Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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श्रीकृष्ण की लीला अपरंपार

 

श्रीकृष्ण की लीला अपरंपार और प्रेम और भक्ति मार्ग मय थी 

माखनचोर का टैग हटाने का चलाएगी अभियान,मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने टैग को बताया गलत, अभियान की तैयारी, गलत नाम हटाने की बारी, श्रीकृष्ण माखनचोर नहीं थे।मध्य प्रदेश के सीएम डॉ. मोहन यादव और उनकी सरकार का मानना है कि भगवान 'श्रीकृष्ण' 'माखन चोर' नहीं थे|.कंस के प्रति विद्रोह को गलत तरीके से समझ लिया गया और उन्हें माखनचोर नाम से पुकारा जाने लगा।उन्होंने कहा कि 'भगवान कृष्ण ने कंस का विरोध करने का एक तरीका ढूंढा था और उसे 'माखनचोर' का नाम दे दिया गया जो गलत है।चित्त चुराने वाला माखन चोर नहीं हो सकता।ये उनकी शरारत पूर्ण लीलाओं का एक हिस्सा था।जो अपने बाल सखाओं में अपनी गोपियों के घर से माखन सब मिलकर खाते थे।और गोपियों को ये पता था कृष्ण माखन खाने आएंगे।वे राह निहारती थी।माखन हांडी,दही हांडी की जन्माष्टमी पर फोड़ने की प्राचीन काल से चली आ रही है।जिसे प्रसाद और उत्सव के रूप में हमसब मनाते आरहे है।ऐसे में तो सभी हांडी फोड़ने वाले चोर कह लाएंगे क्या?कदापि नही तो भला कृष्ण माखन चोर कैसे हुए।उनके अनेक नाम भी तो है | 

 भला विचारये  तो सही श्रीकृष्णगतप्राणा ,श्रीकृष्ण रसभावितमति  गोपियों के मन की क्या स्थिति थी | वो कुछ इस प्रकार मनोभाव भक्ति भाव से भरी हुई थी जो सर्वोत्तम है | गोपियों का तन,मन ,धन-सभी कुछ प्राणप्रियतम श्रीकृष्ण का था | वे संसार में जीती थी श्रीकृष्ण के लिये ,घर में रहती थी श्री कृष्ण के लिये  और घर के सारे काम करती थी श्रीकृष्ण के लिये | उनकी निर्मल और योगीन्द्र दुर्लभ पवित्र बुद्धि में श्रीकृष्ण के सिवा अपना कुछ था ही नहीं | श्रीकृष्ण के लिये  ही,श्रीकृष्ण को सुख पहुंचाने के लिये ,श्रीकृष्ण की निज सामग्री से ही श्रीकृष्ण को पूजकर -श्रीकृष्ण को सुखी देखकर वे सुखी होती थी | प्रातः काल निंद्रा टूटने के समय से लेकर रात को सोने तक  वे जो कुछ भी करती थी,सब श्रीकृष्ण की प्रीति के लिये  ही करती थी | यहां  तक की उनकी निंद्रा भी श्रीकृष्ण में  ही होती थी | स्वप्न और सुषुप्ति  दोनों में ही वे श्रीकृष्ण की मधुर और शांत  लीला देखती और अनुभव करती थी | रातों गोपियाँ जाग -जागकर प्रातः काल  जल्दी -जल्दी दही मथकर,माखन निकाल कर छीके पर रखती | कही प्राणधन आकर लौट न जाये इसलिए सब काम को छोड़कर  वे सबसे  पहले यही काम  करती|  रात को दही जमाते समय श्याम सुंदर की माधुरी छवि का ध्यान करती हुई प्रेममयी प्रत्येक गोपी यह अभिलाषा करती थी कि मेरा दही सुंदर जमे,श्रीकृष्ण के लिये  उसे बिलोकर मै बढ़िया सा और बहुत -सा माखन निकालूँ  और उसे उतने ही ऊंचे छीकेपर रक्खु ,जितने पर श्रीकृष्ण के हाथ आसानी से पहुंच सकें | फिर मेरे प्राणधन श्रीकृष्ण अपने सखाओं को साथ लेकर हँसते और क्रीड़ा करते हुए घर में पदार्पण करें,माखन लुटें और अपने सखाओं और  बंदरो को लुटाये,आनंद में मत्त  होकर मेरे आँगन में नाचे और मै किसी कोने से छिपकर इस लीला को अपनी आँखों से देखकर जीवन को  सफल करूँ | और फिर अचानक ही पकड़कर ह्रदय से लगा लूँ |सूरदास जी ने गाया है -मैया री ,मोहि माखन भावे |जो मेवा पकवान कहति तू ,मोहे नहीं रूचि आवै || ऐसी भाग्यवती गोपियों की मनोकामना भगवान उनके घर पधारकर पूर्ण करते | सूरदास जी ने गाया  है - प्रथम करी हरी माखन -चोरी | ग्वालिनि मन इच्छा करि  पूरन ,आपु भजे ब्रज खोरी || 

