ज़िन्दगी जब भी अपना पता देती है,
ग़म कितने हैं यह बता देती है?
सह भी लेते हैं लोग अक्सर इसको,
फिर भी अक्सर रुला देती है।
फ़िक्र जब बढ़ जाती हैं खुशियों को लेकर,
तो हमारे जिस्म को काँटा बना देती है।
वक्त गुजरता चला जाता है इस ज़िन्दगी में,
कुछ मर जाते और कुछ बूढ़े हो जाते हैं
छोटे और बड़ो पर भी अपना जादू चला जाती है!
सर्वेश कुमार मारुत
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