बाल नाटक
आज़ादी के सच्चे रंग और हमारा कर्त्तव्य
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पात्र परिचय: - दिव्यांशु, प्रियांशु, शशांक: विद्यालय के विद्यार्थी (समझदार और जिज्ञासु).,बुचन: छोटा और थोड़ा नटखट बच्चा (जिसका ध्यान ज़्यादातर मिठाइयों पर रहता है).आशिका, उर्वशी: विद्यालय की छात्राएं (कलाप्रिय और अनुशासित).,नवीन: सीनियर छात्र (सजावट और व्यवस्था का प्रभारी).दादा जी: घर के वरिष्ठ सदस्य (अनुभवी और ज्ञानवर्धक बातें बताने वाले).माता एवं पिता: दिव्यांशु और प्रियांशु के अभिभावक.शिक्षिका प्रियंका: विद्यालय की अध्यापिका (प्रेरणादायक और स्नेही) ,स्थान: अंक 1: दादा जी का दालान (घर का आंगन)।अंक 2: विद्यालय का परिसर और मुख्य मंच ,सामग्री: रंग-बिरंगे फूल, कागज़ की रंगीन पताके, छोटे-बड़े तिरंगे झंडे, डस्टबिन (कूड़ादान), पौधे, गमले, मिठाइयों के डिब्बे।(समय: सुबह 7:00 बजे। दालान में दादा जी चश्मा लगाए अखबार पढ़ रहे हैं। माता जी चाय का कप लेकर आती हैं और पिता जी पौधे में पानी डाल रहे हैं। तभी दिव्यांशु, प्रियांशु, बुचन, आशिका और शशांक हाथों में झंडे, फूल और कागज़ की पट्टियां लिए उत्साह में प्रवेश करते हैं।)
दिव्यांशु: (उत्साह में) दादा जी! प्रणाम। देखिए, आज 15 अगस्त है! हम सब विद्यालय की सजावट के लिए कितना सारा सामान लाए हैं!
दादा जी: (मुस्कुराते हुए चश्मा उतारते हैं) जीते रहो बच्चों! अरे वाह, तुम सब तो पूरी तैयारी के साथ आए हो। लेकिन ज़रा मुझे भी तो बताओ, आज के दिन तुम लोग इतने खुश क्यों हो
बुचन: (चहकते हुए) दादा जी, यह भी कोई पूछने की बात है? आज स्वतंत्रता दिवस है! स्कूल में ध्वजारोहण होगा, रंगारंग कार्यक्रम होंगे और सबसे बड़ी बात... हम सबको लड्डू और जलेबियां मिलेंगी!
माता: (हंसते हुए) बुचन, तुम्हारा ध्यान हमेशा मिठाइयों पर ही क्यों अटका रहता है?
पिता: (पानी का लोटा रखते हुए) माता जी ठीक कह रही हैं बुचन। स्वतंत्रता दिवस सिर्फ खुशियां मनाने और मिठाई खाने का दिन नहीं है। यह दिन हमें हमारे इतिहास, संघर्ष और कर्तव्यों की याद दिलाता है।
प्रियांशु: पिता जी, इतिहास तो हम किताबों में पढ़ते हैं कि 15 अगस्त 1947 को हमारा देश अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हुआ था। लेकिन आज के समय में स्वतंत्रता का असली अर्थ क्या है?
दादा जी: बहुत गहरा सवाल पूछा प्रियांशु तुमने! देखो बच्चों, आज से 70-80 साल पहले आज़ादी का मतलब था विदेशी हुकूमत से मुक्ति पाना। महात्मा गांधी , तिलक , मालवीय , चंद्रशेखर आजाद , खुदीराम बोस , भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई और जैसे हज़ारों वीरों ने हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए ताकि हम एक स्वतंत्र भारत में सांस ले सकें।
आशिका: दादा जी, फिर आज के भारत में हमारी क्या ज़िम्मेदारी है?
दादा जी: आज की स्वतंत्रता का अर्थ है—ज़िम्मेदारी! देश सिर्फ सरहदों से नहीं बनता, देश उसमें रहने वाले लोगों से बनता है। आज अगर हम स्वच्छता बनाए रखते हैं, नियमों का पालन करते हैं, पानी और बिजली बचाते हैं, और एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, तो यही हमारी सच्ची देशभक्ति है।
शशांक: इसका मतलब, अगर कोई सड़क पर कचरा फैलाता है या प्लास्टिक जलाता है, तो वह देश को नुकसान पहुंचा रहा है?
