तुम सूरज हो
सूरज तुम इतने प्रचण्ड ना हो
मालूम है पूरी दुनिया को प्रचण्डता
लोग कहते वो मानेगा नही
क्योंकि
सूरज को दीप दिखाना
जैसी कहावतों से तो लगता
मांगे पूरी न होगी कभी
किन्तु फिर भी विश्वास है इस धरा के लिए।
हे सूरज ,ऋतुओं में ताप को समान रखों
जिसके बढ़ने से रहवासी
प्रचंडता से हो रहे दुःखी
धरा के घट सूख रहे ,
तितलियों के पंख जल रहे
जल ही जीवन है
हे सूरज उसे न सोख
बिन पानी मृत्यु दोष
इंसानों और अन्य जीवों का लगता है।
शायद तुम्हे पता ही होगा
क्योकि तुम सूरज हो
और प्रदूषण फैलाने के
रहवासी भी होंगे भागीदार
घरों में दुबके हुए मतलबी इंसानो को
बाहर झाकने की फुर्सत कहाँ।
गौरय्या सूखे कंठ लिए
जल के लिए ची- ची करती रहे
कौन समझे उसकी बोली
पानी के जल पात्र रखने का
संदेशा धरा दे रही इंसानो को
और कह रही सूरज से
अपनी तपिश को कम कर लो।
तुम सूरज हो धरा को सूखा मत बनाओं
क्योंकि हरियाली और जल ही तो
इसकी पहचान है
संजय वर्मा "दृष्टि "
125 शहीद भगतसिंह मार्ग
मनावर जिला -धार (म प्र )
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