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Dr. Srimati Tara Singh
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सरीसृप (सांप )प्रजाति के प्राणी की पूजा

 
प्राचीन काल से ही सरीसृप (सांप )प्रजाति के प्राणी को पूजा जाता है
 
नागपंचमी को सांप पंचमी क्यों नहीं कहा जा सकता? सरीसृप प्रजाति के प्राणी को पूजा जाता है ,वह सर्प है किन्तु नाग तो एक जाति है.जिनके संबंध मतानुसार अलग-अलग मत है -यक्षों की एक समकालीन जाति सर्प चिन्ह वाले नागों की थी।यह भी दक्षिण भारत में पनपी थी।नागों ने लंका के कुछ भागों पर ही नहीं,वरन प्राचीन मालाबार पर अधिकार जमा रखा था।रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र को उनका अधिष्ठान बताया गया है।महेंद्र और मैनाक पर्वतों की गुफाओं में भी नाग निवास करते थे।हनुमानजी द्वारा समुद्र लांघने की घटना को नाग ने प्रत्यक्ष देखा था। 
नागों की स्त्रियाँ अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थी।प्राचीन काल में विषकन्याओं का चलन भी कुछ ज्यादा ही था।इनसे शारीरिक संपर्क करने पर व्यक्ति की मौत हो जाती थी।ऐसी विषकन्याओं को राजा अपने राजमहल में शत्रुओं पर विजय पाने तथा षड्यंत्र का पता लगाने  हेतु भी रखा करते थे।रावण ने नागों की राजधानी भोगावती नगरी पर आक्रमण करके वासुकी ,तक्षक ,शंख और जटी नमक प्रमुख नाग को परास्त किया था ।कालन्तर में नाग जाति चेर जाति में विलीन गई ,जो ईस्वी सन के प्रारम्भ में अधिक संपन्न हुई थी । 
नागपंचमी मनाने हेतु एक मत यह भी है कि अभिमन्यु के बेटे राजा परीक्षित ने तपस्या लीन  मैंन ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया था।इस पर ऋषि के शिष्य श्रृंगी ऋषि ने क्रोधित होकर श्राप दिया कि यही सर्प सात दिनों के पश्चात तुम्हे जीवित होकर डस लेगा,ठीक सात दिनों के पश्चात उसी तक्षक सर्प ने जीवित होकर राजा को डंसा।तब क्रोधित होकर राजा परीक्षित के बेटे जन्मजय ने विशाल "सर्प यज्ञ" किया जिसमे सर्पो की आहुतियां दी।इस यज्ञ को रुकवाने हेतु महर्षि आस्तिक आगे आए।उनका आगे आने का कारण यह था कि महर्षि आस्तिक के पिता आर्य और माता नागवंशी थी।इसी नाते से वे यज्ञ होते देख न देख सके ।सर्प यज्ञ रुकवाने ,लड़ाई को ख़त्म करके  पुनः अच्छे सबंधो को बनाने हेतु आर्यो ने स्मृति स्वरूप अपने त्योहारों में "सर्प पूजा "को एक त्यौहार के रूप में मनाने की शुरुआत की। नागवंश से  ताल्लुक रखने पर उसे नागपंचमी कहा जाने लगा होगा।
मास्को के लेखक ग्राम वागर्द लोविन ने प्राचीन "भारत का इतिहास " में नाग राजवंशों के बारे में बताया कि मगध के प्रभुत्व के सुधार करने के लिए अजातशत्रु का उत्तराधिकारी उदय (४६१ -ई पु )राजधानी को राजगृह से पाटलिपुत्र ले गया ,जो प्राचीन भारत प्रमुख बन गया।अवंति शक्ति को बाद में राजा शिशुनाग के राज्यकाल में ध्वस्त किया गया था।एक अन्य राज शिशुनाग वंश का था।शिशु नाग वंश का स्थान नन्द वंश (३४५ ई पु )ने लिया।भाव शतक में इसे धाराधीश बताया गया है.अर्थात नागो का वंश राज्य उस समय धारा नगरी(वर्तमान में धार )तक विस्तृत था।धाराधीश मुंज के अनुज और राजा भोज के पिता सिन्धुराज या सिंधुज ने विंध्याटवी के नागवंशीय राजा शंखपाल की कन्या शशिप्रभा से विवाह किया था।इस कथानक पर परमार कालीन राज कवि परिमल पद्मगुप्त ने नवसाहसांक चरित्र ग्रंथ की रचना की।मुंज का राज्यकाल १० वी शती ई पु का है।अतः इस काल तक नागों का विंध्य क्षेत्र में अस्तित्व था।नागवंश के अंतिम राजा गणपति नागवंशी था।नाग जनजाति का नर्मदा घाटी में निवास स्थान होना बताया गया है ।हेययो ने नागों को वहां से उखाड़ फेंका था।कुषान साम्राज्य के पतन के बाद नागों का पुनरोदय हुआ और ये नव नाग कहलाए। उनके राज्य मथुरा ,विदिशा ,कांतिपुर ,(कुतवार )व पदमावती (पवैया )तक विस्तृत था।नागों ने अपने शासन काल के दौरान जो सिक्के चलाए थे उसमे सर्प के चित्र अंकित थे ।इससे भी यह तथ्य प्रमाणित होता है कि नागवंशीय राजा सर्प पूजक थे।शायद इसी पूजा की प्रथा को निरंतर रखने हेतु श्रावण शुक्ल की पंचमी को नागपंचमी का चलन रखा गया होगा।
एक जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में तपकरा क्षेत्र में ज्यादा सांप पाए जाते है। जशपुर को 'नागलोक' के नाम से भी जाना जाता है.प्राचीन काल में दश पुर को दंडकारण्य का हिस्सा माना जाता है.जहाँ अनेक लोक कथाएं नागलोक से जुड़ी हुई है। लोगों को सर्पदंश से बचाने एवं साँपों के संरक्षित करने के लिए वहां पर युवाओं की सोसायटी कार्य कर रही है। कई लोग सर्पदंश के बाद पीड़ित को अस्पताल न ले जाकर झाड़फूंक कराते है जो मौत का प्रमुख कारण होता है। कोबरा ,करैत की जहरीली प्रजाति यहाँ पाई जाती है। यहाँ की जलवायु और इलाके में पाए जानेवाली भुरभुरी मिट्टी होने के कारण दीमक अपनी बांबियाँ(मिट्टी के लघु टीले ) बना लेते है जिनमें घुसकर सांपों के जोड़े जनन करते है और दीमकों को चाट कर जाते है।
एक जानकारी के मुताबिक सांप एक मांसाहारी प्राणी है जो दूध पचा नही सकते है।सांपों में श्रवण शक्ति कमजोर होती है,इन्हें सिर्फ कंपन महसूस होता है।बिन की हरकत पर प्रतिक्रिया देते है जिसे नृत्य समझ बैठते है।दो महान सांप के दोनों तरफ सिर होते है,किसी भी जीव में सर एक ही होता है,बोआ सांप का सिर और पूंछ एक जैसे दिखते है।धामन सांप विषहीन सांप है।सुग्गा सांप झाड़ी व पेड़ो पर रहते है इसलिए इंसानों के सर पर ही वार कर पाते है जिसे लोग समझते है की यह सिर्फ आंखों पर वार करते है।शेषनाग अपने सर में नागमणि रखते है यह अभी तक प्रमाणित नही हो पाया है,यह एक मिथक है।सांप अपने साथी को मारनेवाले की तस्वीर्रे अपनी आंख की मदद से खींच लेता है और उससे बदला लेता है,यह काल्पनिक और फिल्मी कहानियों में ही संभव है,क्योंकि सरिसर्पो की स्मरण शक्ति हम इंसानों जैसी नही होती है,ना ही वो बदला ले सकते है।
एक जानकारी के मुताबिक कई सांप नहीं होते जहरीले लेकिन जोखिम न ले|जैसे इंडियन रैट स्नेक( धामिन ),पाइथन ,वाइन स्नेक,कॉमन स्नेक ,रॉक स्नेक ,चेकर्ड स्नेक(पानी वाला सांप  डेंडू ) वुल्फ स्नेक (लोमड़ी सांप )डिट्रिक्ट स्नेक और दोमुंहा सांप|क्या करें-घबराए नहीं,शांत रहे और पीड़ित को भी शांत रखे |जितनी जल्दी हो सकें नजदीकी अस्पताल या चिकित्सा केंद्र जाए | पीड़ित को कम से कम हिलाएं -डुलाएँ और प्रभावित अंग को स्थिर रखें|घाव को साफ पानी से धोकर साफ़ कपडे से ढंक दे|सूजन बढ़ने से पहले अंगूठी,कंगन और तंग कपड़े हटा दे|डॉक्टर से एंटीवेनम का इंजेक्शन लगवाए |काया न करें - घाव को मुंह से चूसकर जहर निकालने की कोशिश न करें| काटे गए स्थान पर बर्फ न लगाए|झाड़ -फूंक में समय न गवाएं|मरीज को घबराने न दें,|मानसिक स्थिति को स्थिर रखें | बरसात में विशेषकर सतर्कता बरते |मप्र में भी कुछ लोग नागदा नामक ग्रामो को नागदाह  से भी जोड़ते है।शायद यही पर सर्प यज्ञ हुआ होगा।नाग -नागिन की प्रतिमा और चबूतरे अधिकतर गांव बने हुए है इन्हें भिलट बाबा के नाम से भी पुकारा है। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था।उज्जैन में नागचंद्रेश्वर का मंदिर नागपंचमी के दिन ही खुलता है व सर्प उद्यान भी है।खरगोन में नागलवाड़ी क्षेत्र में नागपंचमी के दिन मेला व बडे ही सुसज्जित तरीके से भंडारा होता है।देखा जाए तो हर गाँव -शहर में नाग मंदिर स्थापित है।जहाँ ज्यादा सर्प हो वहां पर स्नेक पार्क बनाया जाना चाहिए।वर्तमान में उड़ने वाले सांपो की प्रजाति का पता चला।दक्षिण अमेरिका में  इस प्रकार की प्रजाति के सांप के फन अवशेष शोधकर्ताओं को प्राप्त हुए।टेरासोर की नई  प्रजाति को "ऑलकारेन"नाम दिया गया।शोधकर्ताओं का प्रमुख उद्देश्य उड़ने वाले साँपों के खास समूह की उत्पति व् विकास के बारे में नई जानकारी के साथ उनके मस्तिष्क  संरचना को समझना आदि रहा है।पूर्व में भी उड़ने वाले साँपों के बारे में प्रजाति मिली थी जो क्रिसोपेलिया प्रजाति की पाई गई थी।ये सांप एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाते समय अपने शरीर के आकार में परिवर्तन कर लेते है और एक पेड़ से  दूसरे पेड़ पर छलांग लगाकर पहुँचते है. जिससे सभी को उड़ने का आभास होता है।भारत में भी कई प्रदेशो के अलावा वर्षा वनों में पेड़ों पर ये अपना बसेरा करते है।साँपों की बात करें तो ,मणि धारी, इच्छाधारी ,सात फन वाले ,आदि सांपों के बारे में कहानी किस्से वर्षो से सुनते आ रहे है,मगर देखा किसी ने नहीं।सर्प दूध नहीं पीता है ,उनकी पूजा करना रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।सर्प कृषि मित्र भी है,वह फसलों को हानि पहुंचाने वाले जीवों से फसलों की रक्षा करते है।
संजय वर्मा 'दृष्टि '
125 ,बलिदानी भगत सिंह मार्ग 
मनावर जिला धार (मप्र )

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