साहित्य साधना में पठनीयता का मुख्य रोल होता है।
छल से रचा गया साहित्य-न शब्द,न सत्य को पढ़ते है लोग तो समझ ही जाते है ये पुराने रचनाकार की रचना को तोड़ मरोड़ कर अपने नाम से प्रकाशित कर प्रसिद्ध होना चाहता है।आजकल नई पीढ़ी के साहित्य पढ़ते नही सीधे सीधे पूर्व से रचे गए साहित्य में सेंध मारी करते है।कम्यूटर में कई भाषाओं में साहित्य पड़ा होता है।उसे तोड़ मरोड़ कर उसके खास संवादों को पारिवारिक वातावरण की कहानी,लेख बनाकर गेटर लगाने का कार्य बढ़ी आसानी से कर लेते है।वे समझते कौन इतनी खोज बिन करेगा।जब बिल्ली आंख बंद कर दूध पीती है तो वो समझती कोई उसे नही देख रहा।उदाहरण के तौर पर गजल लिखने के लिए उस्ताद की जरूरत होती साथ उर्दू लफ्जों का ज्ञान होना भी आवश्यक होता है।वजन, शेर,मकता आदि का समावेश करना होता है जब गजल बनती है।हिंदी गजल की बात नही।उर्दू गजल की है।किसी वातावरण में रहकर उर्दू के शब्द सुनने से गजलकार नहीं बन सकते।ये तो वैसी बात हो गई पजामे के नाप दिया और चड्डी सील दी।गजल के मापदंड सीखना होता है।वैसे ही लेख में यदि व्यक्ति के स्वभाव पर,वातावरण पर उसके स्वभाव को देखकर उस पर तंज कसते हो तो।ये गलत होगा।किसी पर लिखने से पहले लेखक आप क्या हो? किसी ने पूछ लिया तो क्या होगा।लेखक को स्वयं को अपने अंदर झांकना होगा।आजकल फोटो शॉप में जाकर इंसान गोरा हो सकता,कोट पहन सकता यानी अलग सा सोशल मीडिया पर वरिष्ठ दिखने का आवरण पहना हुआ दिख सकता है।दिखावे से दूर रहना चाहिए।भले ही घर पर,बाजार में चड्ढा पहन कर घूमता हो।लेख के लिए संदर्भित आंकड़े, आवश्यक प्राचीन जानकारी,त्यौहार, यानि जनरल नॉलेज आदि का होना आवश्यक है।ना कि सीरियल देखकर या सिर्फ वातावरण समेटना,साहित्यकारों को वर्षो साहित्य की साधना करना होती है तब जाकर उन्हें मंचीय सम्मान मिलता है।किताबों का संग्रह होता है।अच्छे लेखक बनने से पहले साहित्यकारों से सीखने की कोशिश करना चाहिए।न की कुछ इधर उधर से लेने की।उदाहरण के तौर पर यदि पत्र लेखन करते है तो उसे पत्रकार का आवरण कभी नही ओढ़ना चाहिए।क्योंकि पत्रकारिता का भी कोर्स होता है। शब्द कहां कैसे प्रयोग करना है उसका ज्ञान होना आवश्यक है।जैसे किसी के मरने पर उसके धर्म के हिसाब से शब्द लिखे जाते है सुपुर्दे खाक किया,या दूसरे धर्म का है तो दाह संस्कार किया,आदि प्रयोग किया जाता है।लेखनियता में आपकी शैली क्या एक समान होती है जैसे हर समय वातावरण किसी व्यक्ति के लिए।तो ऐसे लेख लिखे ये तो सबको ही मालूम होते है ज्यादा आकर्षण नही होते।इससे जागरूकता नहीं आएगी और ना ही समाज को नई दिशा देगी।प्रकाशन और प्रसिद्धि के बहाने धोखे पर आधारित साहित्य रचने से पहले साहित्य अध्ययन आवश्यक है,व्याकरण,आवश्यक,साथ ही शब्दों का कहां प्रयोग करना,कौन से शब्द प्रतिबंधित है उसका ज्ञान होना अति आवश्यक है।खैर कुल मिलाकर साहित्य साधना पठनीयता का होना आवश्यक है।
संजय वर्मा "दृष्टि"
मनावर जिला धार मप्र
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