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अनायास ही

 
अनायास ही
                           -सन्तोष सुपेकर

    "अरे वा! वाकई बड़ा अच्छा शहर है तुम्हारा।यहाँ तो खुशियाँ भी मार्केट  में मिलती हैं?"सुदूर शहर से उज्जैन आईं बुजुर्ग, कम देख पाने वाली मौसी ने कार में से उंगली उठाकर चहकते हुए सामने की दुकान पर लगे  साइन बोर्ड की ओर ईशारा किया तो हम सब हँस पड़े।
   "अरे मौसी, उस बोर्ड पर तो  लिखा है- यहाँ कुर्सियाँ मिलती हैं,खुशियाँ नही।लिखने वाले ने गलती से क को ख लिखा, खुर्शियां लिखा,बजाए कुर्सियाँ लिखने के।उसकी व्याकरण कमजोर है और आपकी नज़र।"
  "मौसीजी की दृष्टि जरूर कमजोर होगी पर उनकी आंतरिक दृष्टि बहुत  सकारात्मक है। "सारी बात सुन रहे चाचाजी बोले ,"तभी तो वे दुःखों से भरी इस दुनिया में,दुःख दर्दों से भरे इस बाज़ार में ,अनायास ही कुर्सियाँ मिलती है को , खुशियाँ मिलती हैं समझ रही हैं,और खुश भी  हो रही हैं।"

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