डॉ नलिन का आध्यात्मिक कुण्डलियाँ संग्रह -कहे नलिन हरिदास
डॉ नलिन ने अपने संग्रह कहे हरिदास में आध्यात्मिक कुण्डलियाँ 349 को रचित कर समर्पण दिवंगत श्रद्धेय- माताश्री- पिताश्री,शारदा-हरिवल्ल्भ को समर्पित की है | डॉ नलिन ने भक्तिभाव को दृढ़ करने में आध्यात्मिक कुण्डलियाँ अपनी अहम भूमिका निभा रही है|देखा जाए तो डॉ नलिन की छः पूर्व प्रकाशित कृतियाँ साहित्य जगत में छाई हुई है |गीत और गजल में अपना स्थान मजबूत रखते हुए सदैव कई रचनाओं का आनंद पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलता रहता है |डॉ नलिन ने अपने आध्यात्मिक कुण्डलियाँसंग्रह में भाव पक्ष को एक मजबूत पक्ष में रखा है।विभिन्न विषयो को समेटे हुए डॉ नलिन ने जीवन के यथार्थ को काफी गहराई से तलाशा जाकर संग्रह में तराशा है।शब्दो की जादूगरी में साहित्य परंपरा को अपनी भावनाओ को व्यक्त किया है जो की साहित्य सेवा में बेहतर कार्य है|भाषा और भाव का पक्ष देखे तो भावपूर्ण है जिससे हिंदी के समाधान की जीत निश्चित है।लेखक की सर्जन सामर्थ्य की परिपक्वता आध्यात्मिक कुण्डलियों में स्पष्ट झलकती है भिन्न भावों को दिशा देने वाली कुंडलिया पाठको के हृदय में सीधे उतर कर विषयों के प्रतिबिम्बों से हमें रुबरु करवाती है लेखक की असाधारण प्रतिभा किसी प्रशंसा की मोहताज नहीं है । कुंडलियां स्वतः बोल उठती है-
जीवन उलझी डोर है ,जिसमे आयु पतंग |
सुलझा लो ऊँची उड़े,कर संतो का संग ||
कर संतों का संग, न खींचो ओर न छोड़ो |
रहो पेंच से दूर, राह सीधी मत मोड़ों |
कहे नलिन हरिदास,रहो उठते आजीवन |
न हो डोर में गाँठ,,यही कहलाता जीवन ||
अपनी साहित्य विधा के हर रंग का जादू बिखेरने वाले वरिष्ठ लेखक यूँ तो जन -जन में लोकप्रिय है उतनी ही उनकी धार्मिक एवम साहित्यिक कर्म में रूचि अम्बर को छू रही है।स्वयं को बड़ा कभी न महसूस समझने की सहयोग की भावना का एक नया रूप और मंशा "'आध्यात्मिक कुण्डलियाँ "संग्रह में स्पष्ट झलकती है ।रसिकों को शब्दों के चुम्बकीय आकर्षण में बांध कर एक नई उर्जा का संचार करते है। इस कला की जितनी भी प्रशंसा की जाए उतनी कम होगी। हार्दिक बधाई।
अँधियारे की ओट से ,तनिक चमकती भोर |
रस्ता दिखता ही नहीं ,पके जा किस ओर ||
पकड़े जा किस ओर ,प्रेम से नांम जपन कर |
प्रभु का थामें हाथ ,ह्रदय से दूर तपन कर |
कहे नलिन हरिदास ,,बन्द ये रस्ते सारे |
खुल जाएंगे तुरत,हटेंगे घुप अंधियारे ||
उनकी हर रचना लाजवाब है असमंजस में हूं कि आपको किस से रूबरू करवाऊं?हैरत की बात यह है कि हर रचना अपने आप में संपूर्ण है।आध्यात्मिक कुण्डलियाँ जो कुछ वह कहना चाहती है वह कह कर ही रहती है। कहीं पर कोई अतिशयोक्ति या कल्पनात्मकता नहीं दिखती।
समीक्षा :
पुस्तक का नाम:कहे नलिन हरिदास
लेखक: श्री.डॉ नलिन जी
सम्पर्क --4 -ई -6 तलवण्डी ,,कोटा --324005 राजस्थांन 9413987457
मूल्य - 125 रुपये
प्रकाशक - फ्रेंड्स हेल्पलाइन ,कोटा 48 -ए शिवपुरा,,रावतभाटा रोड़ कोटा (राजस्थान )324009
समीक्षक -संजय वर्मा 'दृष्टि '
125 ,बलिदानी भगतसिंह मार्ग ,,मनावर जिला धार मप्र
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY