सावन
आकाश को निहारते मोरसोच रहे ,बादल भी इज्जत वाले हो गएबिन बुलाए बरसते नहींशायद बादल कोकड़कड़ाती बिजली डराती होगीसौतन की तरह।बादल का दिल पत्थर का नहीं होताप्रेम जागृत होताआकर्षक सुंदर, धरती के लिएधरती पर आने कोतरसते बादलतभी तो सावन मेंपानी का प्रेम -संदेश भेजते रहेरिमझिम फुहारों से।धरती का रोम -रोम,संदेशा पाकरहरियाली बन उठ जातेमोर अपने पंखों को फैलाकरस्वागत हेतु नाचने लगतेकिंतु बादल चले जातेबेवफाई करकेछोड़ जाते हरियालीसावन में पानी की यादेंधरती परप्रेम संदेश के रूप में।संजय वर्मा "दृष्टि "125 ,बलिदानी भगत सिंह मार्गमनावर जिला -धार (म प्र )
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY