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105 नम्बर

 
105 नम्बर

                                        -संतोष सुपेकर

        "105 !"इस कॉलोनी में सब्जी बेचते हुए एक मकान के बाहर लगा, ये बड़ा सा लाल रंग से लिखा हुआ नम्बर देखते ही मुझे चिढ़ सी होने लगती है।"झमाझम बारिश में  ठेला धकाते और  गीला मुँह  पोंछते हुए मैंने सोचा,"इस नम्बर से ही नफरत हो गई है मुझे।रोज जैसे ही मैं यहाँ से गुजरता हूँ,इस 105 नम्बर बंगले से एक बुड्ढा बाहर निकलता है और सब्जी लेने के बाद दो-पाँच रुपये का धनिया जबरदस्ती मुझसे ले जाता है,फ्री में!और बोलता है ,बोनस में!हुंह शरम नही आती इन अमीरों को। हम गरीबों से क्या कोई बोनस लेता है?...धनिया कौनसा सस्ता आता है?पर क्या करूं?सब्जी बेचना है तो..." मैने फिर मुँह बिचकाया।
    ,"आज क्या बात है?"मकान की ओर देखते हुए मैं बुदबुदाया,"मेरी चिल्लाहट सुनकर भी बाहर नही आया बुड्ढा ? बारिश के कारण अंदर पडा होगा,चलो अच्छा है ,आज तो बला टली..."
       लेकिन  नही ,बला टली नही थी ,उसी समय 105 नम्बर का कम्पाउंड गेट खुला और वही बुड्ढा छतरी हाथ मे लिए बाहर निकला पर यह क्या?उसके दूसरे हाथ मे आज प्लास्टिक की  एक थैली थी जिसमें कोई नीले रंग की चीज़ थी।
     "नही-नही , आज सब्जी नही लेनी।मैं रोज़ देखता हूँ तुम बरसात में गीले होते हुए सब्ज़ी बेचते रहते हो ।महामारी का टाईम है भैया ।भीगने से कहीं तुम्हे बुखार हो गया तो  बहुत महंगा पड़ेगा| सो तुम्हारे लिए ये...ये  रेनकैप और कोट खरीद लाया हूँ,बिल्कुल नया!अब इसे पहनकर सब्जी बेचना।ये लो ,मेरी तरफ से ,...बोनस में!"और कहकर वो बु....,नही -नही ,वे बाबूजी, ठहाका मारकर हँस पड़े।
   बरसती बूंदों के बीच मुझ पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया और अपनी सोच पर शर्माते हुए,कृतज्ञ नज़रों से उन्हें देखते हुए , मैं भी मुस्कुरा उठा।
  पहली बार मुझे वे अच्छे लगे, और  उनके मकान पर लगा, वह 105 नम्बर भी ।
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