पिता की सायकल(बेटी-पिता संबंध)
एक बार मेरे मित्र जो काफी पैसे वाला था।उसने मुझसे कहा-क्या, यार तुम अभी भी साइकिल चलाते हो।दुनिया कहाँ से कहाँ निकल गई।मोटरसायकिल लेते क्यों नही।इतनी कंजूसी कैसी।तुम तो नौकरी भी करते हो।कम से कम मोटरसाइकिल नौकरी के हिसाब से होना ही चाहिए।देखो मैंने कार को खरीद दस साल होगए।मैने उससे कहा- यार ,मेरी तनख्वाह से मेरा घर चलता है।और आगे बच्चों का भी तो सोचना है।सायकल से मैं फीट भी रहता हूँ।मेरा शौक भी है।सायकल से में हर किसी से मिल कर बातें कर सकता।अच्छी तरह से देख सकता हूँ।यदि मोटरसायकिल ले लेता तो उसकी रप्तार के कारण जगह जगह रुक कर ठीक तरीक़े से बातें नही कर सकता। मित्र जो पैसे वाला था।उसकी बेटी ने मेरी बेटी के पास सायकल देखी तो वो भी अपने पापा से सायकल लेने की जिद्द करने लगी।चाहता तो भी मोटर साइकिल लेने की कह सकता था।मित्र,असमझ में पढ़ गया।सायकल की पसंद के आगे उसे झुकना ही पड़ा।पसंद और शौक भी होना चाहिए।पैसा ही सब कुछ नही होता।आज मित्र की बेटी और मैं सुबह साथ साथ घूमने जाते।मित्र कार में बैठ कर मूक बने देखते रहते।औऱ सोचते कि काश मुझे भी साइकिल चलाना आता तो मैं भी अपनी बेटी के संग घूमने साइकिल से जाकर पिता की खुशियां और सहयोग के मायने का निर्वहन कर पाता।
संजय वर्मा 'दृष्टि'
125 ,बलिदानी भगतसिंह मार्ग
मनावर (धार)मप्र
9893070756
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