मध्यप्रदेश में मालवी निमाड़ी बोली हेतु अकादमी खोले जाने की दरकार
एक जानकारी के मुताबिक गूगल सर्च इंजन ने अपने पहले 'डायरेक्ट स्पीच टू स्पीच ट्रांसलेसनसिस्टम में बिना किसी दुभाषिए के दो अलग भाषा बोलने वाले लोगों के बीच बिना किसी असुविधा के संवाद मुमकिन बना दिया है | वैश्विक व्यापार से लेकर विभिन्न संस्कृतियों के बीच भाषाई दूरी को ख़त्म करने का काम करेगा | ठीक उसी तरह क्षेत्रीय बोलिया भी है जिसमे कई तो विलुप्ति की कगार पर जा पहुँची |और कई बोलियाँ अन्य बोलियों में एवं अंग्रेजी में मिश्रित हो गई है |जिससे उनको बोली जाने वाली लय एवं शब्द अपने मूल स्वभाव से दूर होती दिखाई देने लगी है |इनके हीत के लिए गूगल सर्च इंजन 'डायरेक्ट स्पीच टू स्पीच ट्रांसलेसनसिस्टम में क्षेत्रीय बोली को भी जोड़ा जाना चाहिए |ताकि भाषा के अलावा क्षेत्रीय बोलियों की भी एक दूसरे को समझ हो सकें |
भारत सरकार द्वारा प्रायोजित भारत जेन परियोजना के अंतर्गत निमाड़ी बोली और साहित्य को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोग्राम भारत जेन में शामिल करने हेतु पद्मश्री जगदीश जी जोशीला एवं साहित्यकार ,कवि ,मालवी - निमाड़ी बोली बोलने वाले सतत लगे होकर बैठक कर निमाड़ी बोली का डाटा एकत्रीकरण हेतु योजना बनाई जा रही है |उल्लेखनीय है कि निमाड़ी बोली के लिए तत्पर पद्म श्री सम्मान से इस वर्ष सम्मानित पद्म श्री जगदीश जी जोशीला गोगांवा (खरगोन ) मप्र को हर तहसील में सम्मानित किया गया था |एवं अनिलोप की सदस्य्ता भी दिलवाई जा रही है | एसआईआऱ फॉर्म में मातृभाषा के कॉलम में निमाड़ी- मालवी अवश्य लिखने की मांग की है| ताकि बोली बोलने वालो की संख्या ज्ञात सरकार को ज्ञात हो सकें |
मालवा निमाड़ क्षेत्र के लोगो के लिए मालवी निमाड़ी बोलियों की साहित्य अकादमी खोलने की मांग प्रशंसनीय है |मध्यप्रदेश में मालवी निमाड़ी अकादमी स्थापित किए जाने की आवश्यकता है | इन बोलियों का साहित्य उपलब्ध नहीं हो पाता साथ ही छात्र छात्र छात्राओं को शोध में सहायता मिल नहीं मिल पाती है | मालवी निमाड़ी बोलियों को प्राथमिकता देने हेतु मध्य प्रदेश में मालवी निमाड़ी अकादमी स्थापित होनी चाहिए | बोलियाँ को बचाने की पहल की जाना चाहिए |बोलियों तो व्यवहार में लाने से ही जिन्दा रहेगी।कई क्षेत्रों में बोली बोले जाने का प्रतिशत कम होता दिखाई देने लगा है |कई बार क्षेत्रीय बोली खड़ी भाषा के संग मिश्रित हो जाती है |क्षेत्रीय बोली जहाँ उचित हो वहां पर अवश्य बोली जाए।
मालवी निमाड़ी बोली के कई शब्द मूल है और कई अपभ्रंश रूप में सामने आए है।जैसे-सफेद झक,मीठो चट, गोल गट, बलितो यानी चूल्हे में जलाने की लकड़ी,चुम्बली यानि मटका सर पर रखने के पूर्व कपडे की गोल रिंग,माँजरी-कुए में बाल्टी निकालने का यंत्र,विल्ली-सब्जी काटने का यंत्र जो दराते(हंसिया)का एक रूप होता है। मालवा निमाड़ के मध्य जोड़ पर बसे गांवों में बोली मालवा निमाड़ी मिश्रित बोली बोली जाती है।शुद्ध बोली ऐसे में शुद्धता से दूर होती है।ये क्षेत्र के जहाँ जोड़ होता है वहां ऐसी स्थिति निर्मित होती है।जिसे दूर कर पाने हेतु कार्यशाला लगाई जाना चाहिए ताकि बोली अपना मूल स्वरूप न खो सकें।दूसरी बात ये भी देखने में आई कि पहले बातों में ,लिखने में मुहावरों का भी प्रयोग किया जाता था।मुहावरों का पाठ्यक्रमों में महत्व दिया जाता था।ऐसा लगने लगा कि लोग मुहावरों के प्रयोग से पीछे हटने लगे है।मुहावरों के हित मे ये चिंतनीय पहलू है।वही ग्रामीण क्षेत्रो में बोली जाने वाली बोलियों में लोकबोली में निर्मित मुहावरों,कवाड़े आदि आज भी कही कही बातचीत में समाहित किए जाते है।जो कि गर्व की बात है।मालवी निमाड़ी बोली के मुहावरों का प्रयोग जारी रखना होगा।ताकि मुहावरा विधा विलुप्त ना होने पाए।मालवी बोली के समर्थन मे समूचा मालवा मे एक सक्रियता दिखाई देने लगी आकाशवाणी,काव्य गोष्ठी ,मालवी साहित्य ,प्रचार जोरो शोरो से होने लगा जो की बोलियों के हीत मे एक सुखद प्रयास माना जायेगा |वाकई मालवी बोली मे मिठास है जगह जगह पर इसके मिठास के लहजो मे लयकारी बोल झलकते है जो मन को आकर्षित करते है |मालवी और निमाड़ी दोनों बहने है|मालवी दिवस का जोर शोर है उसी तरह निमाड़ी का भी होना चाहिए|भले ही साहित्य उपासको ने इन बोलियों के प्रति अपनी नीव मजबूत की हो किन्तु इनका सही तरीके से प्रचार नहीं कर पाए है जैसा मालवी बोली के लिए हो रहा है|संस्थाओं को अपनी साहित्यिक गतिविधियों को बढावा देना होगा ताकि बोलियों को सम्मान मिलता रहे|वर्तमान में शहरों एवं गांवों में जान पहचान वाले लोगों से लोग अपनी बोली में बात करने के बजाए खड़ी बोली में बात करना ज्यादा पसंद करने लगे है |जो की बोली के हित में उचित नहीं है|ऐसे में धीरे धीरे ये क्षेत्रीय बोलियां हमसे ही दूर हो जाएगी|भाषांओं और बोलियों के संरक्षण के स्थानीय प्रयासों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि बोलियों को संरक्षित कर उसे बचाया जा सकें |सोशल मिडिया ,वॉट्सऐप ग्रुप एवं पत्र पत्रिकाओं में साहित्य विधा के रूप में एवं गीत,नाट्य,काव्य मंच के प्रयासों से इसको बढ़ावा दिया जा सकता है |
संजय वर्मा 'दॄष्टि '
125 बलिदानी भगतसिंह मार्ग
मनावर (धार )मप्र
9893070756
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