वेदना
ना घर ,ना घौंसला
मुंडेरो और कुछ बचे पेड़ों पर
बैठकर गौरय्या ये सोच रही कि -
इंसानों को रहने के लिए
कुछ तो है
सीमेंट कंक्रीट के मकान होने से
क्या मेरे लिए कुछ भी नहीं है
मेरे शहर में |
ची -ची बोल के
बुद्धिजीवी इंसानों से
कह रही हो जैसे
इंसानों के हितों के साथ
हमारे हितों का भी ध्यान रखो
क्योंकि हम गौरैया पक्षी है |
कई प्रकार के विकिरण के प्रभाव से
वैसे ही हमारी प्रजाति कम हो रही.
नहीं तो गाते रह जाओगे
" छु न -छु न करती आई चिड़िया
दाल का दाना ले चिड़िया। ... "
और यह सवाल अनुतरित बन
रह जायेगा महज किताबों में
और नन्हे बच्चों के दिलो में
संजय वर्मा "दृष्टि "
मनावर (धार )
9893070756
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