अनुताप
-सन्तोष सुपेकर
लोगों से बचकर छिपता हुआ ,हाँफता हुआ वह जिस रास्ते पर चला जा रहा था वह उसका जाना पहचाना था।
छिपने के लिए उसे सामने खड़ा टूटा-फूटा भवन दिखा तो वह तुरन्त उसमें अंदर घुस गया। उसे याद आया ,ये तो उसका स्कूल था, पन्द्रह सोलह वर्ष पूर्व का,जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका था।
एक कमरे की टूटी सी दीवार के पास खड़ा होकर वह लघुशंका की सोच ही रहा था कि एकदम ठिठक गया।
उस जीर्ण शीर्ण दीवार के बचे-खुचे प्लास्टर पर पेन से चित्रित कुछ रेखाचित्रनुमा आकृतियाँ दिखीं तो उसकी आँखें धुंधलाने लगीं...
"ये ....ये क्या ,अरे ? इस दीवार पे ये ....पतंग,फूल,पत्ते ,तितली सब मैंने ही तो बनाए हुए हैं ।इसी स्कूल में पढ़ते हुए।अभी तक ये ऐसे ही हैं??कमाल है!"सोचते हुए उसे कुछ गुदगुदी होने लगी,"मुझे बचपन मे दीवार पर चित्रकारी का बड़ा शौक था,कागज़ पर भी और दीवारों पर भी"तभी हाथ में थमे हथियार पर उसका ध्यान गया तो उसके विचार अपकेंद्रित हुए",पर क्या मैंने या किसी भी बच्चे ने किसी दीवार पर कभी बंदूक बनाई?रिवॉल्वर का ड्राइंग बनाया?नही ,कभी नही।बच्चे दीवारों पर तितली,फूल,पतंग,चिड़िया तो बनाते हैं पर बंदूक,रिवॉल्वर ..कभी नही।
तब ,तब ये बंदूक हाथ मे कैसे आ गई? और कबसे?"
सोचते हुए उसका दिमाग चक्कर खाने लगा,धुंधलाती आँखों से पानी बहने लगा, पैर जमीन पर ढीले पड़ने लगे और हाथ ,रिवॉल्वर पर ।
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