शिक्षिका प्रियंका: (प्रवेश करते हुए) बिलकुल सही कहा शशांक आपने!
(शिक्षिका प्रियंका को देखकर सभी बच्चे और बड़े उठकर उनका अभिवादन करते हैं।)
सभी बच्चे: प्रणाम मैडम!
शिक्षिका प्रियंका: नमस्ते! प्रणाम दादा जी, नमस्ते जी। मैं बच्चों को ही देखने आई थी कि ये लोग समय पर विद्यालय पहुँच रहे हैं या नहीं।
दादा जी: आइए प्रियंका जी। मैं बच्चों को यही समझा रहा था कि आज स्वतंत्रता दिवस पर सिर्फ झंडा फहराना काफी नहीं है, बल्कि देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना ज़रूरी है।
शिक्षिका प्रियंका: आपने बिलकुल सही कहा दादा जी। आज हमारे विद्यालय का विषय भी यही है—'स्वतंत्रता और हमारे मौलिक कर्तव्य'। बच्चों, क्या आप जानते हैं कि हमारे तिरंगे का हर रंग हमें क्या सिखाता है?
दिव्यांशु: मैडम, केसरिया रंग वीरता और साहस का प्रतीक है!
उर्वशी: (आगे आते हुए) और सफेद रंग शांति, सत्य और पवित्रता का प्रतीक है!
नवीन: (हाथ में पताके लिए) हरा रंग हमारे देश की हरियाली, खुशहाली और समृद्धि को दर्शाता है!
शिक्षिका प्रियंका: और बीच में बना हुआ 24 तीलियों वाला अशोक चक्र?
प्रियांशु: वह हमें निरंतर आगे बढ़ते रहने और 24 घंटे अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देता है!
माता: वाह! बच्चे तो बहुत समझदार हो गए हैं।
पिता: चलिए, अब समय हो रहा है। आप सब विद्यालय के लिए प्रस्थान करें, वरना सजावट का काम अधूरा रह जाएगा।
दादा जी: जाओ बच्चों! मेरी एक बात हमेशा याद रखना—आज़ादी एक अधिकार है, लेकिन अनुशासन हमारा कर्तव्य है।
(सभी बच्चे दादा जी और बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लेते हैं और देशभक्ति के नारे लगाते हुए विद्यालय की ओर बढ़ते हैं।)
सब एक साथ: भारत माता की जय! वंदे मातरम!
(स्थान: विद्यालय का विशाल मैदान। मंच पर तिरंगा फहराने का स्तंभ लगा है। एक तरफ रंग-बिरंगी रंगोली बनी है। दूसरी तरफ नवीन और उर्वशी मंच की सजावट को अंतिम रूप दे रहे हैं। शिक्षिका प्रियंका के साथ सभी बच्चे सामान लेकर पहुँचते हैं।)
नवीन: स्वागत है दोस्तों! आइए, मुख्य द्वार और मंच को सजाने में हमारी मदद कीजिए।
उर्वशी: आशिका, तुम और मैं इस मंच के दोनों ओर रंग-बिरंगे फूलों के गमले लगा देते हैं।
आशिका: हां उर्वशी, और ध्यान रखना कि कोई भी फूल ज़मीन पर पैर से न कुचला जाए। फूलों की सुंदरता से ही हमारा मंच महकेगा।
(दिव्यांशु और प्रियांशु कागज़ की रंगीन पताके दीवारों और खंभों पर बांधते हैं।)
शशांक: प्रियांशु, ज़रा तिरंगे झंडे को ऊँचा उठाना। देखना, झंडा ज़मीन को स्पर्श न करे। हमारे राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान सबसे ऊपर है।
प्रियांशु: हां शशांक, हमारे ध्वज का सम्मान ही हमारे देश का सम्मान है।
(तभी बुचन एक मिठाई का डिब्बा और टॉफी के छिलके उठाकर ज़मीन पर फेंक देता है।)
दिव्यांशु: (टोकते हुए) बुचन! यह तुम क्या कर रहे हो?
बुचन: (हैरान होकर) क्या हुआ भैया? मैंने तो बस टॉफी खाकर छिलका फेंका है
नवीन: बुचन छोटे भाई, अभी दादा जी और मैडम ने क्या समझाया था? देश को स्वच्छ रखना भी हमारी देशभक्ति है। अगर हम अपने ही विद्यालय के आंगन को गंदा करेंगे, तो फिर स्वतंत्रता दिवस मनाने का क्या फायदा?
बुचन: (झिझकते हुए) अरे! मुझसे गलती हो गई। मैं अभी इस छिलके को उठा लेता हूँ।
शिक्षिका प्रियंका: (मुस्कुराते हुए आगे आती हैं) शाबाश बुचन! गलती मानकर उसे सुधारना ही सच्चे नागरिक की पहचान है। देखो, वहां हरा और नीला डस्टबिन रखा है। सूखा कचरा नीले में और गीला कचरा हरे में डालो।
(बुचन दौड़कर कचरा डस्टबिन में डालता है। सभी बच्चे ताली बजाते हैं।)
उर्वशी: मैडम, अब मुख्य अतिथि के आने का समय हो गया है। दादा जी, माता जी और पिता जी भी दर्शक दीर्घा में आ चुके हैं।
शिक्षिका प्रियंका: बहुत बढ़िया! सभी बच्चे अपनी-अपनी पंक्तियों में अनुशासित होकर खड़े हो जाइए।
(अभिभावक और गांव के लोग दर्शक दीर्घा में बैठते हैं। मुख्य अतिथि के रूप में दादा जी को मंच पर आमंत्रित किया जाता है। दादा जी धीरे-धीरे आकर ध्वजारोहण की रस्सी खींचते हैं। तिरंगा फहराता है और उसमें से गुलाब की पंखुड़ियां नीचे गिरती हैं। सभी लोग तिरंगे को सलामी देते हैं।)
राष्ट्रगान (सब एक साथ गाते हैं):
"जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता..."
(राष्ट्रगान के बाद ज़ोरदार तालियां बजती हैं।)
शिक्षिका प्रियंका: (माइक संभालते हुए) आदरणीय दादा जी, अभिभावकगण और मेरे प्यारे बच्चों! आज स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर हमारे बच्चों ने केवल विद्यालय को नहीं सजाया, बल्कि स्वतंत्रता के सही अर्थ को भी समझा है। अब मैं दिव्यांशु और उनकी टोली को एक छोटे से संदेश के लिए मंच पर आमंत्रित करती हूँ।
(दिव्यांशु, प्रियांशु, बुचन, आशिका, शशांक, उर्वशी और नवीन मंच के बीच में आते हैं।)
दिव्यांशु: दोस्तों! आज हमने सीखा कि आज़ादी केवल एक तारीख नहीं, एक सोच है।
प्रियांशु: स्वतंत्रता का मतलब है—हम सब मिलकर अपने पर्यावरण की रक्षा करें और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं।
आशिका: स्वतंत्रता का मतलब है—बेटियों को पढ़ने और आगे बढ़ने का पूरा अवसर मिले।
शशांक: स्वतंत्रता का मतलब है—जाति, धर्म और भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करना।
उर्वशी: स्वतंत्रता का मतलब है—ईमानदारी से अपनी पढ़ाई करना और देश के विकास में योगदान देना।
नवीन: और सबसे बढ़कर, अनुशासन में रहकर अपने तिरंगे की आन, बान और शान को सदा बनाए रखना!
बुचन: (मुस्कुराते हुए) और हां... सफाई रखना और कचरा हमेशा कूड़ेदान में ही डालना!
(सभी दर्शक जोर-जोर से तालियां बजाते हैं। दादा जी उठकर मंच पर आते हैं और बच्चों को आशीर्वाद देते हैं।)
दादा जी: मुझे गर्व है अपने बच्चों पर! आज तुम सबने सिद्ध कर दिया कि भारत का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल हाथों में है। जब तक हमारे देश का युवा अपने कर्तव्यों को समझेगा, तब तक भारत विश्व गुरु बना रहेगा।
शिक्षिका प्रियंका: आइए, हम सब मिलकर प्रतिज्ञा लें—
सभी पात्र (मंच पर एक साथ हाथ आगे बढ़ाकर):
"हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम अपने देश की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा करेंगे। हम स्वच्छता, अनुशासन, भाईचारे और शिक्षा का दीप जलाकर भारत को समृद्ध और महान बनाएंगे!"
(पृष्ठभूमि में देशभक्ति का मधुर संगीत बजता है। बच्चे तिरंगा लहराते हैं और मंच पर फूलों की बारिश होती है।)
सब एक स्वर में नारा लगाते हैं:
"भारत माता की जय!"
"वंदे मातरम!"
"जय हिंद! जय भारत!"
(सारे पात्र एक-दूसरे को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हैं और परदा गिरता है।)
- समाप्त -
करपी , अरवल, बिहार, 804419
9472987491
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