वर्षा आने के कई संकेत एवं वृक्षों की देखभाल -जल संग्रहण के लाभ
पहाड़ी पर हवाओं के रुख से तय होता है मौसम का मिजाज ।वर्षा का आंकलन विदिशा में आठ दशक से वराह मिहिर की पद्धति पर जारी है परंपरा और किसान इस पर भरोसा करते आए है।वायु परीक्षण से अच्छी या सामान्य बारिश तथा उपज की पैदावार की भविष्यवाणी की जाती है।बारिश जल्द कब आएगी।इस तरह के आंकलन में वराहमिहिर पद्धति श्रेष्ठ कही जाएगी।यू तो मौसम विभाग द्वारा सेटेलाइट माध्यम से आकाश में बादलों की स्थिति,चक्रवात,आदि की भविष्यवाणी की जाती रही।किन्तु हवाओं के रुख कब बदल जाए और आंका गया अनुमान कभी कभी बदल भी जाता है।मौसम के मिजाब जानने के लिए नई पीढ़ी को इलेक्ट्रॉनिक युग मे परम्पराओं पर भी भरोसा रखना होगा।तभी हम प्राचीन पद्धतियों को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।
वर्षा हेतु वर्तमान में कई गाँवों में अंधविश्वास बुरी तरह फैला हुआ है | जिसकी हम श्रद्धा से पूजा करते है उन्ही को पानी में डुबोए रखते है|मेंढक मेढकी की शादी कराना|ऐसे नज़ारे कई गाँवों में देखने को मिल जायेंगे |जीवित व्यक्ति की अर्थी निकाली जाती है ताकि वर्षा हो सके | वर्षा के लबे अंतराल से अंधविश्वास की स्थिति निर्मित होती है |छोटे बच्चें जो इन प्रक्रिया सेअनभिज्ञ है उनकी मानसिकता पर इसका बुरा असर पड़ता है।इसके विपरीत अच्छा कार्य जैसे भजन करना ,बाग़ रसोई( खाना खेत बगीचे में बनाकर इंद्रदेव को चूरमे का भोग लगा करउन्हें प्रसन्न करने हेतु सामूहिक भोजन करना),जल अभिषेक आदि करना पूजा में आता है।जो कि बहुत अच्छी बात है। वैसे गौरेय्या का धूल में लौटना ,चीटियों का अपने अण्डों को ऊपर की दिशा में ले जाना,फुददों का ज्यादा संख्या में उड़ना आदि कई उदाहरण वर्षा के आने के संकेत होते है| जरा सोचिए मूर्ति. ,मानव और बेजुबान प्राणियों पर वर्षा के आने हेतु इस प्रकार के प्रयोग करना कहाँ तक उचित है ? इसकी बजाए पौधारोपण करना चाहिए।जिससे वृक्ष बादल को आकर्षित करेंगे ।साथ ही ज्यादा संख्या में जल भंडार के स्रोतों के निर्माण की कोशिश भी ज्यादा उचित अल्प वर्षा के दौरान उपयोगी सिद्ध होगी।
वृक्षारोपण करते समय एक बरगद का पेड़ लगाए जाए क्योंकि इसकी आयु कई वर्ष होती है | पशु पक्षियों और इंसानों के लिए ये घना वृक्ष छाँव के साथ सुखद आसरा प्रदान करता है | इसके लगाने से प्रतीक्षालय बनाने के खर्चे का भार भी कम होगा |वृक्षारोपण करने के साथ पौधों की देखभाल भी आवश्यक है |वृक्षों को प्राचीन समय से लोग पूजते आ रहे है ,इसके पीछे भीषण गर्मी मे ठंडी सुखद छाँव प्राप्त होना, शुद्द हवा ,उदर- पोषण, सांसारिक जीवन के अंतिम पड़ाव में दाहसंस्कार में उपयोगी बनना ,पृथ्वी के तापमान को कम व् वर्षा के बादलों को अपनी और आकर्षित कर वर्षा कराना ( उदाहरण -चेरापूंजी ) ,दैनिक जीवन की आवश्यकता की आर्थिक रूप से पूर्ति करना एवं ईश्वर के रूप मनोकामनाओं का आशीर्वाद देना ही पेड का कर्तव्य है |फिर भी लालची इन्सान पेड को काटने हेतु अपने स्वार्थ को सिद्द करने मे लगा रहता है | राजस्थान के डूंगरपुर जिले के हर गांव में अब सबसे पुराने पेड़ को जननी वृक्ष का दर्जा दिए जाने की वृक्ष के सम्मान में प्रशंसनीय पहल की गई है ।वृक्षो की सुरक्षा और इनकी देखभाल इस योजना में बरगद ,खेजड़ी पीपल ,आम ,महुआ ,नीम ,सेमल, गुलर ,मोलश्री ,रायणी ,अर्जुन ,इमली ,कल्पवृक्ष आदि को ( मदर ट्री ) जननी के रूप में चयन किया गया है ।