Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मेरे पिता

 
मेरे पिता

बचपन की स्मृतियाँ 
संग पिता के याद आ जाती
छा जाती मस्तिष्क पटल पर 
जो काम पिता कर लेते थे 
पिता के नही होने पर
वो लोगो से पूछना पड़ता।

हौसला अफजाई 
और परीक्षा में पास होने पर 
पीठ थपथपाई भी गुम सी गई
अब में पास हुआ किंतु 
शाबासी की पीठ सूनी पड़ी है
और त्यौहार भी मुँह मोड़ चुके 
और खुशियां भी रास्ता भूल गई 
पकवान और नए कपड़े
कैद हो गए पेटियों में।
पिता
वृक्ष की तरह थे
जैसे वृक्ष पक्षियों का देते आसरा 
पिता भी थे हमारा  सहारा 
किंतु एलबम के पन्ने खोलता 
आँखों में आंसू छलक जाते 
सोचता हूँ तो ऐसा लगता वो जीवित है 
और उनकी साँसों से मेरी खुशियां 
मुझे एक नई राह दिखा रही | 

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