अपने निजजन ब्रजवासियों  को सुखी करने के लिये  तो भगवान गोकुल पधारे थे |माखन तो नंदबाबा के घर पर कम ना था ,लाख -लाख गौएँ थी | वे चाहे जितना खाते -लुटाते |परन्तु वे तो केवल नंदबाबा के ही नहीं,सभी ब्रजवासियों के अपने थे,सभी को सुख देना चाहते थे |गोपियों की लालसा पूरी करने के लिये  वे उनके घर जाते और चुरा -चुराकर माखन खाते |यह वास्तव में चोरी नहीं ,यह तो गोपियों की पूजा -पद्धति का भगवान के द्वारा स्वीकार था | भक्तवत्सल भगवान भक्त की  पूजा का स्वीकार कैसे ना करें |माखन के लिए चिकसोले वाली गोपी के यहां से शुरुआत की थी। श्रीकृष्ण की बाल सखाओं की टोली में सुबल, मंगल, सु मंगल, सुदामा, तोसन, आदि शामिल रहते थे। 

भगवान की इस दिव्यलीला -माखनचोरी का रहस्य न जानने  कारण कुछ लोग इसे आदर्श के विपरीत बतलाते है | उन्हें पहले समझना चाहिये  चोरी क्या वस्तु है ,वह किसकी होती है और कौन करता है | चोरी उसे कहते है जब किसी दूसरे की कोई चीज उसकी इच्छा के बिना,उसके अनजाने में और आगे भी जान न पाये -ऐसी इच्छा रखकर ले ली जाती है | भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के घर से माखन लेते थे उनकी इच्छा से,गोपियों के अनजान में नहीं - उनकी जान में ,उनके देखते -देखते और आगे जानने की कोई बात ही नहीं -उन सामने ही दौड़ते हुए,निकल जाते थे | बाहर ऐसी कौन -सी वस्तु है ,जो श्रीभगवान जी की नहीं है और वे उसकी चोरी करते है | गोपियों का तो सर्वस्व श्रीभगवान का था ही,सारा जगत  ही उनका है | वे भला,किसकी चोरी  क्र सकते है ?हाँ ,चोर तो वास्तव में वे लोग है जो भगवान की वस्तु को अपनी मानकर ममता -आसक्ति में फंसे रहते है और दंड के पात्र बनते है |उपर्युक्त सभी दृष्टियों से यही सिद्ध होता  सिद्ध होता है कि  माखनचोरी चोरी न थी,भगवान की दिव्य लीला थी असल में गोपियों ने प्रेम की अधिकता से ही भगवान का प्रेम का नाम 'चोर ' दिया था ,क्योकि वे उनके चित्तचोर तो थे ही | (साभार पिबत भागवतं रसमालयम)  

संजय वर्मा 'दॄष्टि '

125 ,बलिदानी भगतसिंह मार्ग 

मनावर जिला धार मप्र 

9893070756 


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