ऐसी योजना हर प्रदेश में लागू होना चाहिए मिट्टी के कटाव रोकने हेतु नदी के तट पर फलदार वृक्ष ज्यादा मात्रा में लगाया जाना चाहिए नए पौधरोपण इस तरह करें ताकि बड़े होने पर उसे काटा ना जा सके | पौधारोपण करते समय उसकी सुरक्षा का इंतजाम पहले से करे। यदि हो सके तो अपनों की स्मृति में या उसे गोद लेकर पौधारोपण का संकल्प लेवे तो ये पुनीत कार्य सफल सिद्ध होगा |वृक्षों से ही जंगल, पहाड़ो का सोंदर्य है |वृक्ष ही इन्सान के मददगार एवं अंतिम पड़ाव तक का साथी होता है व पशु,पक्षियों को आसरा होता है | नासा के वैज्ञानिकों ने पिछले वर्षो के वैश्विक तापमान का मासिक विश्लेषण भी किया। मौसमों में ज्यादा बदलाव यानि अधिक गर्मी के करीब पहुँचना चिंतनीय सवाल खड़े करता है। क्या मौसम के निर्धारित माह अपने माह को आगे बढ़ा रहे है ?पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण मे बदलाव का बुरा असर लकड़ी पर भी हो रहा है |उसकी प्रकृति बदल रही है और उससे बनने वाले वाद्ययंत्रों मे वो मधुर स्वर नहीं पायेगे , जो पहले पाते थे । ये एक चिंता का विषय है |पर्यावरण मे बदलाव को सुधारने हेतु कारगर कदम उठाना होगा ,इस हेतु वृक्षारोपण ज्यादा करे एवं हरे भरे वृक्षों को कटने ना दे, |ताकि वाद्ययंत्रों मे वो मधुर स्वर और ऋतु चक्र सही हो सके|पृथ्वी को बचाने के लिए कुछ तो हमें करना होगा|जितने अधिक वृक्ष होगें वातावरण उतना ही शुद्ध एवं स्वच्छ होगा |वृक्षों होने से वन्य प्राणियों की जीवन सुखद होगा | भविष्य मे हरित क्रांति को विलुप्त होने से बचाने हेतु वृक्षारोपण के पुनीत कार्य में भागीदारी निभाने की सोच विकसितकरनी होगी। निंबोली पकने लगी,निंबोली पकने के संकेत वर्षा के आगमन का सूचक भी माना जाता है।निंबोली इतनी जल्दी पकती नहीं।पर्यावरण असंतुलित से ये सब हुआ है।वैसे आबी के चलने पर वर्षा,टिटहरी के अंडे,ज्यादा गर्मी आदि से वर्षा के शीघ्र आने का अनुमान लगाया जाता है।मेढ़क का टर्राने, चीटियाँ अपने अंडे ऊपर की और लेजाने से,फुद्धो का बहुत नीचे उड़ना आदि भी वर्षा आने के संकेत होते है।कोई तो भविष्यवाणी भी करते है कि वर्षा होगी।खैर कुल मिलाकर जल्दबाजी में खेतों में किसान बोनी कर देते है।उसके बाद वर्षा की लंबी खींचतान से वर्षा कराने के टोटके करते है। मौसम संबंधी यंत्रो को छोड़कर देखा जाए तो पशु- पक्षियों में ऋतु -संबंधी ,वर्षा- संबंधी ,मौसम -संबंधी,दिशा -संबंधी का ज्ञान होता है |कुछ लोग पशु -पक्षियों की चाल -ढाल देखकर भी मौसम का अनुमान लगा लेते है| वर्षा की लंबी खेचतान से हर इंसान चिंतित हर वर्ष रहता आया है।वर्षा का इंतजार किसानों को बोनी पर असर डालता जहां उसे दोबारा बोनी का सामना कर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।इसके अलावा संग्रहित पानी से पानी की खपत से जुड़े थर्मल पावर प्लांट और स्टील जैसे औद्योगिक सेक्टर पर भी दबाब बढ़ता है।देखा जाए तो बारिश में भी कमी आरही है।पानी की कमी से महंगाई में बढोत्तरी, किसानों और उससे जुड़े व्यवसाय में कमी आती है।ये सब जलवायु परिवर्तन के साथ प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है।वर्षा अधिक हो इसके लिए पेड़ ना काटे जाए बल्कि ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण किया जाए।अधिक वर्षा का उदाहरण चेरापूंजी हमारे सामने उदाहरण है।इसके अलावा जल संग्रहण स्त्रोतों का निर्माण किया जाए ताकि क्षेत्र में वाटरटेबल बढ़ सकें।पानी की व्यर्थ खपत को कम किया जावे।ताकि अल्प वर्षा की स्थिति में संग्रहित किया जल राहत पहुंचा सकें।
संजय वर्मा "दृष्टि"
125,बलिदानी भगतसिंह मार्ग
मनावर जिला धार मप्र
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