहिए।

शिक्षा मंत्रालय को छात्रों, शिक्षक संगठनों और युवा प्रतिनिधियों के साथ एक स्थायी 'संवाद मंच' स्थापित करना चाहिए। जब छात्रों को यह महसूस होगा कि उनकी शिकायतों को सुना जा रहा है, तो उन्हें सड़कों पर उतरने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है। हमारी 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकी लाभांश) ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि यह युवा शक्ति अपना समय पढ़ाई और अनुसंधान में लगाने के बजाय सड़कों पर लाठियां खाने और अपने हक के लिए गिड़गिड़ाने में बिताएगी, तो 'विकसित भारत' का सपना अधूरा ही रह जाएगा। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और वर्तमान सरकार के सामने 47 अधिकारियों की बर्खास्तगी केवल एक शुरुआत होनी चाहिए। सरकार को यह समझना होगा कि छात्र आंदोलन किसी सरकार के खिलाफ दुश्मन का हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र का वह दर्पण हैं जो शासन को उसकी कमियों का अहसास कराता है। समय आ गया है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष राजनीतिक रोटियां सेकना बंद करें और देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक पारदर्शी, जवाबदेह और सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली का निर्माण करें। इतिहास गवाह है कि जिसने युवाओं की आवाज़ को अनसुना किया है, उसे काल चक्र ने कभी माफ नहीं किया

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