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'मोतें संत अधिक करि' समीक्षा

 
लेखक वीरेंद्र सिंह  का संकलन 'मोतें संत अधिक करि'  बेहतरीन संग्रहणीय अंक 

लेखक वीरेंद्र सिंह  का संकलन 'मोतें संत अधिक करि 
लेखा '(स्वाध्याय )में  नारद मोह,,अहल्या ,कैकेयी ,केवट भाव ,,केवट प्रभाव ,निषादराज ,,खोल -किरात,भरत चरित्र, मारीच ,गीधराज जटायु,भक्ति मति शबरी,शबरी-नवधा भक्ति,पवनपुत्र हनुमान,सुतीक्ष्ण ,स्वयंप्रभा ,संत विभीषण,,शुक-शक,वानरराज सुग्रीव ,त्रिजटा,मोतें संत अधिक करि लेखा  आदि पर रामचरितमानस को वीरेंद्र सिंह ने अपने मन में उदगार शब्दों को  लेखनी में पिरोया है| पात्रों  की  घटनाओं को अपने तरीके से प्रस्तुत कर ग्रंथ से कोई छेड़छाड़ यही की गई बल्कि अपने पुनीत विचार का मंथन किया है जो भक्ति बल को  बढ़ाता  है | रामायण (रामचरित) राम -कथा  ही  है | प्रत्येक कथा वाचक का  अपना अर्थ ,इच्छा के रसों का प्रयोग करना होता है श्रोता,स्वयं को  हर पात्र की भूमिका में अनुभव करने  लगता है | उस घटना से  जुड़ा  हुआ दर्शन अंगीकार  करता है | स्वयं के यथार्त को छोड़ बैठता  है,वहाँ वासना का वातावरण नहीं  हो सकता |शाब्दिक दृष्टि से 'कथा' कोई बड़ा भारी  शब्द भी नहीं है | 'कथम '(कैसे ) का स्त्रीलिंग है | कथा ,स्तुति मौखिक वाचन है | इसी से श्रुति चलती है |महपुरुषों  के कर्म  ओर व्यवहार  की कथाएं अत्यधिक रोचक होती  है | उनकी  दिव्यता के कारण उनके घटना स्थल भी तीर्थ  बन जाते है |  राम के जीवन की घटना से जुड़े होने के कारण पंचवटी  आज बढ़ा तीर्थ है | शबरी  के बेर के स्थान,,केवट के नदी पार का स्थान  अदि ये सब शास्त्रीय उदाहरण है | वैदिक रूप से तो रामकथा का अंत नहीं(अनंत) है |
हरि अनंत  हरि कथा अनंता | कहहिं  सुनहिं बहुबिधि सब संता || (3 /140  बालकाण्ड ) 
 संकलन में ऐसी कई एक से बढ़कर एक पात्रों के भाव  समाहित है । लेखक  इस दिशा में भी सक्रिय है उनका मानना है कि "कथावाचन इस देश का सबसे बड़ा ज्ञान यज्ञ है| कथावाचन का ज्ञान शाश्वत है,कभी पुराने  नहीं पड़ता | महर्षि वाल्मीकि,वेद व्यास  एवं तुलसीदास इस देश के महान कथा वाचक हो गये  है एवं शिक्षा और संस्कृति के सिरमौर भी रहे है |कथावाचक की व्यासपीठ प्रतिष्ठापीत की जाती है क्योंकि उनकी वाणी से जीवन में दिव्यता का भाव बना रहता है | कथा प्रभाव ही रस  की प्रधानता,आनंद की अनुभूति का स्थाई मार्ग है ,भक्ति में प्रवेश है |श्रवण मार्ग में कथा,गायन,संगीत,यहाँ तक  कि अभिनय तक की स्वतंत्रता रहती है |  कथा में तथ्य गौण रहते है | यही कारण  है कि रामायण,महाभारत ,गीता जैसे काव्यों के भी हजारों स्वरुप भिन्न -भिन्न समुदायों में सुनने को मिलते है | संकलन 'मोतें संत अधिक करि   'के द्वारा  ने लेखनीय के क्षेत्र में ये कर दिखाया है। उनके सम्मान का परचम सदा लहराता रहे एवं उन्हें सम्मान मिलते रहे यही हमारी कामना है ।लेखक वीरेंद्र सिंह  का संकलन 'मोतें संत अधिक करि १००% दिलों में जगह बनाएगा इसमें कोई शक नहीं है। हमारी यही शुभकामनाएं है । निसंदेह सफलता की ओर अग्रसर होगा यही शुभकामनाएं है ।  

   समीक्षा :
पुस्तक का नाम: मोतें संत अधिक करि 
लेखक: श्री. वीरेंद्र जी
प्रकाशक : फ्रेंड्स हेल्पलाइन कोटा
48 ए शिवपुरा,बाबा रामदेव मंदिर के पास रावतभाटा रोड ,कोटा-324009 (राजस्थान )
पृष्ठ संख्या -135 
प्राप्ति स्थान: जी - श्री वीरेंद्र सिंह 16 ,दुर्गापुर हाउस गली न 1 सरस्वती कॉलोनी बारा रोड, कोटा(राजस्थान )324001
समीक्षक -संजय वर्मा 'दृष्टि '
125 बलिदानी भगतसिंह मार्ग ,मनावर जिला धार मप्र

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