लड़की पढ़ना चाहती है" काव्य का अनुपम उपहार
"लड़की पढ़ना चाहती है शुभांकर मानव सेवा संस्थान बड़नगर जिला उज्जैन मप्र का एक अलाभकारी संगठन है जो मूलतः बच्चों व महिलाओं को शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वावलम्भी और सशक्त बनाने का कार्य कर रहा है | इसके अलावा लोक कला, मालवी-निमाड़ी भाषा के विकास हेतु भी संस्थान कार्य कर रही है | संपादक नीतेश जोशी 'जय ',संजय परसाई 'सरल ' का काव्य गुलदस्ता है| अध्यक्ष श्रीमती भावना जोशी का वाक्य -समाज निर्माण में लगना और समाज में जनजागृति उत्पन्न कर समस्याओं के खिलाफ वातावरण बनाना और समाज से कुरूतियों का समूल नाश करना संस्थान का लक्ष्य है |रचनाकारों के गहरे मन को छूती हर काव्यरचना की पड़ताल की जाकर बेहतर तरीके से शुभकामनाओं सहित अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है ।वर्षो से साहित्य की पूजा करता संस्थान के काव्य संग्रह में न ज्यादातर रचनाकारों ने रिश्तों के ताने बानों को प्रेरणा स्वरुप ढाला है।कही बिछोह का संदेश ,तो कही विलग होने का दर्द ,सुख दुख ,विश्वास ,ईमानदारी आदि पढ़कर ऐसा लगता है कि मानों दस्तावेज दुनिया के समक्ष अपनी बातों को रख रहा हो ।और ये यादें बनकर समय समय पर तमाम हो रहे परिवर्तनों पर प्रत्यक्ष गवाह बन के उभर रहे हो । ये हमारे आसपास की घटना लगने का अहसास भी करवाती है । यही तो काव्य संग्रह की विशेषता है कि वो मन को छू जाये ।भ्रूण हत्या में संजय वर्मा 'दृष्टि ' ने -बाबुल भी क्या करें ,
बेटियां भ्रूण हत्या से हो गई दुनिया में कम
इसलिए डाकिया,चिट्ठी और बाबुल हो गए है अब गुमसुम '
डॉ शशि निगम- 'मुझे आने दो दुनिया में जरा /दो कुलों का ध्यान रखूंगी सदा '
डॉ यशोधरा भटनागर -नन्हे पग रखे/ पथरीली राह चले /कांटे कोमल पैर चुभे/ रुकी नहीं ,थमी नहीं/ आगे बढ़ती गई '
मित्रा शर्मा -नारी होकर / नारी पर ही अत्याचार/कभी होता दुर्व्यवहार/कभी लगते उस पर लांछन /कभी मिलता व्यभिचार '
डॉ गीता दुबे -दुनिया की आधी आबादी का /खूबसूरत अंकुरण है बेटियां /घर समाज देश- दुनिया का / गौरवमयी अलंकरण है बेटियां '
प अखिल स्नेही -उस परम पिता से कहो /तुम आयु करता क्षेम करता/तुम ही तपस्वी हो /गर्भ में जब पुत्री भी दो /साथ में आशीष भी दो '
राधा परमार -सबका ख्याल रखती बेटियां /ससुराल की लाज/पिता का ताज होती है बेटियां /मां के दर्द की हिस्सेदार है /दर्द छिपाकर जीती बेटियां '
नीतेश जोशी --लड़की पढ़ना चाहती है /समाज से अपने/हक के लिए/लड़ना चाहती है /लड़की पढ़ना चाहती है '
विजय जोशी 'शीतांशु '-बिन शिक्षा के जीवन सूना /हरदम कहते मेरे पापा प्यारे थे '
डॉ शेखर मेदमवार -एक बेटी और/चढ़ गई सूली पर/वहशी दरिंदों की बलि पर/लो जलाओं फिर मोमबत्ती/उठाओं फिर तखितिया -बैनर /चिल्लाओं फिर कि /अब नहीं होने देंगे '
सौ निशा बुधे झा निशामन -सिखना होगा तुमको/अपनी सुरक्षा का दायित्व तुमको/अत्याचार के खिलाफ लड़ना होगा/बेखौफ्मजीना होगा/उन कांटों भरी राहो पर/चलना होगा'
आशीष दशोत्तर -रोशनी आने को हर वक्त रहती है बेताब/वह मिटाना चाहती है/उस दयार से अंधेरे की साडी छायाएं '
मयूर व्यास - याद तो बहुत आओगी बिटियां /पर आंखे सजल भी कर जाओगी बिटियां '
नवोदित सिन्हा -मां की मुस्कान है बेटियां /पिता का अभिमान है बेटियां '
संजय परसाई 'सरल '-तुम्हारे रगों में/दौड़ती है/मेरी आत्मा/ तुम्हारी सांसों में ही बसी है/मेरी भी सांसे '
अर्चना पंडित -क्रांति लाना पड़ेगी/ऐसी क्रांति लाना पड़ेगी की/एक-एक को शीश झुकाकर /मुझे कन्या मांगनी पड़ेगी '
प्रेमचंद माहेश्वरी-सागर की लहरों से रेती पर आई/पड़ी -पड़ी सीप में वह मुस्काई/प्रथम रश्मिया सूर्य की/ पूछ रही थी उसका नाम /नाम-वाम तो बता न पायी/पहले ही हो गया उसका काम तमाम ' इसी से समकालीन परिचर्चा और स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में भी अपनी छाप छोड़ती आई है और संग्रह के ख़जाने में श्रेष्ठ विचार का भंडार समाहित है जो समय समय पर हमे ज्ञानार्जन में वृद्धि करता आया है।व्यव्हार को दिशा बताता आया है | कई काव्य रचना में तो घरेलु हिंसा ,नारी उत्पीडन व्यवहार की दुर्दशा को बड़े ही सार्थक ढंग से प्रस्तुत किया है ।यह संत्रास और पीड़ा का उन्मूलन होना चाहिए ताकि बेटियां भी खुशहाल जीवन जी सके।बेहतर संवादात्मक पहलू ह्रदय वेदना को झकझोर जाते है।रचनाकारों के लेखन की शैली संग्रहणीय तो है ही साथ ही स्तरीयता के मुकाम हासिल भी करती जा रही है।जो कि रचनाकारों की लेखनीय परिपक्वता को प्रतिबिंबित करती है ।यह अंक निसंदेह काव्य जगत में अपने परचम लहराएगा । मार्मिकता के पहलुओं की पहचान कराने में यादगार सिद्ध अवश्य होगा।यही शुभकामना है । संपादक - नीतेश जोशी 'जय ' संजय परसाई 'सरल 'प्रकाशक - शुभांकर मानव सेवा संस्थान महात्मा गांधी चौक ,बड़नगर जिला उज्जैन मप्र 9977837306 समीक्षक - संजय वर्मा "दृष्टी " मनावर जिला धार मप्र 9893070756
मूल्य -30/-

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